Vasai-Virar : लोकतंत्र में आरोपों का अपना महत्व है। विपक्ष सवाल उठाता है। जनप्रतिनिधि शिकायत करते हैं। नागरिक संगठन आपत्ति दर्ज करते हैं। सत्ता पक्ष जवाब देता है। और पत्रकारिता इन दावों की पड़ताल करती है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी समाप्त कर दी जाती है।
वसई-विरार महानगरपालिका से संबंधित हाल के वर्षों में कचरा प्रबंधन, डंपिंग ग्राउंड, निविदाओं और विभिन्न ठेकों को लेकर करोड़ों रुपये की अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।
इनमें से कुछ मामलों में जांच शुरू हुई है। कुछ में प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं। कुछ मामलों में संबंधित ठेकेदारों ने आरोपों से इनकार किया है।
इसलिए इन घटनाओं को समझने के लिए सबसे आवश्यक है-आरोप और सत्य के बीच अंतर बनाए रखना।
64 करोड़ रुपये का प्रश्न
डंपिंग ग्राउंड से जुड़े एक विवाद में लगभग 64 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। आरोपों में पुराने कचरे के प्रसंस्करण, बिलों, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री के परिवहन तथा भुगतान से संबंधित प्रश्न उठे। यदि आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो मामला केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं रहेगा।
फिर सवाल उन सभी स्तरों पर उठेगा जहां कार्य का माप लिया गया, बिल प्रमाणित हुआ और भुगतान स्वीकृत हुआ। लेकिन जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी आरोप को सिद्ध तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं।
इसलिए पत्रकारिता का पहला दायित्व है – आंकड़े की जड़ तक जाना।
64 करोड़ रुपये की गणना कैसे हुई?
कौन-से बिल इसमें शामिल हैं? किस कार्यादेश के अंतर्गत भुगतान हुआ? कितना कचरा वास्तव में संसाधित हुआ? उसकी तौल का प्रमाण क्या है? परिवहन का अभिलेख क्या कहता है? और भुगतान किस अधिकारी ने स्वीकृत किया? यहीं से आरोप एक गंभीर जांच में बदलता है।
957.64 करोड़ रुपये की निविदा
ठोस कचरा प्रबंधन से संबंधित लगभग 957.64 करोड़ रुपये की निविदा ने भी प्रश्न खड़े किए हैं। इतनी बड़ी राशि अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। किसी निविदा की वास्तविक परीक्षा उसकी प्रक्रिया से होती है। क्या पात्रता की शर्तें उचित थीं? कितने ठेकेदारों ने भाग लिया? कितने तकनीकी रूप से योग्य पाए गए? वित्तीय प्रस्तावों की तुलना किस आधार पर हुई? कार्यादेश किस आधार पर दिया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण – काम पूरा होने के बाद भुगतान किस प्रमाण के आधार पर किया जाएगा?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर दस्तावेजों में स्पष्ट हैं, तो आरोपों की बड़ी संख्या स्वतः कमजोर हो सकती है। लेकिन यदि दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो संदेह बना रहेगा।
254 करोड़ रुपये की निविदा और बढ़ती लागत
ठोस कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में इससे पहले भी निविदा रद्द होने और उसके बाद अधिक मूल्य की नई निविदा जारी होने को लेकर विवाद सामने आया। पहली निविदा की अनुमानित लागत लगभग 207 करोड़ रुपये बताई गई, जबकि बाद की निविदा लगभग 254 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंची।
कुछ ठेकेदारों ने इस प्रक्रिया को न्यायालय में चुनौती दी। यह कहना जल्दबाजी होगी कि कीमत बढ़ना अपने आप भ्रष्टाचार है। महंगाई बढ़ सकती है। ईंधन महंगा हो सकता है। श्रम लागत बदल सकती है। वाहनों की संख्या और तकनीकी आवश्यकताएं बदल सकती हैं।
लेकिन नागरिक का प्रश्न फिर भी जायज है- लागत क्यों बढ़ी? और क्या प्रशासन ने उस बढ़ोतरी का स्पष्ट कारण सार्वजनिक किया?
