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Friday, October 30, 2020

श्रद्धा और विश्वास का महापर्व पितृपक्ष

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ज्ञानपुर। पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष। कहा गया है जो श्रद्धा से किया गया हो उसे श्राद्ध कहते हैं।

देवऋण ऋषिऋण और पितृऋण यह तीन ऋण हमारे शास्त्रों में हमें बतलाया गया है। प्रत्येक वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से अश्वनी कृष्ण अमावस्या तक पितृपक्ष श्राद्ध होते हैं। श्राद्ध यानी श्रद्धा ब्रह्मपुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित कार्य अथवा स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि.विधान द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धा पूर्वक प्रदान किया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध में तिल चावल जौ आदि का अधिक महत्व है साथ ही पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्व होता है।

वैदिक परंपरा के अनुसार पितरों का श्रद्धा से श्राद्ध करना उत्कृष्ट कार्य हैं। एक पुत्र का जीवन तभी सार्थक है जब वह अपने जीवित माता.पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु.तिथि पर पितृपक्ष में उनका श्रद्धा.पूर्वक विधि.विधान से श्राद्धकर्म करें। मान्यता अनुसार पितृपक्ष में पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज उपाय है। गया गंगासागर कुरुक्षेत्र चित्रकूट पुष्कर हरिद्वार सहित अन्य तीर्थ स्थलों में पितरों को श्रद्धा पूर्वक श्राद्धकर्म किया जाता है। सनातन धर्म और वैदिक मान्यताओं में पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज व सरल मार्ग भी माना जाता है।

श्राद्धपक्ष का महात्म्य उत्तर व उत्तरपुर्व.भारत में अधिक है। दक्षिण भारत व महाराष्ट्र के विभिन्न अंचलों में इसे अलग.अलग नामों से जाना जाता है। यह भी मान्यता है कि पितृपक्ष में किए गए दान से पितरों की आत्मा को संतुष्टि मिलती है और पितृदोष भी समाप्त हो जाता है। श्राद्ध के दौरान गाय घृत अनाज वस्त्र तिल भूमि नमक आदि दान करने का भी परंपरा सदियों से चला आ रही है। ऐसा माना जाता है कि पितृपक्ष के दौरान पितरगण धरती पर अपनों के पास आते हैं और अमावस्या को उनकी विदाई होती है। इस दिन श्रद्धा से श्राद्ध व दान करने व धूप दीप नैवेद्य अर्पण करने से मानसिक शांति के साथ घर में सुख.समृद्धि आती है।

मान्यता यह भी है कि इस अमावस्या को पितृगण अपने परिजनों के द्वार श्रद्धादि की इच्छा लेकर आते हैं यदि उन्हें श्रद्धा पूर्वक पिंडदान आदि न किया जाए तो वह असंतुष्ट ही वापस चले जाते हैं जिससे व्यक्ति के जीवन में नाना प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है इसलिए श्रद्धा पूर्वक विश्वास के साथ श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितृपक्ष का श्राद्ध मूलत: एक पारिवारिक कृत्य हैं। भारतीय सनातन परंपरा में अपने दिवंगत माता.पिता के लिए प्रतिवर्ष पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान करने का शाष्त्रीय विधान है।

वायुपुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्राद्ध करने की दृष्टि से अपने पुत्र को गया में आया हुआ देख पितृगण अत्यंत प्रसन्न होकर उत्सव मनाते हैं।वर्तमान समय में अत्यंत ध्यानागत तथ्य यह है कि आज परिवार का वह सदस्य जो पुत्र के रूप में परिवार को संचालित कर रहा है वह अपने पुत्र का पिता भी है वह अपने पोते का दादा भी है अर्थात अपनी जिन दिवंगत तीन पीढिय़ों का वह श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध कर रहा है उसके पीछे उतनी ही पीढियां खडी है। आज वह पुत्र के रूप में अपने पिता को जो श्रद्धा से श्राद्ध निवेदित कर रहा है वहां उपस्थित उसका पुत्र को भी इस दायित्व का बोध भी होता है। इस प्रकार संबंध का यह श्रृंखला सतत चलता रहता है। इस प्रकार श्रृंखला.सेतु बनाने का यह पावन पर्व पितृपक्ष ही है।

परिवार का वह बाल.सदस्य जो अपने दिवंगत पूर्वजों से अपरिचित रहता है इस अवसर पर वह कौतूहलवश सब का परिचय पूछता है। इस प्रकार पारिवारिक संबंधों के सुदृढ़ीकरण में पितृपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज के न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम में भले ही भौतिक संसाधनों की प्रचुरता हो उसमें आधुनिक सुख.साधन के सारे यंत्र.तंत्र मौजूद हों परंतु वहां के सारे संबंध में ताप.तनाव कुंठा संत्रास से सत्रंस्त हैं उनका एकमात्र कारण है उपयुक्त पारिवारिक संबंधों की व्यापकता का आभाव सचमुच यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब हम तर्पण के समय पितरों को मन से याद करते हैं तो उस समय उनके साथ अपने पारिवारिक संबंधों को भी याद अवश्य करते हैं उनका चलचित्र सम्मुख प्रकट हो ही जाता है। इससे सहज ही उनके अतीत के सारे सुकृत्य सामने आ जाते हैं। हमारे मन.प्राण भावुक हो जाते हैं। ना केवल हाथ की अंगुलियों वरन दोनों आंखों की अश्रू धाराओं से तर्पण होने लगता है।

सच तो यही है कि परिवार मात्र ईट पत्थर सीमेंट से बना घर नहीं है वह इस सात्विक संबंधों का पावन समुच्चय है। इन्हीं संबंधों से एक आदर्श परिवार को सुरक्षित एवं संरक्षित रखा जा सकता है। आज के आज के टूटते.बिखरते पारिवारिक परिवेश में पितृयज्ञ एक संजीवनी की तरह है जो सभी परिस्थितियों में पारिवारिक संबंधों का कायाकल्प करने की क्षमता रखता है। आवश्यकता है तो सिर्फ व्यक्ति मे श्रद्धा भाव की वह भी पूर्ण विश्वास के साथ।

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