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अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस : बॉलीवुड स्टार और यूनिसेफ के सेलिब्रिटी एडवोकेट आयुष्मान खुराना ने महिलाओं के सम्मान और अधिकार पर कही बड़ी बात 

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‘अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस’ (International Day of the Girl Child) के मौके पर बॉलीवुड स्टार और यूनिसेफ के सेलिब्रिटी एडवोकेट, आयुष्मान खुराना देश के नाम अपने संदेश में कहते हैं- ‘जब तक लड़कियों के साथ भेदभाव और हिंसा जारी रहेगी, तब तक हमारा समाज विकसित और सभी की परवाह करने वाला नहीं बन पाएगा.’ यूथ-आइकन और बॉलीवुड स्टार आयुष्मान खुराना सही मायने में एक थॉट-लीडर हैं, जो अपनी प्रोग्रेसिव और सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली एंटरटेनिंग फिल्मों के जरिए समाज में रचनात्मक, सकारात्मक बदलाव लाने का इरादा रखते हैं.

टाइम मैगजीन ने आयुष्मान को दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक माना है और हाल ही में यूनिसेफ ने उन्हें अपने ग्लोबल कैंपेन, EVAC (बच्चों के खिलाफ हिंसा का अंत) का सेलिब्रिटी एडवोकेट बनाया है. अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर आयुष्मान ने देशवासियों को एक खास संदेश दिया है.

आयुष्मान कहते हैं- “बच्चों के साथ होने वाली हिंसा को खत्म करने की मुहिम में यूनिसेफ का सेलिब्रिटी एडवोकेट होने के नाते, मैं मानता हूं कि लड़कियों के साथ भेदभाव और हिंसा बिल्कुल अच्छी बात नहीं है. इस तरह तो हमारा समाज कभी भी विकसित और सभी की परवाह करने वाला नहीं बन पाएगा. कोविड-19 की वजह से लड़कियों के सामने आने वाली चुनौतियां और बढ़ गई हैं. लड़कियों को लड़कों की तरह मोबाइल या इंटरनेट का इस्तेमाल करने की पूरी आजादी नहीं है, जिससे उनके लिए रिमोट लर्निंग में भी रुकावट आती है. इसके अलावा हेल्थ, न्यूट्रिशन और दूसरी जरूरतों के मामले में भी, परिवार में उन्हें लड़कों के समान नहीं माना जाता है.”

उन्होंने आगे कहा, “कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते जेंडर पर आधारित हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़ों से पता चलता है, कि इस महामारी के दौरान बाल विवाह के मामलों में भी 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है.”

अभिनेता ने यह भी कहा, “अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर, हम सभी को लड़कियों के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके साथ होने वाले भेदभाव पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाना और उनके ह्यूमन राइट्स की हिफाजत करना भी बेहद जरूरी है. हमें लड़कियों की शिक्षा को ज्यादा अहमियत देनी चाहिए, उन्हें भी लड़कों के बराबर अधिकार मिलना चाहिए, उन्हें भी कई तरह का नया हुनर सीखने और रोजगार का मौका दिया जाना चाहिए. साथ ही उन्हें समाज में मर्दों के दबदबे वाली सोच को दूर करने के लिए लड़कों और पुरुषों के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए.”

EVAC एडवोकेट के रूप में भारत में अपने गोलपोस्ट के बारे में बताते हुए आयुष्मान कहते हैं कि उनका लक्ष्य लोगों को बालिकाओं की जरूरतों के बारे में एजुकेट करना है. वे कहते हैं, “मैं इस मुद्दे को लोगों के बीच ले जाना चाहता हूं ताकि इस बारे में विचार-विमर्श शुरू हो सके और हम सभी को उन चुनौतियों को समझने में मदद मिल सके, जिनका सामना लड़कियों को आज भी करना पड़ता है. मैं लोगों को यह समझाना चाहता हूं, कि हम सभी इस हालात को कैसे बदल सकते हैं और इसे बदलने में हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए. कुछ आसान तरीकों से भी हम बदलाव लाना शुरू कर सकते हैं.”

आयुष्मान कहते हैं, “सबसे पहले, हम सभी को घर की चारदीवारी के भीतर अपने रवैये के बारे में जागरूक रहने की जरूरत है. क्या हम अपने घर पर छोटी-छोटी बातों में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव की पहचान कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर, लड़कियों के लिए अपने भाइयों के बाद भोजन करना, बाहर खेलने की इजाजत नहीं मिलना, कम समय के लिए फोन और इंटरनेट के इस्तेमाल की इजाजत/ इजाजत नहीं मिलना, लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग कर्फ्यू-टाइम, जैसी बातें तुरंत हमारे दिमाग में आती हैं. ऐसी परिपाटी को खत्म करके परिवार में बदलाव आएगा. साथ ही हम लड़कियों को अहमियत देना और उनका सम्मान करना सीखेंगे.”

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी बात, धीरे-धीरे अब स्कूल भी सुरक्षित तरीके से खुलने लगे हैं और ऐसे में सबसे अहम बात यह है कि, सभी माता-पिता को कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अपने बच्चों और बच्चियों को फिर से स्कूल भेजना चाहिए. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने वाली लड़कियों की कम उम्र में शादी होने की संभावना कम होती है. पढ़ाई के साथ-साथ स्किलिंग से लड़कियां अपने बलबूते पर फैसले लेने के काबिल बनती हैं, और इस तरह उनकी ज़िंदगी संवर जाती है. इससे लड़कियों और लड़कों दोनों का भविष्य बेहतर होता है और समाज में एक ऐसा माहौल बनता है, जहां वे अपनी काबिलियत का भरपूर फायदा उठा सकती हैं.”

अभिनेता ने आगे कहा, “लड़कियों की पढ़ाई को कम अहमियत देने की वजह से ही बाल विवाह जैसी घटनाएं होती हैं, और इस तरह लड़कियों के खिलाफ हिंसा, गरीबी और खराब सेहत की समस्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रहती है. हालांकि, भारत ने बाल विवाह के मामलों को कम करने में काफी हद तक कामयाबी पाई है. इसके बावजूद आज भी बाल विवाह के तीन में से एक मामले का ताल्लुक भारत से ही होता है. आखिर में सबसे अहम बात, माता-पिता, दोस्तों, साथियों के रूप में, हमें पुरानी और घिसी-पिटी परिपाटी को बदलकर इस हिंसा कल्चर को खत्म करने के लिए साथ मिलकर कोशिश करनी चाहिए.”