बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे जिले के ठोकरवाड़ी धरण क्षेत्र में टाटा पावर की 84 हेक्टेयर जमीन के प्रस्तावित अधिग्रहण की कार्रवाई रद्द कर दी है। यह जमीन एक निजी संस्था की आयुर्वेदिक वेलनेस परियोजना के लिए ली जानी थी। न्यायमूर्ति मनीष पितले और न्यायमूर्ति श्रीराम वी. शिरसाट की खंडपीठ ने 5 नवंबर के फैसले में माना कि जमीन पहले से जलविद्युत परियोजनाओं के सार्वजनिक उपयोग से जुड़ी है।
मार्च 2025 की अधिसूचनाएं और नोटिस रद्द
अदालत ने 3 मार्च 2025 की अधिसूचना, 4 मार्च का संबंधित सरकारी निर्णय और 7 मार्च के कारण बताओ नोटिस रद्द किए हैं। आदेश के परिणामस्वरूप इस 84 हेक्टेयर जमीन के प्रस्तावित अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त हुई और उपविभागीय अधिकारी के समक्ष लंबित कार्यवाही का भी निपटारा कर दिया गया।
राज्य और महाराष्ट्र औद्योगिक विकास महामंडल ने महाराष्ट्र औद्योगिक विकास अधिनियम के तहत जमीन को औद्योगिक क्षेत्र घोषित करके अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। टाटा पावर ने इसी कानूनी रास्ते और जमीन के उपयोग में प्रस्तावित बदलाव को चुनौती दी थी।
जलविद्युत परियोजना और निजी प्रकल्प के बीच विवाद
विवादित जमीन ठोकरवाड़ी धरण और जलाशय के आसपास है। इसका संबंध भिवपुरी जलविद्युत केंद्र और प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज परियोजना के जलग्रहण क्षेत्र से बताया गया है। कंपनी का पक्ष था कि बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन को अनुपयोगी मानकर दूसरे प्रकल्प के लिए नहीं लिया जा सकता।
महर्षि वेदोद्धारक फाउंडेशन की प्रस्तावित परियोजना में आयुर्वेदिक कॉलेज, शोध, उपचार और वेलनेस सुविधाएं शामिल थीं। राज्य ने औद्योगिक तथा आर्थिक विकास के लिए अधिग्रहण की शक्ति का तर्क दिया। संस्था ने रोजगार सृजन और परियोजना के लाभों का पक्ष भी रखा।
अदालत ने प्राथमिक उद्देश्य पर जोर दिया
खंडपीठ ने कहा कि किसी निजी गतिविधि से रोजगार मिलना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उसका प्राथमिक उद्देश्य सार्वजनिक हित है। इस मामले में अदालत ने मौजूदा जलविद्युत उपयोग की कीमत पर निजी संस्था को लाभ पहुंचाने के लिए अपनाए गए अधिग्रहण के तरीके को स्वीकार नहीं किया।
फैसले में अगस्त 2023 में राज्य और टाटा पावर के बीच 1,000 मेगावाट भिवपुरी पंप्ड स्टोरेज परियोजना के लिए हुए समझौते का भी उल्लेख है। अदालत के अनुसार, संबंधित जमीन सार्वजनिक उपयोग वाली ऊर्जा गतिविधि का हिस्सा बनी हुई है।
फैसले का सीधा असर
इस आदेश से विवादित 84 हेक्टेयर जमीन के लिए मार्च 2025 में शुरू की गई अधिग्रहण कार्रवाई हट गई है। फैसला इसी जमीन और इस प्रक्रिया से संबंधित है; इसे महाराष्ट्र की हर निजी परियोजना या हर भूमि अधिग्रहण पर सामान्य प्रतिबंध के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।




