वसई-विरार : भ्रष्टाचार की खबर आमतौर पर तब बड़ी बनती है जब कोई अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ा जाता है। कैमरे सामने आते हैं। हथकड़ियां दिखाई देती हैं। बयान जारी होते हैं। लेकिन सार्वजनिक धन की बर्बादी की हर कहानी इतनी नाटकीय नहीं होती। कई बार कोई गिरफ्तारी नहीं होती। कोई सनसनी नहीं होती। केवल एक लेखा-परीक्षण रिपोर्ट होती है। उसमें दर्ज कुछ आंकड़े होते हैं। कुछ आपत्तियां होती हैं।
और कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं जिनका उत्तर जनता को शायद वर्षों तक नहीं मिलता।
वसई-विरार महानगरपालिका से संबंधित नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की टिप्पणियां तथा विभिन्न सरकारी जांचें इसी शांत लेकिन महत्वपूर्ण तस्वीर को सामने रखती हैं। यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है।
लेखा-परीक्षण में मिली अनियमितता अपने आप में आपराधिक भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं होती।
लेकिन वह प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न जरूर उठाती है।
विकास शुल्क की कम वसूली
महानगरपालिका की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत विकास शुल्क है। नियमानुसार जितना शुल्क वसूल किया जाना चाहिए, उससे कम वसूली केवल लेखा की एक त्रुटि नहीं है। इसका सीधा संबंध नगर निकाय की वित्तीय क्षमता से है।
CAG की जांच में वसई-विरार महानगरपालिका से संबंधित 2013 से 2016 के बीच 48 मामलों में लगभग 4.22 करोड़ रुपये की कम वसूली का उल्लेख किया गया।
यह कहना उचित नहीं होगा कि यह पूरी रकम किसी ने हड़प ली। लेकिन इससे यह प्रश्न अवश्य पैदा होता है-
यदि संशोधित दरें लागू हो चुकी थीं, तो उनका उपयोग क्यों नहीं हुआ?
क्या संबंधित अधिकारियों को जानकारी नहीं थी? क्या आंतरिक नियंत्रण कमजोर था? क्या शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया में पर्याप्त स्वचालन नहीं था? या फिर किसी अधिकारी के विवेक पर इतनी निर्भरता थी कि नियम के बावजूद गलत दर लंबे समय तक लागू होती रही? सार्वजनिक वित्त में ऐसी प्रत्येक कमी का अर्थ है कि किसी न किसी स्तर पर नागरिक हित प्रभावित हो सकता है।
तीन करोड़ छब्बीस लाख रुपये की अतिरिक्त कीमत
निर्माण परियोजनाओं में देरी कोई असाधारण घटना नहीं है। लेकिन जब देरी की कीमत सार्वजनिक खजाने को चुकानी पड़े, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वसई-विरार में सड़क, नाला और पुल निर्माण से संबंधित कुछ कार्यों में देरी के कारण लागत बढ़ी। भूमि पर अतिक्रमण, विद्युत खंभों का स्थानांतरण, उपयोगिता सेवाओं को हटाने तथा नक्शों की उपलब्धता जैसी समस्याओं का उल्लेख सामने आया।
लेखा-परीक्षण के अनुसार लगभग 3.26 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च टाला जा सकता था। यह रकम “चोरी” सिद्ध नहीं करती।
लेकिन यह प्रशासनिक दक्षता पर गंभीर प्रश्न जरूर उठाती है।
यदि किसी परियोजना की शुरुआत से पहले भूमि, नक्शे और आवश्यक अनुमतियां पूरी तरह सुनिश्चित नहीं थीं, तो ठेका क्यों दिया गया? और यदि प्रशासनिक तैयारी अधूरी थी, तो उसकी कीमत जनता क्यों चुकाए?
कचरा उठाने वाली गाड़ियां और निष्क्रिय पूंजी
कचरा प्रबंधन किसी भी महानगरपालिका की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है। वसई-विरार जैसे तेजी से बढ़ते शहर में इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। महानगरपालिका ने कचरा संग्रहण के लिए वाहन खरीदे।
लेकिन लेखा-परीक्षण में पाया गया कि कुछ वाहनों के पंजीकरण और उपयोग में काफी देरी हुई और वे लंबे समय तक निष्क्रिय रहे। परिणामस्वरूप जिस बचत की अपेक्षा की गई थी, वह पूरी तरह हासिल नहीं हो सकी।
CAG ने लगभग 1.68 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रभाव की ओर संकेत किया। यहां प्रश्न किसी कथित रिश्वत का नहीं है।
प्रश्न है—योजना का।
सरकारी वाहन खरीदना उपलब्धि नहीं है। उसे समय पर सड़क पर उतारना उपलब्धि है। यदि शहर में कचरा मौजूद है और नगरपालिका की खरीदी हुई गाड़ी खड़ी है, तो कागज पर संपत्ति मौजूद होने के बावजूद नागरिक के अनुभव में वह अनुपस्थित है।
पेड़, सुरक्षा कवच और गायब होती जवाबदेही
पेड़ लगाने और उनके संरक्षण के लिए लगाए गए सुरक्षा घेरे यानी वृक्ष-रक्षक से जुड़ा मामला भी सरकारी जांच के दायरे में आया।
लगभग 49,600 वृक्ष-रक्षकों की स्थापना और करीब 10.94 करोड़ रुपये के भुगतान से जुड़े प्रश्न उठे। शिकायत में लगभग सात करोड़ रुपये के कथित गबन की बात सामने आई।
सरकारी जांच में निविदा तैयार करने, कार्यान्वयन, माप, निरीक्षण और निगरानी जैसी प्रक्रियाओं में अनियमितताओं का उल्लेख हुआ तथा जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की दिशा में कदम उठाने की बात सामने आई।
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न रकम से भी बड़ा है—
यदि हजारों सार्वजनिक संपत्तियां खरीदी और स्थापित की गई थीं, तो उनका भौतिक सत्यापन कैसे हुआ?
