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Vasai News : हिंदी साहित्य के नव लेखकों के लिए मार्गदर्शक बने डॉ. रामदास तोंडे ✨

संत गोन्सालो गार्सिया महाविद्यालय, वसई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामदास नारायण तोंडे को भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय ने ‘हिंदी नव लेखक शिविर’ में मार्गदर्शक के रूप में चुना

वसई (Vasai) : हिंदी साहित्य की दुनियाँ में जब कोई नया लेखक अपने शब्दों की दुनियाँ बसाने निकलता है, तो उसे सही दिशा दिखाने वाला एक अनुभवी मार्गदर्शक मिलना किसी वरदान से कम नहीं होता। ऐसे ही एक विद्वान, शिक्षाविद् और साहित्यकार, संत गोन्सालो गार्सिया महाविद्यालय (G G Collage), वसई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामदास नारायण तोंडे को भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय ने ‘हिंदी नव लेखक शिविर’ में मार्गदर्शक के रूप में चुना है। यह शिविर आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टणम में 21 मार्च से 28 मार्च, 2025 तक आयोजित होगा, जिसमें डॉ. तोंडे देशभर से आए नवोदित लेखकों को साहित्य की बारीकियां सिखाएंगे।

डॉ. तोंडे का हिंदी साहित्य में योगदान किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनके लेखन में समाज की गहरी समझ, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की झलक मिलती है। उनकी आत्मकथा ‘सफर में धूप तो होगी’ को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार (2023-24) से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’, ‘साहित्य और सिनेमा’, ‘साहित्य, सिनेमा और समाज’, ‘सिनेमा के विविध आयाम’ जैसी महत्वपूर्ण किताबों के माध्यम से उन्होंने साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को बखूबी प्रस्तुत किया है।

नव लेखकों के लिए यह शिविर एक सुनहरा अवसर होगा, जहां वे लेखन की विविध विधाओं, अनुवाद, पत्रकारिता और सृजनात्मक लेखन की बारीकियों को सीखेंगे। हिंदी साहित्य की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए डॉ. तोंडे जैसे अनुभवी साहित्यकार का मार्गदर्शन निश्चित रूप से इन युवा लेखकों को एक नई उड़ान देगा।

उनकी इस उपलब्धि पर संत गोन्सालो गार्सिया महाविद्यालय, वसई के प्रशासक फादर थॉमस लोपेज, प्राचार्य डॉ. सोमनाथ विभूते, उप-प्राचार्या सरिथा कुरियन, रजिस्ट्रार विमला रिबेलो और महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकों ने उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं

डॉ. तोंडे की यह यात्रा यह साबित करती है कि यदि साहित्य के प्रति सच्ची निष्ठा और समर्पण हो, तो शब्दों की दुनियाँ में एक अमिट छाप छोड़ी जा सकती है। उनका सफर न केवल एक प्रेरणा है, बल्कि हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प भी है। यह केवल एक मार्गदर्शक बनने की बात नहीं, बल्कि साहित्य की अगली पीढ़ी को संवारने की जिम्मेदारी भी है, जिसे डॉ. तोंडे बखूबी निभा रहे हैं।

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