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Tuesday, October 20, 2020

आज है कोजागरी पूर्णिमा ,जानें क्या है ख़ास !

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हिन्दू धर्म में पूर्णिमा का काफी मह्त्व होता है, लेकिन अश्विन माह की पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा को सबसे बड़ी पूर्णिमा माना जाता है। इस साल शरद पूर्णिमा 23 अक्टूबर को पड़ रहा है। इस पूर्णिमा को कोजगार पूर्णिमा भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन अनुष्ठान करना सफल होता है। मान्यता है कि इस दिन चांद के प्रकाश में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे धरती पर गिरते हैं और उसकी किरणों के नीचे रखकर किसी खाद्य पदार्थ को खाना सेहत के लिए भी अच्छा होता है।
शरद पूर्णिमा का महत्व
– शरद पूर्णिमा से शरद ऋतु का आरम्भ होता है।
– इस दिन चन्द्रमा संपूर्ण और सोलह कलाओं से युक्त होता है।
– इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है, जिससे धन, प्रेम और स्वास्थ्य मिलता है।
– इस रोशनी के नीचे खीर बनाकर रखने से और फिर उसको खाने से शरीर को कई तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है।
– प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण श्री कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था।
– शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करना चाहिए।
– ओम श्रीं ओम और ओम ह्वीं ओम महालक्ष्मये नम: मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना गया है।
शरद पूर्णिमा व्रत विधि
– पूर्णिमा के दिन सुबह में इष्ट देव का पूजन करना चाहिए।
– इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन कर घी के दीपक जलाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।
– ब्राह्माणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।
– रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
– मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है.
– इस दिन पूर्ण रूप से जल और फल अाधारित उपवास रखना या सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए।
– इस दिन काले रंग का प्रयोग न करें, चमकदार सफेद रंग के वस्त्र धारण करना बेहतर होगा।
ये है मान्यता
चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। शोध के मुताबिक खीर को चांदी के बर्तन में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान की तरह है। इस रात दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण और औ‍षधि सेवन के बाद 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।  लंकाधिपति रावण भी शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इससे उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी।

बिहार में शरद पूर्णिमा है कोजागरा पूजा

 23 अक्टूबर को अश्विन पूर्णिमा के दिन बिहार के मिथिलांचल, कोशी क्षेत्र एवं नेपाल के तराई इलाकों में लोकपर्व कोजागरा मनाया जाता है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असाम में मनाये जाने वाले इस महत्वपूर्ण पर्व को लक्ष्मी पूजा या कोजगरा पूजा के साथ ही बंगाल लक्ष्मी पूजा के तौर पर भी जाना जाता है। देश के ज्यादातर हिस्सों में कोजगरा पूजा को शरद पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दौरान धरती का माहौल काफी खुशमुमा होता है और यही कारण है कि इस दिन देवता भी धरती पर अा जाते हैं। देश में ऐसे कई पर्व, त्योहार और उत्सव हैं जिन्हें हम लोकपर्व की श्रेणी में रखते हैं। इसकी व्यापकता भी सीमित होती है। कोजगरा एक ऐसा ही लोकपर्व है।
मखाना और मिठाई का होता है खास महत्व
बिहार के मिथिलांचल में इस पर्व का खास महत्व है। इस पर्व में मिठाई और मखाना का विशेष महत्व होता है।  नवविवाहितों के घर पहली बार होने वाली इस पूजा अाकर्षण कुछ अलग ही होता है। नवविवाहितों के सुखमय जीवन,  मां लक्ष्मी की कृपा, धन धान्य एवं सुख समृद्धि से परिपूर्णता की कामना के साथ कोजगरा प्रव मनाया जाता है। कई जगहों पर सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल यह त्योहार 23 अक्टूबर को मनाया जायेगा।

