Metro City Samachar | विशेष खोजी श्रृंखला | VVCMC ACCOUNTABILITY FILES | PART 2

विशेष पड़ताल: विकास शुल्क की कम वसूली, निर्माण कार्यों में अतिरिक्त खर्च, वर्षों तक निष्क्रिय रहे कचरा वाहन और हजारों वृक्ष-रक्षकों से जुड़ा विवाद। आखिर सरकारी जांच और ऑडिट आपत्तियों के बाद कितनी जवाबदेही तय हुई?

वसई-विरार | मेट्रो सिटी समाचार विशेष रिपोर्ट

भ्रष्टाचार की खबर आमतौर पर तब सुर्खियों में आती है, जब कोई सरकारी अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ा जाता है। कैमरों के सामने गिरफ्तारी होती है, जांच एजेंसियां कार्रवाई करती हैं और पूरे मामले की चर्चा शुरू हो जाती है।

लेकिन जनता के पैसों की बर्बादी की हर कहानी में गिरफ्तारी, रिश्वत या पुलिस कार्रवाई जरूरी नहीं होती।

कभी-कभी पूरी कहानी सरकारी ऑडिट रिपोर्ट के कुछ पन्नों में छिपी होती है। उनमें दर्ज होते हैं करोड़ों रुपये के आंकड़े, प्रशासनिक गलतियां, अधूरे कार्य, अनावश्यक खर्च और ऐसे सवाल, जिनके जवाब वर्षों बाद भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं होते।

वसई-विरार शहर महानगरपालिका से संबंधित नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट और विभिन्न सरकारी जांचों में सामने आए मामलों को देखें, तो एक गंभीर प्रश्न उठता है—

क्या महानगरपालिका ने जनता के पैसों का इस्तेमाल पूरी जिम्मेदारी, पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन के साथ किया?

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है। सरकारी ऑडिट में मिली वित्तीय अनियमितता अपने आप में आपराधिक भ्रष्टाचार या गबन का अंतिम प्रमाण नहीं होती। लेकिन यदि गलत प्रशासनिक निर्णयों, कमजोर निगरानी या अधूरी योजना के कारण सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, तो उसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

₹4.22 करोड़ का विकास शुल्क कम क्यों वसूला गया?

किसी भी महानगरपालिका के लिए विकास शुल्क आय का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। इसी राजस्व से शहर में सड़क, नाले, जलनिकासी, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य आवश्यक विकास कार्यों को वित्तीय सहायता मिल सकती है।

CAG की महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों से संबंधित ऑडिट रिपोर्ट में वसई-विरार महानगरपालिका के 48 मामलों में वर्ष 2013 से 2016 के दौरान लगभग ₹4.22 करोड़ के विकास शुल्क की कम वसूली दर्ज की गई।

रिपोर्ट के अनुसार, संशोधित दरें लागू होने के बावजूद कुछ मामलों में पुरानी दरों के आधार पर शुल्क वसूला गया।

महानगरपालिका ने फरवरी 2017 में संशोधित दरें लागू नहीं करने का कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया था, ऐसा ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख है।

अब सवाल है—

जब सरकार ने विकास शुल्क की नई दरें निर्धारित कर दी थीं, तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ?

गलत दरों पर शुल्क निर्धारण किस स्तर पर किया गया? क्या संबंधित प्रस्तावों की दोबारा जांच हुई? कितनी राशि बाद में वसूली गई? और क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई?

यह दावा करना उचित नहीं होगा कि कम वसूली की पूरी राशि किसी ने हड़प ली। लेकिन नियमों के अनुसार वसूल किए जाने वाले राजस्व का समय पर नहीं मिलना भी नगर निगम की वित्तीय क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

जनता को यह जानने का अधिकार है कि ₹4.22 करोड़ की इस ऑडिट आपत्ति पर अंततः क्या कार्रवाई हुई।

₹3.26 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान—अधूरी तैयारी की कीमत किसने चुकाई?

किसी भी सार्वजनिक परियोजना में देरी का अर्थ केवल काम देर से पूरा होना नहीं होता। इसका सीधा असर परियोजना की लागत पर भी पड़ सकता है।

वसई-विरार महानगरपालिका से संबंधित निर्माण कार्यों के मामले में CAG ने उल्लेख किया कि ठेकेदार को समय पर आवश्यक नक्शे और बाधामुक्त कार्यस्थल उपलब्ध नहीं कराया गया।

इस कारण अनुबंध की अवधि बढ़ानी पड़ी और लगभग ₹3.26 करोड़ का टाला जा सकने वाला मूल्य-वृद्धि भुगतान करना पड़ा।

अब प्रश्न उठता है कि परियोजना का ठेका देने से पहले जमीन की वास्तविक स्थिति, अतिक्रमण, आवश्यक नक्शे, बिजली के खंभों और अन्य बाधाओं का उचित आकलन क्यों नहीं किया गया?