राजनीति बनाम पत्रकारिता
राजनीतिक आरोप लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई बार विपक्षी दल ऐसे मुद्दे सामने लाते हैं जिन पर प्रशासन स्वयं पर्याप्त जानकारी नहीं देता। लेकिन पत्रकारिता का काम आरोप को दोहराना नहीं है।
पत्रकारिता का काम है – आरोप की जांच करना।
यदि कोई दल कहता है कि 64 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, तो दस्तावेज मांगे जाने चाहिए। यदि ठेकेदार कहता है कि पूरा काम नियमों के अनुसार हुआ, तो उसके दावे की भी जांच होनी चाहिए। यदि प्रशासन कहता है कि निविदा पारदर्शी थी, तो निविदा की पूरी प्रक्रिया देखी जानी चाहिए। यही जिम्मेदार पत्रकारिता है।
कागज पर विकास और जमीन पर वास्तविकता
नगरपालिका प्रशासन की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक वह स्थिति हो सकती है जब कागज पर सब कुछ पूरा दिखाई दे लेकिन जमीन पर उसका परिणाम दिखाई न दे।
कागज कहता है – काम पूरा। बिल कहता है – भुगतान उचित। निरीक्षण कहता है—कार्य संतोषजनक। लेकिन नागरिक के सामने – कचरा मौजूद है। नाला भरा हुआ है। सड़क खराब है। बगीचा उजड़ा हुआ है।
ऐसे में प्रश्न उठता है – क्या हमने काम होने को परिणाम मिलने के बराबर मान लिया है? किसी ठेके की सफलता भुगतान से नहीं, नागरिक को मिली सेवा से मापी जानी चाहिए।
आंकड़ों के पीछे का नागरिक
किसी रिपोर्ट में 64 करोड़, 254 करोड़ या 957 करोड़ रुपये पढ़ना आसान है। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे नागरिक का पैसा है। वही नागरिक जो संपत्ति कर देता है। वही नागरिक जो विकास शुल्क देता है। वही नागरिक जिसके नाम पर सरकार अनुदान लेती है।
वही नागरिक जो अपेक्षा करता है कि उसके शहर का कचरा उठेगा, सड़क बनेगी और बारिश में उसका घर नहीं डूबेगा। इसलिए किसी भी बड़े ठेके का वास्तविक प्रश्न है – जनता को उसके बदले क्या मिला?
आरोपों की मर्यादा, प्रशासन की जिम्मेदारी
आरोप लगाने वाले को प्रमाण देना चाहिए। प्रशासन को जवाब देना चाहिए। ठेकेदार को अपने काम का दस्तावेज प्रस्तुत करना चाहिए। और पत्रकार को दोनों पक्षों की जांच करनी चाहिए। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है। यदि आरोप गलत हैं, तो प्रशासन को तथ्य सामने रखने चाहिए। यदि आरोप सही हैं, तो कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन सबसे खराब स्थिति वह है जिसमें आरोप लगते रहें, जवाब अस्पष्ट रहें और नागरिक के प्रश्न अनुत्तरित रह जाएं।
किसी भी लोकतंत्र में आरोपों को दबाना खतरनाक है। लेकिन आरोपों को बिना प्रमाण सत्य मान लेना भी उतना ही खतरनाक है। सच्चाई का रास्ता दस्तावेजों से होकर जाता है। निविदा की फाइल से। भुगतान अभिलेख से। माप पुस्तिका से। तौल के आंकड़ों से। निरीक्षण रिपोर्ट से। और न्यायालय के आदेश से।
इसलिए VVCMC से जुड़ी बड़ी वित्तीय विवादों की सबसे उचित कसौटी शायद यही होनी चाहिए – आरोप से पहले प्रमाण, प्रमाण के बाद जांच और जांच के बाद निष्कर्ष। क्योंकि जनता को केवल यह जानना जरूरी नहीं कि किसने किस पर आरोप लगाया।
उसे यह जानना है- उसके पैसे का वास्तव में हुआ क्या?
नोट:
इस श्रृंखला में उल्लिखित ACB/ED मामले, FIR, आरोप, audit observations और सरकारी जांचें अपनी-अपनी कानूनी एवं प्रशासनिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग महत्व रखती हैं। किसी आरोप, गिरफ्तारी, FIR अथवा जांच को न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के समान नहीं माना जाना चाहिए। जिन मामलों में जांच या न्यायिक प्रक्रिया लंबित है, उनमें अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच एजेंसी अथवा न्यायालय के निर्णय के अधीन होंगे।
—–समाप्त—–
VVCMC CORRUPTION FILES Part-2 : जनता का पैसा…लेकिन हिसाब कौन देगा? VVCMC ऑडिट की पड़ताल
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