19 अक्टूबर 2026 को इंफाल पूर्वी और कांगपोकपी जिलों की सीमा के निकट लकड़ियां इकट्ठा करने गए ग्रामीणों पर सशस्त्र हमलावरों की गोलीबारी में तीन मैतेई पुरुषों की मौत और तीन अन्य के घायल होने की खबर सामने आई। कुछ लोगों के लापता होने की भी सूचना मिली। घटना से आक्रोशित लोगों ने दो मृतकों के शव मुख्यमंत्री आवास के बाहर रखकर विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध केवल एक हिंसक घटना के प्रति नाराजगी नहीं, बल्कि उस गहरे अविश्वास की अभिव्यक्ति था, जो लंबे समय से नागरिकों और शासन व्यवस्था के बीच पैदा हो चुका है।
अगले ही दिन कांगपोकपी जिले में कुकी-जो समुदाय के एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या किए जाने की खबर आई। इससे पहले कामजोंग, उखरुल और कांगपोकपी के विभिन्न इलाकों में नागा और कुकी समुदायों से जुड़े लोगों की मौतों तथा घरों में आगजनी की घटनाएं सामने आई थीं। 18 अक्टूबर को चस्साद गांव में कुकी समुदाय के कम-से-कम 15 घर जलाए जाने की खबर भी प्रकाशित हुई। इन घटनाओं की परिस्थितियों, जिम्मेदार व्यक्तियों और संभावित संगठनों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। बिना जांच किसी समुदाय या संगठन को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन इन घटनाओं से उभरने वाली व्यापक तस्वीर चिंताजनक है। मणिपुर में हिंसा का खतरा लगातार बना हुआ है और उसका प्रभाव विभिन्न समुदायों तथा क्षेत्रों तक पहुंच रहा है।
मणिपुर के वर्तमान संकट की जड़ें मई 2023 की घटनाओं में हैं। मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग और उससे संबंधित मणिपुर उच्च न्यायालय के मार्च 2023 के आदेश ने पहले से मौजूद सामाजिक, राजनीतिक और भूमि संबंधी आशंकाओं को और गहरा कर दिया। 3 मई 2023 को आदिवासी एकजुटता मार्च के बाद भड़की हिंसा ने देखते ही देखते व्यापक जातीय संघर्ष का रूप ले लिया। मैतेई समुदाय की अपनी ऐतिहासिक और सामाजिक चिंताएं थीं, जबकि कुकी-जो तथा अन्य आदिवासी समुदायों को अपने भूमि अधिकारों, संवैधानिक संरक्षण और राजनीतिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे प्रश्नों का समाधान संवैधानिक प्रक्रियाओं, राजनीतिक संवाद और परस्पर विश्वास के माध्यम से किया जाना चाहिए था। दुर्भाग्य से अविश्वास, उग्र प्रतिक्रियाओं और प्रशासनिक विफलताओं ने परिस्थितियों को इतना गंभीर बना दिया कि अनेक क्षेत्रों में समुदायों के बीच सामान्य संपर्क तक टूट गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अगस्त 2023 में मणिपुर की स्थिति, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, कानून-व्यवस्था और पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। न्यायालय का हस्तक्षेप इस बात का प्रमाण था कि राज्य में उत्पन्न संकट केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण से जुड़ा प्रश्न बन चुका था। ऐसे में सरकार की पहली जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन और सम्मान की रक्षा करना थी। यह जिम्मेदारी आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सफलता का आकलन केवल उसके निर्णयों, घोषणाओं या सुरक्षा बलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। वास्तविक कसौटी यह है कि नागरिक अपने घरों में कितने सुरक्षित हैं, बच्चे कितनी निर्भयता से विद्यालय जा सकते हैं, किसान अपने खेतों तक पहुंच सकते हैं या नहीं और आम लोग बिना भय के एक स्थान से दूसरे स्थान तक आवाजाही कर सकते हैं या नहीं। यदि तीन साल से अधिक समय बाद भी लोग जंगलों में लकड़ियां इकट्ठा करने, खेतों में काम करने या गांवों के बीच यात्रा करने के दौरान हमले का शिकार हो रहे हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
हर हिंसक घटना के बाद समीक्षा बैठक, निंदा का बयान और अतिरिक्त सुरक्षा तैनाती की घोषणा प्रशासनिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इन्हें शांति बहाली की उपलब्धि नहीं माना जा सकता। वास्तविक उपलब्धि तब होगी जब हमलों की संख्या घटेगी, अवैध हथियारों पर नियंत्रण स्थापित होगा, सशस्त्र समूहों की गतिविधियां सीमित होंगी और अपराधियों को निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेह बनाया जाएगा। इसके लिए केवल पुलिस और अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति पर्याप्त नहीं है। विश्वसनीय खुफिया तंत्र, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता, समुदायों के साथ संवाद और कानून का समान रूप से पालन भी आवश्यक है।