यदि किसी परियोजना की प्रशासनिक तैयारी अधूरी थी, तो निर्माण कार्य का अनुबंध किस आधार पर आगे बढ़ाया गया?

और यदि इसी अधूरी तैयारी की वजह से ठेके की कीमत बढ़ी, तो अतिरिक्त भुगतान की जवाबदेही किसकी थी?

यहां मुद्दा केवल रकम का नहीं है। मुद्दा यह है कि सरकारी परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन के बीच जिम्मेदारी की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

क्योंकि यदि योजना बनाने में लापरवाही होगी, तो उसकी आर्थिक कीमत अंततः सरकारी खजाने को चुकानी पड़ेगी।

कचरा उठाने के लिए खरीदे वाहन 8 से 37 महीने तक निष्क्रिय क्यों रहे?

वसई-विरार में कचरा प्रबंधन की समस्या लंबे समय से सार्वजनिक चर्चा का विषय रही है।

महानगरपालिका का काम केवल कचरा संग्रहण के लिए वाहन खरीदना नहीं, बल्कि उन्हें समय पर उपयोग में लाकर नागरिकों को प्रभावी सेवा देना भी है।

CAG की रिपोर्ट में सामने आया कि महानगरपालिका द्वारा खरीदे गए कचरा संग्रहण वाहनों के पंजीकरण और नियुक्त एजेंसियों को हस्तांतरण में देरी हुई।

इसके कारण वाहन 8 से 37 महीने तक निष्क्रिय रहे।

इस देरी से कचरा संग्रहण पर महानगरपालिका के खर्च में अपेक्षित कमी नहीं हो सकी। ऑडिट ने इसका वित्तीय प्रभाव लगभग ₹1.68 करोड़ बताया।

यह आंकड़ा अपने आप में चोरी या गबन का प्रमाण नहीं है।

लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा सवाल जरूर उठाता है।

यदि वाहन खरीद लिए गए थे, तो उनके पंजीकरण और संचालन की पूर्व तैयारी क्यों नहीं की गई?

किस विभाग को वाहन समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई थी?

नए वाहन उपलब्ध होने के बावजूद कचरा संग्रहण व्यवस्था पर अपेक्षित खर्च कम क्यों नहीं हुआ?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस देरी के कारणों की जांच कर जवाबदेही तय की गई?

कागज पर वाहन खरीद लेना प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है। खरीदे गए वाहन का समय पर जनता की सेवा में उतरना वास्तविक उपलब्धि है।

49,600 वृक्ष-रक्षक और लगभग ₹10.94 करोड़ का मामला

वसई-विरार महानगरपालिका में पेड़ लगाने और उनकी सुरक्षा के लिए लगाए जाने वाले लोहे के वृक्ष-रक्षकों का मामला भी वर्षों तक विवाद और सरकारी जांच का विषय रहा।

वर्ष 2014 में वृक्षारोपण और उनके संरक्षण से जुड़े अनुबंध के अंतर्गत लगभग 49,600 वृक्ष-रक्षक स्थापित करने का दावा सामने आया था। इन पर लगभग ₹10.94 करोड़ के भुगतान का उल्लेख न्यायिक रिकॉर्ड में मिलता है।

वर्ष 2017 में एक शिकायत के माध्यम से लगभग ₹7 करोड़ के कथित गबन का आरोप लगाया गया था।

इसके बाद मामले में सरकारी जांच हुई। जांच में निविदा की तैयारी, स्थल निरीक्षण, मापन, निगरानी और कार्यान्वयन की प्रक्रियाओं में कमियां सामने आईं।

जांच रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और विभागीय कार्रवाई की दिशा में निर्देशों का उल्लेख भी न्यायिक रिकॉर्ड में मिलता है।

फरवरी 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसे केवल पुरानी शिकायत के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

3 फरवरी 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने M/s Hirawati Enterprises बनाम वसई-विरार महानगरपालिका मामले में फैसला सुनाया।

अदालत ने वृक्ष-रक्षकों के लापता होने की जिम्मेदारी सीधे ठेकेदार पर डालने के महानगरपालिका के रुख को स्वीकार नहीं किया।

अदालत के सामने प्रस्तुत रिकॉर्ड में 17,324 वृक्ष-रक्षकों के लापता होने का मुद्दा था। न्यायालय ने यह माना कि वृक्ष-रक्षकों की निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित अनुबंध के अंतर्गत ठेकेदार पर नहीं थी।

अदालत ने ठेकेदार के पक्ष में वृक्षारोपण से संबंधित लगभग ₹3.99 करोड़ की शेष राशि के साथ निर्धारित जमा राशियां लौटाने का निर्देश भी दिया।

इस फैसले के बाद मामला एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—

यदि सार्वजनिक संपत्ति की निगरानी प्रशासन की जिम्मेदारी थी, तो हजारों वृक्ष-रक्षकों के लापता होने की जवाबदेही अंततः किन अधिकारियों पर तय हुई?

