VVCMC Election: 15 जनवरी 2025 को होने वाला वसई–विरार शहर महानगरपालिका का चुनाव किसी सामान्य स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं है।यह एक ऐसे शहर का जनादेश है, जहाँ सड़कें केवल आवागमन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता, नीतिगत उदासीनता और संस्थागत जवाबदेही के अभाव की सार्वजनिक गवाही बन चुकी हैं।

वसई–विरार की सड़कें आज सवाल पूछ रही हैं और इस बार जवाब पोस्टरों, नारों या आश्वासनों से नहीं, बल्कि ईवीएम में दर्ज जननिर्णय से तय होगी।

शहर की सुबह: गड्ढों से शुरू होता दिन

सुबह के समय स्कूल बसें धीमी रफ्तार से गड्ढों के बीच रास्ता तलाशती हैं। दोपहिया वाहन चालक सड़क के गड्ढों का अनुमान लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। ऑटो और बसें अचानक ब्रेक लगाती हैं। एम्बुलेंस का सायरन सुनाई देता है, पर गति नहीं बढ़ पाती।

यह दृश्य किसी एक सड़क या एक वार्ड तक सीमित नहीं है। विरार पूर्व-पश्चिम की स्टेशन कनेक्टिविटी रोड, नालासोपारा की आंतरिक गलियाँ और वसई के औद्योगिक मार्ग – हर जगह कहानी लगभग एक-सी है। वर्षों से ज्यों-की-त्यों।

सिर्फ असुविधा नहीं, संवैधानिक सवाल

अक्सर टूटी सड़कों को “नागरिक असुविधा” के रूप में देखा जाता है। लेकिन वसई–विरार में यह मुद्दा इससे कहीं आगे बढ़ चुका है।
यह अब सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

बारिश के मौसम में जलभराव गड्ढों को ढक देता है। दुर्घटनाएँ होती हैं। बारिश के बाद गड्ढों से धूल उड़ती है, जिससे दमा और एलर्जी जैसी बीमारियाँ बढ़ती हैं। जलजमाव मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है। खराब सड़कों पर वाहन चलाने से रीढ़ और जोड़ों की समस्याएँ आम हो चुकी हैं।

यह सब किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार टाले गए निर्णयों का नतीजा है।

काग़ज़ पर योजनाएँ, ज़मीन पर दरारें

महानगरपालिका के बजट दस्तावेज़ों में सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए हर वर्ष पर्याप्त आवंटन दिखाई देता है। “गड्ढा-मुक्त सड़कें”, “कंक्रीटीकरण”, “स्थायी समाधान” जैसे शब्द बार-बार दोहराए गए हैं।

फिर भी जमीनी हकीकत बदलती नहीं।
पैचवर्क होता है — और कुछ ही हफ्तों में उखड़ जाता है।
मानसून आता है — और वही सड़क फिर टूट जाती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि योजनाएँ क्यों बनीं, बल्कि यह है कि उनका परिणाम क्यों दिखाई नहीं देता।

प्रशासनिक मौन और जवाबदेही का संकट

नगरपालिका कानून स्पष्ट है — सार्वजनिक सड़कों का सुरक्षित रखरखाव स्थानीय निकाय का मूल कर्तव्य है।
फिर भी:

  • घटिया निर्माण कैसे स्वीकृत होता है?
  • वारंटी और डिफेक्ट-लायबिलिटी के बावजूद ठेकेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
  • एक ही सड़कों पर बार-बार मरम्मत के बावजूद जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?

इन सवालों के उत्तर दस्तावेज़ों में होने चाहिए थे — लेकिन वे सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं हैं।

अर्थव्यवस्था, समय और भरोसे की कीमत

खराब सड़कों की लागत केवल मरम्मत बजट तक सीमित नहीं रहती।
यह लागत नागरिकों चुकाते हैं —
ईंधन की अतिरिक्त खपत में,
काम पर देर से पहुँचने में,
वाहनों की बार-बार मरम्मत में,
और सबसे अहम — मानसिक तनाव में।

जब एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुँचती, तो यह देरी आंकड़ों में नहीं, जीवन में दर्ज होती है।

What VVCMC Must Answer – जनता की चार्जशीट

  1. मनपा क्षेत्र में सड़कों की कुल लंबाई (किमी) कितनी है और उसमें से कितनी सड़कें ‘खराब/अत्यंत खराब’ श्रेणी में हैं?
  2. पिछले 5 वर्षों में सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए कुल कितना बजट आवंटित हुआ और वास्तव में कितना खर्च किया गया?
  3. वर्षवार कौन-कौन से ठेकेदारों को कितने रोड-वर्क्स दिए गए और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?
  4. कितने रोड-वर्क्स में डिफेक्ट लायबिलिटी/वारंटी क्लॉज़ लागू किए गए और कितने मामलों में पेनाल्टी वसूली गई?
  5. एक ही सड़क पर बार-बार पैचवर्क क्यों किया गया – क्या यह डिज़ाइन विफलता, ठेकेदार की गलती या प्रशासनिक मिलीभगत है?
  6. घटिया सड़कों से हुई दुर्घटनाओं/मौतों पर किस अधिकारी या ठेकेदार के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?
  7. टेंडर, MB बुक, क्वालिटी टेस्ट रिपोर्ट और भुगतान विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर क्यों उपलब्ध नहीं हैं?
  8. क्या मनपा किसी स्वतंत्र तकनीकी/वित्तीय ऑडिट के लिए तैयार है – यदि नहीं, तो क्यों?

चुनाव और चेतावनी

15 जनवरी 2025 का चुनाव इसलिए निर्णायक है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब ये सवाल उठे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब सड़कों की हालत खुद चुनावी मुद्दा बन चुकी है।

यह चुनाव किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रणाली का मूल्यांकन है जो वर्षों से चलती रही और जिसके परिणाम वसई–विरार के नागरिक रोज़ भुगतते रहे।

कुलमिलाकर वसई–विरार की सड़कें आज लोकतंत्र की कसौटी पर खड़ी हैं। मतदाता जब मतदान केंद्र तक पहुँचेंगे,तो उनके सामने यह विकल्प होगा-
या तो वही चक्र चलता रहे:
बजट,टेडर, पैचवर्क, सड़कों की गड्ढें और दरारें-
या फिर जवाबदेही,पारदर्शिता और टिकाऊ समाधान की मांग।

यह चुनाव केवल नगरसेवकों और महापौर के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति की दिशा तय करने का अवसर है,और शायद यही इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

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