इस पूरे संकट में राज्य सरकार की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन केंद्र सरकार भी अपनी जवाबदेही से अलग नहीं रह सकती। मणिपुर जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में लंबे समय तक जारी जातीय हिंसा केवल राज्य के प्रशासनिक तंत्र की समस्या नहीं मानी जा सकती। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों, गृह मंत्रालय और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब हिंसा लगातार बनी रहती है, तो यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि अब तक अपनाई गई रणनीति की कमियां क्या हैं, उन्हें दूर करने के लिए कौन-से कदम उठाए गए और उनके परिणाम क्या रहे।
अक्टूबर 2026 की घटनाओं ने संकट का एक और चिंताजनक पहलू उजागर किया है। मणिपुर की हिंसा को अब केवल मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष के सीमित दायरे में नहीं समझा जा सकता। नागा और कुकी समुदायों से जुड़े क्षेत्रों में सामने आई हिंसक घटनाएं यह संकेत देती हैं कि राज्य में स्थानीय विवादों, क्षेत्रीय आशंकाओं और सशस्त्र गतिविधियों का जटिल स्वरूप भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। हालांकि इन सभी घटनाओं को एक ही कारण या संगठन से जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि लंबे समय तक बनी असुरक्षा और कमजोर सामाजिक विश्वास स्थानीय तनावों को और अधिक खतरनाक बना सकते हैं।
यही कारण है कि मणिपुर में शांति बहाली के लिए केवल तात्कालिक सुरक्षा अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। सरकार को उन ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर भी गंभीरता से काम करना होगा, जिनके कारण विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ा है। भूमि अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक व्यवस्था, संवैधानिक संरक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सभी पक्षों की चिंताओं को सुना जाना चाहिए। किसी एक समुदाय की सुरक्षा की मांग को दूसरे समुदाय के अधिकारों के विरुद्ध खड़ा करने से समाधान नहीं निकलेगा। संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि प्रत्येक नागरिक को समान सुरक्षा और न्याय प्राप्त हो।
मणिपुर की इस त्रासदी का सबसे पीड़ादायक पक्ष आम नागरिकों की स्थिति है। राजनीतिक बयानबाजी और प्रशासनिक दावों के बीच उन परिवारों का दर्द अक्सर पीछे छूट जाता है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया, जिनके घर जल गए और जिन्हें अपनी ही भूमि पर विस्थापित जीवन जीना पड़ रहा है। विस्थापन केवल आवास छिन जाने की समस्या नहीं है। यह आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक संबंधों और भविष्य की संभावनाओं के टूटने की त्रासदी है। राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों के लिए शांति का अर्थ केवल हिंसा का रुकना नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा के साथ सामान्य जीवन में लौटने का अवसर है।
सरकार को पुनर्वास को केवल मुआवजा वितरण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। विस्थापित परिवारों की सुरक्षित वापसी, स्थायी आवास, रोजगार, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली के लिए समयबद्ध तथा पारदर्शी योजना आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में वापसी तत्काल संभव नहीं है, वहां भी प्रभावित परिवारों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। राहत शिविरों में वर्षों तक अनिश्चितता के साथ जीवन बिताना किसी भी नागरिक के लिए स्वीकार्य स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती।
इसी प्रकार न्याय की प्रक्रिया को भी प्राथमिकता देनी होगी। हत्या, आगजनी, यौन हिंसा, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में निष्पक्ष जांच तथा प्रभावी अभियोजन आवश्यक है। पीड़ित चाहे किसी भी समुदाय से संबंधित हों, उनके साथ समान व्यवहार होना चाहिए। कानून की विश्वसनीयता तभी स्थापित होती है जब अपराध की गंभीरता के आधार पर कार्रवाई हो, न कि अपराधी या पीड़ित की जातीय पहचान के आधार पर। यदि नागरिकों को यह विश्वास नहीं होगा कि न्याय व्यवस्था निष्पक्ष है, तो सामाजिक अविश्वास समाप्त करना और कठिन हो जाएगा।
मणिपुर में स्थायी शांति के लिए राजनीतिक संवाद को भी संस्थागत रूप देना आवश्यक है। सभी प्रमुख समुदायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों, नागरिक संगठनों, महिला समूहों, युवाओं और स्थानीय नेतृत्व के बीच नियमित तथा सार्थक बातचीत होनी चाहिए। यह संवाद केवल औपचारिक बैठकों या संयुक्त अपीलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका उद्देश्य उन वास्तविक विवादों की पहचान करना और उनके व्यावहारिक समाधान तलाशना होना चाहिए, जिनके कारण समुदाय एक-दूसरे से दूर हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्वपूर्ण शांति समितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जहां सुरक्षा की परिस्थितियां अनुमति दें, वहां गांवों के बीच संपर्क बहाल करने, सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने, अफवाहों पर नियंत्रण रखने और छोटे विवादों को हिंसक रूप लेने से रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए। इन समितियों में महिलाओं और प्रभावित परिवारों की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगी। शांति की प्रक्रिया तभी टिकाऊ बन सकती है जब उसमें उन लोगों की आवाज शामिल हो, जिन्होंने हिंसा का सबसे अधिक दंश झेला है।