क्या विभागीय जांच पूरी हुई? क्या किसी अधिकारी से आर्थिक वसूली की गई? क्या संबंधित कार्रवाई के आदेश सार्वजनिक किए गए?

और यदि व्यवस्था में खामियां सामने आई थीं, तो भविष्य में ऐसी परिस्थितियां रोकने के लिए क्या बदलाव किए गए?

गोखिवरे कचरा परियोजना—₹24 करोड़ से अधिक के खर्च पर जांच

वसई-विरार महानगरपालिका के गोखिवरे डंपिंग ग्राउंड से जुड़ी वैज्ञानिक कचरा निस्तारण परियोजना भी सरकारी जांच के दायरे में आई।

लगभग ₹24.64 करोड़ की परियोजना को लेकर कथित अनियमितताओं और खर्च की उपयोगिता पर सवाल उठे।

सितंबर 2025 में राज्य सरकार द्वारा पालघर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय जांच समिति गठित किए जाने की खबर सामने आई थी। यह जांच वर्ष 2010 से 2017 के बीच की परियोजना से संबंधित बताई गई।

अब इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि परियोजना पर कितनी राशि खर्च हुई।

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस उद्देश्य से जनता का पैसा लगाया गया, वह उद्देश्य किस हद तक पूरा हुआ?

क्या परियोजना के उपकरण और सुविधाएं निर्धारित क्षमता से संचालित हुए? क्या भुगतान के अनुरूप काम का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या खर्च की गई रकम के अनुपात में शहर की कचरा समस्या में सुधार दिखाई दिया?

कचरा प्रबंधन एक पूरी व्यवस्था है—जिसमें संग्रहण, परिवहन, तौल, प्रसंस्करण और अंतिम निस्तारण शामिल हैं।

यदि इस पूरी श्रृंखला में कोई भी कड़ी कमजोर होती है, तो उसके परिणाम केवल सरकारी रिपोर्ट में नहीं, शहर की सड़कों और नागरिकों के आसपास दिखाई देते हैं।

ऑडिट रिपोर्ट आई, जांच हुई—लेकिन सुधार कितना हुआ?

इन सभी मामलों को एक साथ देखने पर एक समान प्रश्न सामने आता है।

सरकारी तंत्र में किसी भी काम की जिम्मेदारी केवल आदेश देने या भुगतान मंजूर करने तक सीमित नहीं हो सकती।

जिस अधिकारी ने प्रस्ताव तैयार किया, जिसने तकनीकी मंजूरी दी, जिसने ठेका प्रक्रिया आगे बढ़ाई, जिसने काम का निरीक्षण किया और जिसने भुगतान की स्वीकृति दी—हर स्तर पर उचित दस्तावेज और जवाबदेही होनी चाहिए।

CAG रिपोर्ट का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होता कि किसी विशेष वर्ष में कितनी वित्तीय अनियमितताएं मिलीं।

उसका एक बड़ा उद्देश्य प्रशासनिक सुधार और भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकना भी है।

लेकिन यदि ऑडिट आपत्तियों के बाद केवल पत्राचार हुआ, और जनता को अंतिम कार्रवाई की जानकारी नहीं मिली, तो सार्वजनिक निगरानी का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

महानगरपालिका प्रशासन से पांच सीधे सवाल

पहला सवाल: ₹4.22 करोड़ की विकास शुल्क कम वसूली में अब तक कितनी रकम की वसूली हुई और कितनी शेष है?

दूसरा सवाल: ₹3.26 करोड़ के अतिरिक्त मूल्य-वृद्धि भुगतान के मामले में क्या प्रशासनिक जिम्मेदारी निर्धारित की गई?

तीसरा सवाल: कचरा संग्रहण वाहनों को 8 से 37 महीने तक निष्क्रिय रखने के लिए किन विभागों से जवाब मांगा गया?

चौथा सवाल: वृक्ष-रक्षक मामले में सरकारी जांच और फरवरी 2026 के न्यायालयीन फैसले के बाद अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है?

