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Sunday, April 11, 2021

World AIDS Day: एड्स जागरूकता कार्यक्रम तो ठीक है, लेकिन HIV पीड़ितों को सही इलाज कब मिलेगा?

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World AIDS Day: एड्स जागरूकता कार्यक्रम तो ठीक है, लेकिन HIV पीड़ितों को सही इलाज कब मिलेगा?



एचआईवी (एड्स), ऐसा संक्रमण है जो एक समय पर काफी घातक होने के साथ लाइलाज हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ दुनिया भर में इसकी जागरूकता के लिए कई कार्यक्रम चले और 1980 तक आते-आते यह वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बन गया. इस दौरान इस वायरस के खिलाफ ऐसी थेरेपी विकसित हुई जिसकी वजह से एचआईवी-एड्स से होने वाली मौत में कमी दर्ज की जाने लगी.

आज हम एड्स की बात कर क्यों रहे हैं?

1 दिसंबर के दिन को दुनिया भर में वर्ल्ड AIDS डे के नाम से जाना जाता है. इस दिन का मकसद लोगों को इस बीमारी के प्रति और इस बीमारी से जुड़े लक्षणों के प्रति जागरुक करना है. इस दिन की शुरुआत James W. Bunn और Thomas Netter ने 1988 में की थी. इस खास दिन को शुरू करने का मकसद लोगों को HIV के प्रति जानकारी देकर जागरूक करना था. लोगों को सिखाया गया कि कैसे इस बीमारी से बचा जाए. जो भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके आस-पास का माहौल कैसे सुधारा जाए.

भारत में एड्स जागरूकता कार्यक्रम की स्थिति

एड्स जागरूकता को लेकर सरकार ने कई कार्यक्रम संचालित किए हैं, सैकड़ों एनजीओ ने एचआईवी/ एड्स के बारे में जागरूकता उत्पन्न की है लेकिन जब बात एचआईवी पीड़ितों को सही इलाज मिलने की आती है तो काफी अंतर रहता है, ऐसा मोटे तौर पर इससे जुड़े सामाजिक कलंक और जानकारी के अभाव के चलते है.

किसी भी आम जन को अगर किसी के एड्स होने की बात पता चलती है तो जो सबसे पहली बात उसके जहन में आती है, वह यह कि इसके पीछे का कारण अनसेफ सेक्स होगा. या तो वह यह मानने को तैयार नहीं होते या उन्हें इस बात की जागरूकता नहीं होती कि अनसेफ सेक्स के अलावा संक्रमित खून चढ़ाने से,
HIV पॉजिटिव महिला के स्तनपान से, एक बार इस्तेमाल की जानी वाली सुई को दूसरी बार यूज करने से और इन्फेक्टेड ब्लेड यूज करने से भी हो सकती है.

यहां तक कि एचआईवी सबसे अधिक संक्रमित खून चढ़ाने से होता है. ऐसे में सरकार के साथ कई सामाजिक संगठन, एनजीओ ने एड्स को लेकर लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए हैं.

लोगों को खुद करनी होगा पहल

इधर भारत में विश्व एड्स दिवस की पूर्व संध्या पर विशेषज्ञों ने कहा कि सरकार के अलावा यह एचआईवी पीड़ित व्यक्तियों पर भी है कि वे आगे आएं और अपनी कहानी बताएं ताकि इससे पीड़ित अधिक संख्या में सामने आएं और इलाज प्राप्त करें.

उन्होंने कहा कि इससे यह भी होगा कि इससे जुड़ा सामाजिक कलंक मिटेगा. इंडिया एचआईवी/एड्स अलायंस के साथ कार्यरत एचआईवी कार्यकर्ता मोना बलानी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इसके बारे में जागरूकता निश्चित रूप से बढ़ी है लेकिन अभी भी कई ऐसे एचआईवी पीड़ित हैं जो उचित चिकित्सकीय सहायता एवं देखभाल से वंचित हैं.

पूरे देश में करीब 12 लाख लोग इलाज प्राप्त कर रहे हैं लेकिन करीब 25 लाख प्रभावित हैं. इसलिए हमें बाकी 13 लाख तक पहुंच बनाने और उन्हें यह बताने की जरूरत है कि इलाज कितना जरूरी है. हमारा पहला प्रयास यह होना चाहिए कि हम लोगों को आगे आने के लिए सक्षम बनाएं. यही कारण है कि मैं आज इस मुद्दे पर बोल पा रही हूं. मुझे काफी प्रयास करने पड़े और मुझे अपनी कहानी बताने के लिए प्रशिक्षण और एक मंच दिया गया, लेकिन अभी हजारों ऐसे हैं जिनमें ये साहस नहीं है.

दिल्ली स्थित एनजीओ ‘नेशनल कोएलिशन आफ पीपुल लिविंग विद एचआईवी इन इंडिया’ के साथ काम करने वाले एचआईवी कार्यकर्ता फिरोज खान ने कहा कि सरकार नागरिक समाज की मदद से जो कर रही है वह प्रशंसनीय है लेकिन जब तक कोई एचआईवी पीड़ित व्यक्ति नहीं बोलेगा यह ‘आधा प्रयास’होगा.

खान को 17 वर्ष की आयु में पता चला कि उन्हें एचआईवी है. वह उसके बाद से एचआईवी/ एड्स के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए एनजीओ के साथ काम कर रहे हैं.वह इसके साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ भी कर रहे हैं.

(भाषा से इनपुट)

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