Vasai Virar: वसई-विरार शहर महानगरपालिका के चुनाव चल रहे हैं। शहर दीवारों से लेकर होर्डिंग तक “विकास” से पट गया है। लेकिन इस शोर में एक असहज सच चीख़ चीख़ कर कह रहा है कि यह शहर बीमार है, और उसकी बीमारी वसई–विरार महानगरपालिका की अकर्मण्यता और सत्ता की लापरवाही से पैदा हुई है।
प्रश्न सीधा है:
अगर आज वसई-विरार का कोई नागरिक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए, तो क्या उसे समय पर सुरक्षित, वैज्ञानिक और क़ानूनी इलाज मिलेगा?
ईमानदार उत्तर है : नहीं।
मुंबई महानगर(MMR) क्षेत्र का यह सबसे तेज़ी से बढ़ता शहरी इलाका आज एक गहरे स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। तेज़ जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित शहरीकरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की उपेक्षा ने वसई–विरार को लगभग पूरी तरह निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर बना दिया है।
बढ़ती आबादी, सिकुड़ता सरकारी स्वास्थ्य तंत्र
2011 की जनगणना में वसई–विरार की आबादी लगभग 12.2 लाख थी। विभिन्न रिपोर्टों और मीडिया अनुमानों के अनुसार 2024–25 तक यह 20–23 लाख तक पहुँच चुकी है जो महाराष्ट्र के औसत शहरी क्षेत्रों से कहीं अधिक वृद्धि दर है।
लेकिन इस आबादी के अनुपात में:
- पूर्ण सुविधायुक्त सरकारी अस्पताल: अत्यंत सीमित
- पंजीकृत निजी नर्सिंग होम/अस्पताल: लगभग 324
- OPD क्लिनिक्स: लगभग 1500
अनेक समाचार रिपोर्टों में यह तथ्य बार-बार सामने आया है कि प्रति व्यक्ति अस्पताल बेड की उपलब्धता महाराष्ट्र के औसत से भी कम है।
पुराने कानून, नई हकीकत
वसई–विरार की स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी महाराष्ट्र नर्सिंग होम रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1949 जैसे पुराने कानूनों के सहारे चल रही है। यह कानून:
- OPD क्लिनिक्स को प्रभावी रूप से कवर नहीं करता
- ICU, इंफेक्शन कंट्रोल और पेशेंट सेफ्टी जैसे आधुनिक मानकों से लगभग मौन है
- दंडात्मक प्रावधान बेहद कमज़ोर हैं
वहीं, Clinical Establishments Act, 2010 जैसा केंद्रीय कानून, जो देशभर में न्यूनतम स्वास्थ्य मानक तय करता है, महाराष्ट्र में आज तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया। नतीजा यह है कि वसई–विरार जैसे क्षेत्रों में हज़ारों क्लिनिक्स लगभग बिना प्रभावी नियमन के संचालित हो रहे हैं।
एलोपैथी का अनियंत्रित प्रयोग: सेहत के साथ खिलवाड़
जमीनी हकीकत यह है कि वसई–विरार में बड़ी संख्या में BAMS/BHMS डिग्रीधारक डॉक्टर OPD क्लिनिक्स चला रहे हैं, जहाँ:
- एलोपैथिक एंटीबायोटिक
- स्टेरॉयड
- IV फ्लूइड और इंजेक्शन
का खुलेआम और नियमित प्रयोग हो रहा है। VVCMC स्तर पर न तो प्रभावी निरीक्षण दिखता है और न ही ठोस नियंत्रण।
इसका वैज्ञानिक परिणाम बेहद गंभीर है:
- एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR)
- सेप्सिस, थ्रोम्बोफ्लेबाइटिस, एनाफिलेक्टिक शॉक
- गलत IV थैरेपी से हार्ट फेल्योर तक के मामले
WHO और ICMR पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि भारत में बढ़ती AMR के पीछे ऐसे अनियमित क्लिनिक्स एक बड़ा कारण हैं।
कानून स्पष्ट, अमल गायब
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के फैसले साफ़ कहते हैं कि बिना वैधानिक अनुमति एलोपैथी अभ्यास अवैध है। इसके बावजूद राज्य-स्तरीय नीतिगत ढील और स्थानीय प्रशासनिक निष्क्रियता के चलते यह प्रथा वर्षों से जारी है।
स्थानीय समाचार पत्रों में:
- फर्जी/अपंजीकृत डॉक्टरों पर छापे
- अवैध क्लिनिक्स का वर्षों तक बिना लाइसेंस चलना
- शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होना
जैसी खबरें बार-बार सामने आती रही हैं।
डॉक्टर और बेड: भयावह असंतुलन
RTI और मीडिया अनुमानों के अनुसार:
- MBBS डॉक्टर: लगभग 750–800
- कुल क्लिनिक्स: 1500 से अधिक
WHO मानक (1 डॉक्टर : 1000 जनसंख्या) के अनुसार वसई–विरार को 2000–2300 डॉक्टर चाहिए, जबकि उपलब्धता इसका आधा भी नहीं।
अस्पताल बेड का हाल और भी चिंताजनक है:
- आवश्यकता: लगभग 6000 बेड
- वास्तविक उपलब्धता: इससे कहीं कम
पड़ोसी शहर आगे, वसई–विरार पीछे क्यों?
मीरा–भायंदर और ठाणे:
- सरकारी अस्पताल
- मेडिकल कॉलेज
- सुपर-स्पेशियलिटी सुविधाएँ
वहीं वसई–विरार:
- कोई सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं
- गंभीर मरीजों के लिए मुंबई/ठाणे पर निर्भरता
यह फर्क सिर्फ़ संसाधनों का नहीं, राजनीतिक प्राथमिकताओं का भी है।
ऐसे हालात में मतदाताओं का यह सवाल पूछना पूरी तरह वाजिब और अपरिहार्य है:
- 1500+ OPD क्लिनिक्स में से कितनों का वैध पंजीकरण और नियमित ऑडिट हुआ?
- BAMS/BHMS द्वारा एलोपैथिक दवाओं व IV थैरेपी पर नियंत्रण क्यों नहीं?
- अब तक कितनी FIR, लाइसेंस रद्दीकरण और सज़ाएँ हुईं?
- AMR जैसी राष्ट्रीय आपदा की स्थानीय ज़िम्मेदारी किसकी है?
- 1800+ स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों पर निगरानी के लिए कितने निरीक्षक हैं?
- फर्जी डॉक्टरों पर कार्रवाई में कितने अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई?
- 6000 बेड की ज़रूरत के मुक़ाबले आज वास्तविक उपलब्धता कितनी है?
- पड़ोसी नगरपालिकाओं की तुलना में सरकारी निवेश इतना कम क्यों?
- क्या सभी लाइसेंस और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएँगी?
- क्या एक सरकारी मेडिकल कॉलेज और सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल का समयबद्ध रोडमैप है?
वसई–विरार की स्वास्थ्य व्यवस्था आज प्रशासनिक उदासीनता, कानूनी ढिलाई और निजीकरण के दबाव के त्रिकोण में फँसी है। चुनाव केवल सत्ता बदलने का अवसर नहीं, बल्कि यह तय करने का क्षण है कि नागरिकों की सेहत प्राथमिकता होगी या नहीं।
अब सवाल साफ़ है:
क्या वोट सिर्फ़ नारों पर पड़ेंगे, या सेहत जैसे बुनियादी हक़ पर भी?
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