पांचवां सवाल: गोखिवरे कचरा परियोजना की जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या है, और उसकी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई हुई?

इन सवालों का उत्तर सार्वजनिक करना महानगरपालिका की पारदर्शिता और नागरिक जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण होगा।

जनता के पैसे का नुकसान केवल रुपयों में नहीं मापा जाता

₹4.22 करोड़ की कम वसूली हो या ₹3.26 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान—ये केवल सरकारी खातों में दर्ज आंकड़े नहीं हैं।

यह वही सार्वजनिक संसाधन हैं जिनका उपयोग शहर की सड़कें सुधारने, जलनिकासी व्यवस्था मजबूत करने, कचरा प्रबंधन बेहतर बनाने और नागरिक सुविधाएं बढ़ाने में हो सकता था।

हालांकि, इन अलग-अलग मामलों की वित्तीय राशियों को जोड़कर एक ही घोटाले की रकम बताना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले का लेखा और कानूनी स्वरूप अलग है।

लेकिन इनसे प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही का साझा प्रश्न अवश्य सामने आता है।

जनता का पैसा केवल सही उद्देश्य से खर्च होना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि उसका वास्तविक लाभ जनता तक समय पर पहुंचे।

अंतिम सवाल—पैसा किसने लिया नहीं, पैसा बचाया क्यों नहीं?

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई जरूरी है। लेकिन शासन व्यवस्था का मूल्यांकन केवल रिश्वतखोरी के मामलों से नहीं किया जा सकता।

जहां बिना पर्याप्त तैयारी के परियोजनाएं शुरू होती हैं, जहां सरकारी वाहन महीनों और वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहते हैं, जहां निर्धारित शुल्क की कम वसूली होती है और जहां खरीदी गई सार्वजनिक संपत्तियों का पूरा हिसाब नहीं मिलता, वहां प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है।

लापरवाही और आपराधिक भ्रष्टाचार कानून की दृष्टि से अलग विषय हैं। हर वित्तीय अनियमितता को भ्रष्टाचार कहना भी उचित नहीं है।

लेकिन जिस प्रशासनिक गलती से सार्वजनिक खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, उसका कारण सामने आना चाहिए और उसके दोहराव को रोकने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।

क्योंकि जनता के पैसे का असली हिसाब केवल यह नहीं कि कितना खर्च हुआ—बल्कि यह भी है कि बदले में जनता को क्या मिला।

और यही है मेट्रो सिटी समाचार की विशेष खोजी श्रृंखला VVCMC ACCOUNTABILITY FILES का मूल उद्देश्य—सरकारी दस्तावेजों, लेखा-परीक्षण और जांच रिपोर्टों के आधार पर वसई-विरार महानगरपालिका की जवाबदेही से जुड़े सवालों को जनता के सामने रखना।

मेट्रो सिटी समाचार | विशेष रिपोर्ट

रिपोर्ट के लिए आधिकारिक एवं न्यायिक संदर्भ
CAG — Maharashtra Local Bodies Audit, 2016–17: विकास शुल्क की कम वसूली, ₹3.26 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान और ₹1.68 करोड़ के कचरा वाहन संबंधी वित्तीय प्रभाव के संदर्भ।
-Comptroller and Auditor General of India
बॉम्बे हाईकोर्ट, 3 फरवरी 2026: M/s Hirawati Enterprises vs Vasai Virar Municipal Corporation, Writ Petition 3413/2021। वृक्ष-रक्षक विवाद और भुगतान संबंधी न्यायालयीन निष्कर्ष।
Indian Kanoon
गोखिवरे कचरा परियोजना: सितंबर 2025 में उच्चस्तरीय जांच समिति गठित किए जाने की रिपोर्ट।
Mumbai news
वर्तमान संदर्भ, अक्टूबर 2026: गोखिवरे कचरा प्रबंधन, जांच रिपोर्ट और भुगतान संबंधी सवाल महानगरपालिका की महासभा में भी उठे हैं।

संपादकीय नोट: इस रिपोर्ट में CAG की वित्तीय टिप्पणियां, सरकारी जांचें, शिकायतों में लगाए गए आरोप तथा न्यायालयीन निष्कर्ष अलग-अलग संदर्भों में प्रस्तुत किए गए हैं। किसी वित्तीय अनियमितता, FIR, शिकायत या जांच को अपने आप में आपराधिक दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए। रिपोर्ट में जिन मामलों के अंतिम अनुपालन या विभागीय कार्रवाई की स्थिति उपलब्ध नहीं है, उन पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।