नई दिल्ली, 25 सितंबर। सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने वंशजों से अन्न-जल ग्रहण करने की कामना रखते हैं।
इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026, शनिवार से हो रही है। यह अवधि 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगी। पितृपक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है।
पितृपक्ष के दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
श्राद्ध के दौरान संकल्प, तर्पण, पिंडदान, सात्विक भोजन बनाकर अर्पित करना तथा जरूरतमंदों को दान देने जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। कई परिवार गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भी भोजन का एक हिस्सा अलग रखते हैं।
पंचांग के अनुसार इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी। प्रमुख श्राद्ध तिथियां इस प्रकार हैं:
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी। इसे पितृपक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है।
किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाने की स्थिति में भी सर्वपितृ अमावस्या को महत्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृपक्ष के दौरान उसी हिंदू तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। इसलिए केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर श्राद्ध की तिथि तय नहीं की जाती, बल्कि संबंधित हिंदू तिथि और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रखा जाता है।
यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि मालूम नहीं है, तो परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध का समय तय किया जा सकता है।
पितृपक्ष के दौरान जल में काले तिल, जौ और कुश मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को तर्पण देने की परंपरा है। इसके अलावा पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर पिंडदान भी किया जाता है।
धार्मिक तिथियों और कर्मकांड के सटीक समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करना उचित है, क्योंकि स्थान के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है।
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