कब मनाते हैं

कोजगरा पर्व हर साल अश्विन पूर्णिमा की रात यानी विजयादशमी के पांचवे दिन मनाया जाता है। इसमें लक्ष्मी की पूजा की जाती है। बिहार कोशी, तराई सहित मिथिला में इस पर्व का खास महत्व है। इसे क्षेत्र के लोग जो दूसरी जगहों पर रहते हैं, और उनके घरों में किसी की उस साल शादी हुई होती है उनके घरों में यह त्योहार अवश्य मनाया जाता है। शादी के पहले साल इस तिथि का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं और नवविवाहिता के घर से लोग अपने दामाद के घर मखाना, कपड़े और अन्य समान भेजते हैं।

कोजागरा पूजा तिथि और समय

कोजागरा पूजा निशिता का समय – रात 11.39 से 12.31 बजे तक

अवधि – 51 मिनट
पूर्णिमा तिथि शुरू – रात 10.36 (23 अक्टूबर)
पूर्णिमा तिथि समाप्त – रात 10.14 बजे (24 अक्टूबर)
कोजगरा पूजा नियम
कोजगरा पर्व के दिन शाम के वक्त घर के आंगन में वर को नए कपड़े पहनाकर और आंखों में काजल लगाकर, पगड़ी पहनाकर और पैरों को अालता से रंगकर आसन पर बिठाया जाता है। इस दौरान महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और वर को चुमाया जाता है। महालक्ष्मी की पूजा होती है। उपस्थित लोगों के बीच प्रसाद के साथ मिठाई और मखाना का वितरण किया जाता है। वर बड़ों के पैर छूकर आशीष प्राप्त करता है। वधू पक्ष से आए लोग वर को कुछ नकदी या सामान, जो प्राय: आभूषण होता है, आशीर्वाद के तौर पर देते हैं।
रात में होती है महालक्ष्मी की पूजा
मिथिलांचल में कोजगरा के अवसर पर महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थपित कर रात में जागकर महालक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। इस अवसर पर वर अपने साला के साथ चौपड़, कौड़ी या ताश खेलता है। इस मौके पर वर और वधू पक्ष के लोगों के बीच जमकर हंसी मजाक, हास-परिहास का दौर चलता है। ऐसी मान्यता है कि कोजगरा पूजन से नवदंपति को महालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन व्रत का भी विधान है। व्रत रखने वालों को संध्या के समय गणपति और माता लक्ष्मी की पूजा करके अन्न ग्रहण करते हैं।  आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को यह व्रत होता है। इस रात चांद काफी खूबसूरत होता है। आश्विन और कार्तिक को शास्त्रों में पुण्य मास कहा गया है।
कोजागरा महात्म्य
 कोजागरा पूर्णिमा की रात की बड़ी मान्यता है, कहा गया है कि इस रात चांद से अमृत की वर्षा होती है। बात काफी हद तक सही है। इस रात दुधिया प्रकाश में दमकते चांद से धरती पर जो रोशनी पड़ती है उससे धरती का सौन्दर्य यूं निखरता है कि देवता भी आनन्द की प्राप्ति हेतु धरती पर चले आते हैं। इस रात की अनुपम सौंदर्य की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि देवी महालक्ष्मी जो देवी महात्मय के अनुसार सम्पूर्ण जगत की अधिष्ठात्री हैं, इस रात कमल आसन पर विराजमान होकर धरती पर आती हैं। मां लक्ष्मी इस समय देखती हैं कि उनका कौन भक्त जागरण कर उनकी प्रतिक्षा करता है, कौन उन्हें याद करता है। इस कारण इसे को-जागृति यानी कोजागरा कहा गया है।
कोजागरा काली पूजा
 इस दिन जहां देश के कई भागों में लोग माता लक्ष्मी के नाम से व्रत करते हैं और उनसे अन्न धन की प्राप्ति की कामना करते हैं वहीं देश के कई भागों में इस रात काली पूजा का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन शुरू हुई काली पूजा दस दिनों तक चलती है, इस दौरान भक्त काफी धूमधाम से मां काली की पूजा उपासना करते हैं।
-पंडित अतुल शास्त्री
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