वसई-विरार | मेट्रो सिटी समाचार: वसई-विरार शहर महानगरपालिका (VVCMC) में 14 सड़कों के डांबरीकरण/कंक्रीटीकरण कार्य को लेकर बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। वसई की विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने आयुक्त को विस्तृत शिकायत देकर आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार स्वीकृत सड़कों के लिए टेंडर जारी हुआ, कार्यादेश (Work Order) निकाला गया और 60 दिन में काम पूरा करने की स्पष्ट शर्त रखी गई — लेकिन समयसीमा समाप्त होने के बावजूद कार्य पूर्ण नहीं हुआ। इसके बावजूद उद्घाटन कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसे लेकर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
शिकायत के अनुसार 2 अक्टूबर 2025 को निविदा प्रक्रिया जारी की गई थी। निविदा सूचना प्रकाशित हुई, जिसमें कई सड़कों की सूची और करोड़ों रुपये की अनुमानित लागत का उल्लेख था। इसके बाद संबंधित सड़कों के लिए कार्यादेश जारी किया गया और 60 दिन की अवधि तय की गई। विशेष रूप से गोखिवरे तालाव से माणिकपुर और माणिकपुर नाका से दत्तानी मॉल मार्ग का उल्लेख शिकायत में किया गया है। विधायक का कहना है कि निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी कार्य पूर्ण नहीं हुआ और उद्घाटन के बाद भी काम अधूरा रहा।
शिकायत के अनुसार, 30 सितंबर 2025 को विधायक द्वारा सड़कों की तत्काल मरम्मत की मांग करते हुए पूर्व पत्र भी भेजा गया था। इसके बाद 02/10/2025 को निविदा जारी हुई, जिसकी सूचना स्थानीय समाचारपत्र में प्रकाशित हुई और 8 सड़कों की टेंडर सूची तथा करोड़ों की अनुमानित लागत का उल्लेख किया गया। महानगरपालिका द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र भेजे जाने और प्रस्ताव MMRDA को अग्रेषित करने का भी उल्लेख दस्तावेजों में है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ाई गई थी।
विधायक ने अपनी शिकायत में कार्यादेश और वास्तविक प्रगति के बीच विसंगति का आरोप लगाया है। उन्होंने यह भी कहा है कि निविदा प्रक्रिया और ठेकेदार चयन में संभावित अनियमितता की जांच की जानी चाहिए। सबसे गंभीर आरोप यह है कि अधूरे कार्य की स्थिति में उद्घाटन आयोजित कर वास्तविक स्थिति की जानकारी महापौर तक सही रूप में नहीं पहुंचाई गई, जिससे उन्हें गुमराह किया गया हो सकता है।
शिकायत में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि संबंधित अधिकारियों की विभागीय जांच कराई जाए, कार्यादेश निरस्त करने पर विचार किया जाए और संबंधित टेंडर धारक ठेकेदार कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया जाए। विधायक ने कहा है कि यदि 60 दिन की अनुबंधित अवधि समाप्त हो चुकी थी, तो नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए थी।
शिकायत में दर्ज प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार 14 सड़कों के कंक्रीटीकरण का निर्णय।
02/10/2025 को निविदा प्रक्रिया जारी।
02/12/2025 को कुछ सड़कों के कार्य का उद्घाटन।
निविदा शर्त के अनुसार 60 दिनों में कार्य पूर्ण होना था।
समयसीमा में कार्य पूर्ण नहीं हुआ।
उद्घाटन के बाद भी काम अधूरा रहा।
कार्यादेश और वास्तविक प्रगति में विसंगति।
निविदा प्रक्रिया व ठेकेदार चयन में संभावित अनियमितता का आरोप।
संबंधित अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री के निर्देशों की अवहेलना का आरोप।
कानूनी दृष्टि से यह मामला अनुबंध शर्तों के पालन से जुड़ा है। यदि कार्यादेश की वैधता समाप्त हो गई थी और अवधि विस्तार का कोई औपचारिक आदेश नहीं था, तो अनुबंध के अनुसार ठेकेदार पर पेनल्टी, बैंक गारंटी जब्ती या अनुबंध निरस्तीकरण की कार्रवाई संभव है। यही कारण है कि ब्लैकलिस्ट की मांग इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देती है।
राजनीतिक रूप से यह मामला अब खुला टकराव बनता दिख रहा है। एक ओर विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की मांग की है, वहीं उद्घाटन कार्यक्रम में राजनीतिक उपस्थिति ने “विकास कार्य के श्रेय” की बहस को भी हवा दी है। स्थानीय राजनीति में इसे सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला संवेदनशील बन गया है। उद्घाटन कार्यक्रम में राजनीतिक पदाधिकारियों की उपस्थिति और अधूरे कार्य के आरोपों ने स्थानीय राजनीति को गरमा दिया है। अब यह चर्चा का विषय है कि क्या उद्घाटन से पहले कार्य की वास्तविक स्थिति की प्रशासनिक समीक्षा की गई थी। यदि महापौर या अन्य पदाधिकारी उद्घाटन में शामिल थे, तो यह भी प्रश्न उठ रहा है कि उन्हें कार्य प्रगति की पूरी जानकारी दी गई थी या नहीं। हालांकि शिकायत में सीधे तौर पर महापौर को गुमराह करने का आरोप दर्ज नहीं है, लेकिन अब संभावित प्रतिक्रियाओं पर नजर टिकी है।
महानगरपालिका आयुक्त के सामने अब कई विकल्प हैं — प्राथमिक जांच समिति गठित करना, इंजीनियरिंग विभाग से विस्तृत रिपोर्ट मंगाना, अनुबंध शर्तों की समीक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर ठेकेदार को नोटिस जारी करना। यदि जांच में अनियमितता सिद्ध होती है, तो प्रशासनिक कार्रवाई और ब्लैकलिस्टिंग जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
यह प्रकरण अब केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, सार्वजनिक धन के उपयोग और अनुबंध पालन की जवाबदेही का प्रश्न बन गया है। वसई-विरार की जनता अब यह जानना चाहती है कि 14 सड़कों के लिए स्वीकृत कार्यों की वास्तविक स्थिति क्या है और निर्धारित समयसीमा के बाद भी अधूरे कार्य के लिए जिम्मेदार कौन है।
अब निगाहें महानगरपालिका आयुक्त पर टिकी हैं। क्या वे प्राथमिक जांच समिति गठित करेंगे? क्या इंजीनियरिंग विभाग से विस्तृत रिपोर्ट मांगी जाएगी? क्या ठेकेदार को नोटिस जारी होगा? यदि जांच में अनियमितता और देरी की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार दोनों पर कार्रवाई संभव है।
वसई-विरार की जनता अब यह जानना चाहती है कि 14 सड़कों के लिए स्वीकृत कार्य की वास्तविक स्थिति क्या है, 60 दिन की समयसीमा के बाद भी देरी क्यों हुई और क्या इस मामले में ठोस प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे?
(महापौर और महानगरपालिका प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होते ही प्रकाशित की जाएगी।)
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