हालांकि संवाद का अर्थ कानून के उल्लंघन के प्रति नरमी नहीं होना चाहिए। जो भी सशस्त्र समूह या व्यक्ति नागरिकों पर हमला करते हैं, उनके विरुद्ध स्पष्ट और निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। राजनीतिक समाधान की संभावनाएं खुली रखी जा सकती हैं, लेकिन हिंसा और अपराध के लिए किसी को छूट नहीं दी जा सकती। कानून का समान और प्रभावी अनुपालन ही सभी समुदायों के बीच विश्वास बहाली की आधारशिला बन सकता है।
शांति बहाली के प्रयासों में पारदर्शिता भी अनिवार्य है। सरकार को नियमित रूप से सार्वजनिक करना चाहिए कि कितने विस्थापित परिवारों का पुनर्वास हुआ, कितने गंभीर अपराधों की जांच पूरी हुई, कितने अवैध हथियार बरामद किए गए, किन क्षेत्रों में सुरक्षित आवाजाही बहाल हुई और किन मामलों में न्यायिक कार्रवाई आगे बढ़ी। केवल उपलब्धियों के दावे करने के बजाय उनकी वास्तविक प्रगति नागरिकों के सामने रखी जानी चाहिए। इससे न केवल प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि प्रभावित समुदायों को यह विश्वास भी मिलेगा कि शांति बहाली की दिशा में वास्तविक काम हो रहा है।
लेकिन इन सभी उपायों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। तीन साल से अधिक समय किसी भी सरकार के लिए अपनी रणनीति की समीक्षा करने, प्रशासनिक कमियों को पहचानने और प्रभावी सुधार लागू करने के लिए पर्याप्त गंभीर अवधि है। मणिपुर में हिंसा की हर नई घटना यह याद दिलाती है कि शांति बहाली की प्रक्रिया अभी अधूरी है। ऐसे में सरकार के लिए केवल परिस्थितियों की जटिलता का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं हो सकता। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि जटिलताओं से निपटने के लिए उसकी दीर्घकालिक रणनीति क्या है और उस रणनीति के परिणाम नागरिकों के जीवन में कब दिखाई देंगे।
लोकतंत्र में सरकार का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। किसी भी राज्य में लंबे समय तक भय और हिंसा का वातावरण बना रहना केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है। मणिपुर के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी सुरक्षा के लिए क्या किया जा रहा है, दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई कहां तक पहुंची है और उन्हें सामान्य जीवन में लौटने के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा।
मणिपुर को आज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक संवेदनशील नेतृत्व, निष्पक्ष प्रशासन और भरोसेमंद शांति प्रक्रिया की आवश्यकता है। राज्य के प्रत्येक समुदाय की आशंकाओं को गंभीरता से समझना होगा और किसी भी नागरिक की सुरक्षा को राजनीतिक लाभ-हानि की कसौटी पर नहीं तौला जा सकता। सरकार को यह साबित करना होगा कि किसी परिवार का घर, किसी बच्चे का भविष्य और किसी निर्दोष नागरिक का जीवन जातीय संघर्ष की कीमत नहीं बन सकता।
आखिर सरकार को किसने रोका है? यह प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह उन सभी संस्थाओं और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से है, जिन पर संविधान ने नागरिकों की सुरक्षा, कानून का शासन और शांति सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा है। मणिपुर के लोग अब केवल घोषणाएं नहीं, परिणाम देखना चाहते हैं। उन्हें निर्भय जीवन, सुरक्षित घर, सम्मानजनक पुनर्वास और निष्पक्ष न्याय चाहिए।
तीन साल से अधिक समय बाद भी यदि नागरिक भय के साये में जीने को मजबूर हैं, तो शासन को आत्ममंथन करना ही होगा। शांति केवल सरकारी दस्तावेजों, समीक्षा बैठकों या राजनीतिक भाषणों में स्थापित नहीं होती। शांति तब स्थापित होती है जब नागरिक बिना डर के अपने घरों से निकल सकें, बच्चे सुरक्षित विद्यालय जा सकें, विस्थापित परिवार सम्मान के साथ लौट सकें और समाज के विभिन्न समुदाय फिर से एक-दूसरे पर विश्वास करना शुरू करें।
मणिपुर को अब आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। क्योंकि सवाल केवल यह नहीं कि हिंसा कब रुकेगी, बल्कि यह भी है कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के लिए सरकार आखिर और कितना समय लेगी।
—–समाप्त—–
दिंडोशी में ₹1.28 करोड़ की MD जब्त, गाजीपुर का 31 वर्षीय आरोपी गिरफ्तार




