VVCMC Election: महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनावों को प्रायः गौण मान लिया जाता है, मानो लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल विधानसभा या लोकसभा में ही होती हो। यह धारणा न केवल भ्रामक है, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के लिए घातक भी है।
लोकतंत्र की सबसे पहली, सबसे निकट और सबसे प्रभावशाली इकाई नगरपालिका होती है. वही संस्था जो नागरिक के दैनिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है: जलापूर्ति, सड़कें, स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, निर्माण अनुमति और अतिक्रमण नियंत्रण।
15 जनवरी 2025 को होने वाला वसई–विरार शहर महानगरपालिका का चुनाव इसी सच्चाई की निर्णायक परीक्षा है। यह चुनाव केवल सत्ता-परिवर्तन का अवसर नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति पर जनादेश है, जो वर्षों से स्थायी आसनों और क्षणिक उत्तरदायित्व के सहारे संचालित होती रही है।
नगरपालिका: सेवा-एजेंसी नहीं, संवैधानिक संस्था
नगरपालिकाएँ ठेकेदारों और फाइलों का संकुल मात्र नहीं हैं। वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 243-W के अंतर्गत स्थापित स्वशासी लोकतांत्रिक संस्थाएँ हैं, जिन पर अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं न्यायसंगत प्रशासन का अधिकार) तथा विधि के शासन (Rule of Law) का पूर्ण दायित्व लागू होता है।
अतः स्थानीय चुनाव केवल विकास-वादों की प्रतियोगिता नहीं होते, बल्कि यह तय करते हैं कि संविधान की आत्मा धरातल पर जीवित है या नहीं।
इसी कसौटी पर वसई विरार शहर महानगरपालिका का प्रशासन गंभीर प्रश्नों के कटघरे में खड़ा दिखाई देता है।
नीति का अभाव, नेटवर्कों का प्रभुत्व
वसई–विरार महानगरपालिका में स्थानांतरण-प्रणाली किसी सुव्यवस्थित नीति के अधीन नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षण की रणनीति बन चुकी है।
स्पष्ट, सार्वजनिक और बाध्यकारी स्थानांतरण नीति का अभाव इस तथ्य की पुष्टि करता है कि निर्णय नियमों से नहीं, बल्कि आंतरिक गठजोड़ों और समीकरणों से संचालित हो रहे हैं।
जहाँ संविधान निष्पक्षता और समानता की अपेक्षा करता है, वहाँ वर्षों तक एक ही पद पर जमे अधिकारी प्रशासन को व्यक्ति-प्रधान बना देते हैं। यह प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि संवैधानिक विचलन है।
कानून पुस्तकों में, क्रियान्वयन फाइलों में दफ़न
महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम, 1949 तथा महाराष्ट्र सरकारी सेवक स्थानांतरण विनियमन अधिनियम, 2005 – इन दोनों का उद्देश्य स्पष्ट है:
- शक्ति का सीमित एवं नियंत्रित प्रयोग
- निष्पक्ष और उत्तरदायी प्रशासन
- भ्रष्टाचार की संभावनाओं का न्यूनिकरण
किन्तु वसई–विरार शहर महानगरपालिका में ये कानून दिशा-सूचक बनने के स्थान पर मात्र औपचारिक पाठ बनकर रह गए हैं।
जब राज्य प्रशासन में स्थानांतरण नियम लागू हो सकते हैं, तो स्थानीय निकायों में उनका पालन न होना संवैधानिक असमानता का द्योतक है।
दीर्घकालिक पदस्थापन: प्रशासनिक क्षरण की जड़
वसई–विरार महानगरपालिका में दीर्घकालिक पदस्थापन कोई अपवाद नहीं, बल्कि प्रणालीगत रोग बन चुका है।
उदाहरण स्वरुप स्वास्थ्य विभाग जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ वैद्यकीय आरोग्य अधिकारी (मुख्यालय) जैसे पद वर्षों तक एक ही व्यक्ति के अधीन रहते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य, महामारी प्रबंधन तथा औषधि-क्रय जैसे निर्णय जब लंबे समय तक एक ही हाथ में केंद्रित रहते हैं, तो निगरानी शिथिल होती है और हितों का टकराव स्वाभाविक हो जाता है।
