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Tuesday, October 20, 2020

कांग्रेस की फैलायी बदबू है कर्नाटक का संकट: प्रभुनाथ शुक्ल

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Pankaj Gautamhttps://metrocitysamachar.com
Journalist by Passion, Engineer by Profession.

नई दिल्ली। कर्नाटक से निकले संदेश ने पूरी राजनीति को बदबूदार बना दिया है। राज्यपाल के विवेक और उनके विशेषाधिकार का भी मजाक बन गया। सियासत और सत्ता के इस जय पराजय के खेल में कौन जीता और कौन पराजित हुआ, यह सवाल तो अंतिम सीढ़ी का है। यह राजनीतिक दलों और उनके अधिनायकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की तंदुरुस्ती के लिए कभी भी सकारात्मक नहीं कहा जा सकता है। यह राजनीतिक संस्थाओं के लिए भी सबक है, जो सत्ता और सिंहासन विस्तार की नीति में विश्वास रखते हैं। उनके लिए उनके लिए सिंहासन ही सब कुछ है।

राजनीति के केंद्र में लोकहित कभी भी प्रमुख मसला नहीं होता। वह साम्राज्य विस्तार में अधिक विश्वास रखती है। एकाधिकार शासन प्रणाली में यह बात आम है, लेकिन दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में ऐसा कम होता है लेकिन अब लोकतंत्र की छांव में भी सामंतवाद की बेल पल्लवित हो रही है। सत्ता के केंद्रीय बिंदु में संविधान नहीं साम, दाम, दंड और भेद की नीति अहम हो चली है। सत्ता के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को फुटबाल नहीं बनाया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था का हर स्थिति में अनुपालन होना चाहिए। यहां सवाल कांग्रेस की नैतिक जीत और बीजेपी की पराजय का नहीं है। प्रश्न संवैधानिक अधिकारों का है, जिनकी तरफ देखा तक नहीं जाता और दलीय प्रतिबद्धता की अंधभक्ति में आंख बंद कर फैसले लिए जाते हैं। 

 

बीजेपी और कांग्रेस के सत्ता और सिंहासन के इस युद्ध में लोकतंत्र बेनकाब हुआ है। हालांकि यह कोई पहलहीं हुआ है। यह देश के राजनीतिक इतिहास का परंपरा रही है। कांग्रेस की उसकी गंदी सोच का बीजेपी आज अनुसरण कर रही है। हमारे राजनीतिक दलों की स्थिति लोकतांत्रित फैसलों को पचाने की नहीं है। राजनीति सत्ता के लिए किसी हद तक गिर सकती है। जैसा की कर्नाटक में गिरी और पूर्व में गिरती आ रही है। बीजेपी एक और राज्य कर्नाटक पर विजय प्राप्त कर जहां कांग्रेस मुक्त भारत के अपने मिशन को सफल करना चाहती थी। वहीं कांग्रेस गोवा, मणिपुर और मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद मोदी और शाह के हाथों मिली पराजय का बदला चुकाना चाहती थी।

राजनीति में यह प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन वह पूरी तरह दलीय प्रतिबद्धता से परे और स्वस्थ हो। लेकिन जब जिम्मेदार संस्थाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का त्याग कर किसी विशेष संदर्भ में उसका प्रयोग करने लगे तो यह उचित नहीं है।पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल है कि जब कांग्रेस राज्यपाल वुजभाई वाला को जेडीएस और कांग्रेस के 117 विधायकों की सूची सौंप दी फिर उसे सरकार बनाने के लिए क्यों नहीं आमंत्रित किया गया। राज्यपाल जैसे प्रमुख संवैधानिक पदों पर राजनैतिक दलों से नियुक्तियों की व्यवस्था बंद होनी चाहिए। प्रमुख सचिवों की तरह यहां भी प्रशासनिक अफसरों की नियुक्ति होनी चाहिए या फिर राज्यपाल के लिए भी राष्ट्रपति जैसी चुनावी व्यवस्था अमल में लायी जानी चाहिए। संविधान में राज्यपालों के विवेक का अधिकार खत्म होना चाहिए।

विवेक का अधिकार ही राजनीतिक और दलीय स्वामिभक्ति को बढ़ा रहा है। क्योंकि राज्यपाल दलीय प्रतिबद्धता से उभर नहीं पाते जिसकी वजह है लोकतंत्र बेशर्म होता है और कर्नाटक जैसी घटना हमारे सामने होती है। इसके अलावा दो-तिहाई बहुमत के की आड़ में भी लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक बंद होना चाहिए। सबसे अधिक मतपाने वाले दल को सत्ता सौंपी जानी चाहिए या फिर बहुत की अंकीय गणित पर विराम लगना चाहिए। सबसे बड़े राजनीतिक दल को सरकार चलाने का मौका मिलना चाहिए। दलबदल कानून पूरी प्रतिबद्धता के साथ लागू होना चाहिए। क्योंकि आम तौर यह होता है कि जोड़-तोड़ से सरकार बना ली जाती है। दूसरे दल से टूटे विधायक सरकार में शामिल हो सत्ता आनंद भोगते हैं जबकि उस पर फैसला बेहद बिलंब से आत है जिसकी वजह से दल बदल कानून भी बेमतलब साबित होता है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने वाली इस व्यवस्था पर विराम लगना चाहिए।

संविधान संशोधन के जरिए यह व्यवस्था होनी चाहिए की चुनाव के बाद कोई भी सदस्य अपने मूल दल से साल भर बाद पाला बदल सकता है। इस तरह के लचीने कानून कहीं न कहीं से रिसोर्ट और हार्स ट्रेडिंग संस्कृति को बढ़ावा देते हैं, इस तरह की छूट पर लगाम लगनी चाहिए।हालांकि इस गलत व्यवस्था के लिए सिर्फ बीजेपी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इसकी पूरी जबाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। पूर्व में कर्नाटक, झारखंड, बिहार, जम्मू-कश्मीर, आंध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस गलत परंपरा को उदाहरण हैं। राज्यपाल जैसी संस्था का दुरपयोग कांग्रेस की परंपरा रही है।

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