कागज पर संख्या लिख देना और जमीन पर वही संख्या मौजूद होना—दो अलग बातें हैं।
24.64 करोड़ रुपये की परियोजना और कचरे का प्रश्न
गोखिवरे स्थित वैज्ञानिक भराव स्थल से जुड़ी लगभग 24.64 करोड़ रुपये की परियोजना पर भी सरकारी स्तर पर जांच की आवश्यकता महसूस की गई।
यहां सवाल केवल परियोजना की लागत का नहीं था। सवाल था – क्या जिस ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, वह पूरी कचरा-प्रसंस्करण व्यवस्था के साथ प्रभावी रूप से काम कर रहा था?
कचरा प्रबंधन किसी एक संयंत्र या एक ठेके से नहीं चलता। संग्रहण, परिवहन, तौल, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और अंतिम निस्तारण – सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। यदि एक कड़ी कमजोर है, तो पूरी श्रृंखला प्रभावित होती है।
लेखा-परीक्षण का अर्थ क्या है?
CAG की रिपोर्ट को केवल सरकारी लेखा-पुस्तक का दस्तावेज समझना भूल होगी। लेखा-परीक्षण वास्तव में शासन व्यवस्था का परीक्षण है।
वह पूछता है—
किसने योजना बनाई? किसने अनुमति दी? किसने भुगतान किया? किसने निरीक्षण किया? देरी क्यों हुई? राजस्व कम क्यों वसूला गया? खरीदी गई संपत्ति उपयोग में क्यों नहीं आई?
और सबसे महत्वपूर्ण –
क्या गलती दोबारा न हो, इसके लिए कुछ बदला गया? यदि लेखा-परीक्षण के बाद सुधारात्मक कार्रवाई होती है, तो वह व्यवस्था को मजबूत करता है। यदि रिपोर्ट फाइलों में बंद हो जाती है, तो वह केवल इतिहास बन जाती है।
जनता के पैसे की असली कीमत
सार्वजनिक धन का मूल्य केवल उसके आंकड़े में नहीं होता। तीन करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च किसी दूसरे सार्वजनिक कार्य को प्रभावित कर सकता है। चार करोड़ रुपये की कम राजस्व वसूली किसी आवश्यक परियोजना के लिए उपलब्ध धन कम कर सकती है। निष्क्रिय कचरा वाहन स्वच्छता व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। खराब नियोजन वाली परियोजना भविष्य में और अधिक खर्च पैदा कर सकती है।
इसलिए सार्वजनिक धन की बर्बादी का अंतिम असर अक्सर लेखा-पुस्तक में दिखाई नहीं देता। वह नागरिक के जीवन में दिखाई देता है।
अंतिम सवाल
भ्रष्टाचार की खोज केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि पैसा किसने लिया।
कभी-कभी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न होता है-
पैसा बचाया क्यों नहीं गया?
क्योंकि शासन में लापरवाही और भ्रष्टाचार कानूनी रूप से अलग अवधारणाएं हो सकती हैं, लेकिन दोनों का परिणाम कभी-कभी एक जैसा होता है –
जनता के संसाधनों का नुकसान।
और इसलिए एक जागरूक समाज को रिश्वत के साथ-साथ उस प्रशासनिक लापरवाही पर भी प्रश्न करना चाहिए जो सार्वजनिक धन को बिना उचित परिणाम के खर्च होने देती है। क्योंकि जनता के पैसे का अपव्यय भी अंततः जनता के अधिकार का क्षरण है।
नोट:
इस श्रृंखला में उल्लिखित ACB/ED मामले, FIR, आरोप, audit observations और सरकारी जांचें अपनी-अपनी कानूनी एवं प्रशासनिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग महत्व रखती हैं। किसी आरोप, गिरफ्तारी, FIR अथवा जांच को न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के समान नहीं माना जाना चाहिए। जिन मामलों में जांच या न्यायिक प्रक्रिया लंबित है, उनमें अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच एजेंसी अथवा न्यायालय के निर्णय के अधीन होंगे।
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