यही स्थिति नगर नियोजन/Town Planning, भवन प्रस्ताव, अतिक्रमण/अनधिकृत बांधकाम, अनुज्ञा (लाइसेंसिंग),प्रभाग कार्यालय,ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं सार्वजनिक बांधकाम विभाग में भी दृष्टिगोचर होती है, जहाँ 5, 7,10 वर्षों से जमे अधिकारी प्रशासन को व्यक्तिगत साम्राज्य में परिवर्तित कर देते हैं।
संवैधानिक दुष्परिणाम: लोकतंत्र का क्षरण
इस प्रशासनिक संरचना के परिणाम गम्भीर और दूरगामी हैं:
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन – समान नागरिकों के साथ असमान व्यवहार
- मनमानी – नियम गौण, व्यक्ति प्रधान
- भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण – रिश्वत अपवाद नहीं, अपेक्षित प्रक्रिया
- लोक-विश्वास का ह्रास – नागरिक हताश, व्यवस्था निरंकुश
जब नागरिक को यह अनुभव होने लगे कि शिकायत व्यर्थ है, तभी लोकतंत्र भीतर से पराजित होने लगता है।
स्थानांतरण: सुधार का साधन या भय के बाद की कार्रवाई
वसई–विरार महानगरपालिका में स्थानांतरण प्रायः जांच,छापे या मीडिया-दबाव के पश्चात किए जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि स्थानांतरण नीति निवारक नहीं, प्रतिक्रियात्मक है।
सुशासन में स्थानांतरण भ्रष्टाचार-निरोध का उपकरण होता है; यहाँ वह नुकसान छिपाने का आवरण बन चुका है।
पारदर्शिता: अधिकार काग़ज़ों में, व्यवहार में शून्य
सूचना का अधिकार अधिनियम प्रशासन को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने का संवैधानिक साधन है। इसके बावजूद:
- स्थानांतरण आदेशों का कोई सार्वजनिक एवं समेकित अभिलेख उपलब्ध नहीं
- विभागीय कार्य-प्रदर्शन प्रतिवेदन सार्वजनिक नहीं
- आंतरिक लेखा-परीक्षा प्रतिवेदन नागरिकों की पहुँच से बाहर
इस स्थिति में प्रशासन संवैधानिक संस्था न रहकर विवेकाधीन सत्ता का रूप ले लेता है।
15 जनवरी 2025: यह मतदान नहीं, जमी हुई सत्ता के नाम संवैधानिक संदेश
15 जनवरी 2025 को वसई–विरार की जनता जब मताधिकार का प्रयोग करेगी, तब वह केवल नगरसेवकों का चयन नहीं करेगी।
वह यह निर्णय करेगी कि क्या वह स्थानांतरण-विहीन सत्ता, जमी हुई कुर्सियों और उत्तरदायित्व-विहीन प्रशासन को और समय देना चाहती है या फिर संविधान की भावना के अनुरूप पारदर्शी, उत्तरदायी और नियमबद्ध स्थानीय शासन की मांग करेगी।
जनता के समक्ष वसई–विरार शहर महानगरपालिका से अनिवार्य प्रश्न!
- क्या महानगरपालिका के पास विधिवत स्वीकृत एवं सार्वजनिक स्थानांतरण नीति है?
- कितने अधिकारी 3, 5 तथा 10 वर्षों से एक ही विभाग में पदस्थ हैं?
- संवेदनशील पदों की पहचान एवं अनिवार्य रोटेशन क्यों नहीं?
- दीर्घकालिक पदस्थापन को भ्रष्टाचार-जोखिम के रूप में क्यों नहीं माना गया?
- शिकायत निवारण प्रणाली की प्रभावशीलता मापने के ठोस मानक कहाँ हैं?
- पिछले पाँच वर्षों में कितनी वास्तविक अनुशासनात्मक कार्रवाइयाँ हुईं?
वसई–विरार शहर महानगरपालिका में सुधार अब प्रशासनिक विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है।
यदि 15 जनवरी 2025 के पश्चात भी “स्थायी आसन” यथावत रहते हैं और उत्तरदायित्व केवल स्थानांतरित होता है, तो यह केवल एक महानगरपालिका की विफलता नहीं होगी—यह लोकतंत्र की खुली पराजय होगी।
यह चुनाव नगरसेवकों के चयन का नहीं,
यह तय करने का दिन है कि वसई–विरार में “संविधान” शासक होगा या फिर “कुर्सियाँ”?
और यदि जनता ने अब भी मौन चुना,
तो भविष्य में उत्तरदायित्व नहीं, केवल आदेश प्राप्त होंगे।
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