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Wednesday, October 21, 2020

राजस्थान में अमित शाह की रणनीति से वसुंधरा सरकार की वापसी संभव है?

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के मौके पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इस सप्ताह जयपुर में थे. करीब-करीब हर हफ्ते शाह राजस्थान के दौरे पर हैं. पिछली बार कोटा गए थे. दीनदयाल जी का ननिहाल जयपुर के पास एक गांव में है. जाहिर है अभी पार्टी को उन्हें याद करने की जरूरत महसूस हो रही है.

अमित शाह चुनावी राजनीति पर मजबूत पकड़ रखते हैं. यानी उनके राजस्थान के लगातार दौरों से लगता है कि प्रदेश में पार्टी के स्तर पर या फिर सरकार के स्तर पर सबकुछ ठीकठाक नहीं है. वैसे खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जयपुर में समारोह में इस बात का दावा किया कि वहां फिर से बीजेपी की सरकार बनेगी और वसुंधरा राजे ही मुख्यमंत्री बनेंगी. यह भी बात सही है कि अमित शाह हर चुनाव को बहुत गंभीरता से लेते हैं और कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते. इसलिए भी वे जल्दी जल्दी राजस्थान जा रहे हैं.

अमित शाह के एक दिन पहले बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव भी जयपुर में थे. वैसे पार्टी में बार-बार यह भी कहा जाता है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सरकार को कोई खतरा नहीं है. राजे सरकार ने बेहतर काम किया है. पिछले चुनाव में बीजेपी को बम्पर सफलता मिली और वो भी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में. उस चुनाव के वक्त अमित शाह पार्टी महासचिव के तौर पर यूपी में चुनाव की बागडोर संभाले हुए थे.

खैर, जयपुर में शाह ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात की और जीत का मंत्र बताया और यह इशारा भी कर दिया कि चुनावों में सबको साथ मिल कर चलना होगा और पूरी ताकत लगानी होगी. प्रदेश के नेताओं का कहना है कि पार्टी अब भी अंदरखाने बंटी हुई है. पिछले चार साल में राजे सरकार के दौरान जिन लोगों को अपमान झेलना पड़ा, वे उसे भूलने को तैयार नहीं हैं. वैसे अपमान तो कई बार केन्द्रीय नेताओं का भी हुआ, लेकिन वे उसे फिलहाल याद नहीं रखना चाहते, क्योंकि उनके लिए जरुरी है 2019 का आम चुनाव जीतना. उसके लिए बहुत जरुरी है राजस्थान में फिर से सरकार की वापसी.

राजस्थान में हुए उपचुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए ठीक नहीं

पिछले चुनाव में बीजेपी ने लोकसभा की सभी 25 सीटों पर कब्ज़ा किया था. लेकिन इस साल हुए लोकसभा की दो सीटों के उप-चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा- अजमेर और अलवर की सीट, यानी चुनाव से पहले ही दो सीटें कम हो गई हैं और अगर राजे सरकार फिर से नहीं आई तो जाहिर है कि आम चुनाव में भी सीटें घट जाएंगी. सौ फीसद सीटें जीतने वाले राज्य में सीटें घटने की आशंका शुभ संकेत नहीं है.

दो लोकसभा सीट और साथ में एक मांडलगढ़ विधानसभा सीट उप चुनाव में हारने का मतलब है 17 विधानसभा सीटों का नुकसान. यह विधानसभा चुनावों के लिए चेतावनी से कम नहीं है. बीजेपी की जीती हुई सीटों का दस फीसद है यह संख्या.

आज भी राजस्थान में चुनावों की पूरी रणनीति और प्रचार सिर्फ मुख्यमंत्री राजे के पास है या फिर अमित शाह वहां जाकर माहौल बनाते हैं, लेकिन कोई दूसरा बड़ा स्थानीय नेता या तो बहुत सक्रिय नहीं दिखता या फिर उनके लिए कोई मौका नहीं है. बहुत से बड़े नेता अब मुख्यमंत्री के शरणारविन्द हो गए हैं, इससे उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों में कुछ निराशा का भाव लगता है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी लोकप्रिय नेता नहीं है, वे संगठन को संभाल सकते हैं. बूथ के स्तर पर उन्होंने अब तक 25 हजार से ज़्यादा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दे दिया है, इसका फायदा हो सकता है.

मुख्यमंत्री की खासतौर से महिलाओं में लोकप्रियता का फायदा भी मिलेगा, ऐसा पार्टी को लगता है. बीजेपी के एक ताकतवर केन्द्रीय नेता दावा कर रहे थे कि आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी चारों राज्य जीतेगी और तेलंगाना में भी मजबूत कोशिश करेगी. मैंने पूछा कि राजस्थान में क्या हाल है, तो थोड़ा रुके, मुस्कराए और फिर कहा कि अभी पीएम जब दौरा करेंगे तो ठीक हो जाएगा.

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बीजेपी तलाश रही है कम से कम नुकसान होने की संभावना

पश्चिमी राजस्थान में बीजेपी के दिग्गज नेता जसवंत सिंह पिछले चुनाव में ही बीजेपी छोड़ गए थे और फिर कांग्रेस से बीजेपी में आए नेता से हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन उनके बेटे मानवेन्द्र सिंह उससे पहले बीजेपी के विधायक बन गए थे, चार साढ़े चार साल तक पार्टी में ही रहे. अब पार्टी छोड़ दी है, कांग्रेस से टिकट लेकर चुनाव लड़ने की तैयारी में लगते हैं. लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेता उनके लिए दरवाजा खोलने को तैयार नहीं हैं. मानवेन्द्र इससे पहले बीजेपी के सांसद भी रह चुके हैं लेकिन कोई बड़ा काम अपने इलाके के लिए किया हो, ऐसा तो वहां के लोग नहीं बताते, मगर बीजेपी के लिए थोड़ा सिरदर्द दे सकते हैं.

इन दिनों देश भर में पितृपक्ष मनाया जा रहा है यानी श्राद्ध चल रहे हैं जिसका मतलब है कि जो लोग अब साथ छोड़ गए हैं उनके सम्मान में याद किया जाए. राजस्थान में लोग अक्सर कहते हैं कि जीवता ने पूछो कोना और मरता ने हलवा खिलाओ तो कोई फायदो कोनी- यानी जब तक साथ थे तब तक सम्मान नहीं दिया तो फिर बाद में उसका कोई फायदा नहीं होता.

अभी कबीर का एक किस्सा पढ़ रहा था पितृपक्ष को लेकर. बचपन में कबीर को कहा गया कि श्राद्ध पर खीर बनाने के लिए गाय का दूध लेकर आ जाएं. कबीर चल दिए, रास्ते में उन्हें एक मरी गाय मिली तो वे बैठकर उसे चारा खिलाने की कोशिश करने लगे. जब काफी देर तक कबीर नहीं लौटे तो उनके घरवाले तलाशते हुए वहां तक आए और उन्होंने कहा कि ये क्या कर रहे हो, मरी गाय चारा थोड़े ही खाएगी. तो कबीर ने जवाब दिया कि आज जो गाय मर गई है वो चारा नहीं खाएगी तो बरसो पहले मर गए लोग खीर कैसे खाएंगें? वैसे इसका सम्बन्ध राजस्थान की राजनीति से नहीं बताया जाता.

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