Vasai-Virar : वसई-विरार में दूषित पेयजल को लेकर भरोसे का संकट और जवाबदेही के सवाल
कहते हैं, पानी का कोई रंग नहीं होता। लेकिन वसई-विरार के नागरिकों ने पिछले कुछ दिनों में जो पानी अपने नलों से बहते देखा, उसने इस कहावत को भी झुठला दिया। किसी के गिलास में मटमैला पानी था, कहीं पीला, कहीं बदबूदार। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार पानी का रंग ही नहीं बदला, लोगों के चेहरे का रंग भी उड़ गया।
बरसात हर साल आती है। बाढ़ भी नई नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर मानसून के साथ नागरिकों को यह भी सोचना पड़ेगा कि आज नल से पानी आएगा या बीमारी?
वसई-विरार में लगाjतार हुई बारिश के बाद दूषित पेयजल की शिकायतें अलग-अलग इलाकों से सामने आईं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए। लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे—”क्या तुम्हारे यहाँ भी ऐसा ही पानी आ रहा है?” शायद किसी आधुनिक शहर के लिए इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती कि नागरिक मौसम का हाल कम और पानी का रंग ज़्यादा पूछने लगें।
इसी बीच वसई-विरार शहर महानगरपालिका (VVCMC) ने एहतियात के तौर पर हाउसिंग सोसायटियों को अपने भूमिगत जल भंडारण टैंक साफ़ कराने तथा नागरिकों को पानी उबालकर उपयोग करने की सलाह जारी की। सलाह देना आवश्यक है। लेकिन क्या सलाह ही समाधान है?
यदि किसी शहर की जलापूर्ति व्यवस्था पर भरोसा कायम है, तो नागरिकों को सबसे पहले अपने टैंक साफ़ करने की सलाह क्यों देनी पड़ रही है? यह प्रश्न किसी सलाह का विरोध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसकी पहली जिम्मेदारी नागरिकों तक सुरक्षित पानी पहुँचाना है।
आखिर नागरिक जल कर(Water Tax) इसलिए तो नहीं भरते कि पानी की शुद्धता की जिम्मेदारी भी उन्हीं के हिस्से में आ जाए।
हाउसिंग सोसायटियाँ अपने टैंक साफ़ कराएँ—इसमें दो राय नहीं। लेकिन क्या उसी गंभीरता से जलशोधन संयंत्रों की जांच हुई? क्या मुख्य जल वितरण पाइपलाइनों का निरीक्षण हुआ? क्या उन इलाकों से जल नमूने लिए गए जहाँ सबसे अधिक शिकायतें आईं? क्या उनकी प्रयोगशाला रिपोर्ट सार्वजनिक की गई? यदि नहीं, तो नागरिकों का भरोसा केवल अपीलों से कैसे लौटेगा?
प्रशासन अक्सर कहता है “घबराने की जरूरत नहीं है।” लेकिन विश्वास दिलाया नहीं जाता, कमाया जाता है। और विश्वास का सबसे बड़ा आधार है पारदर्शिता।
दूषित पेयजल केवल गंदा दिखने वाला पानी नहीं है। वह हैजा, टाइफाइड, डायरिया, हेपेटाइटिस-ए, लेप्टोस्पायरोसिस और अनेक अन्य जलजनित बीमारियों की जननी है। विडंबना यह है कि इन बीमारियों का संक्रमण किसी सरकारी प्रेस नोट का इंतजार नहीं करता। वह न पाइपलाइन की फाइल देखता है, न विभागीय नोटशीट। वह केवल एक असुरक्षित बूंद तलाशता है।
कभी-कभी लगता है कि हमारे यहाँ मानसून के लिए भी एक तय प्रशासनिक “स्क्रिप्ट” बन चुकी है। पहले बारिश होगी। फिर जलभराव होगा। फिर दूषित पानी की शिकायतें आएँगी। उसके बाद उबालकर पानी पीने की सलाह जारी होगी। कुछ टैंकर भेजे जाएँगे। कुछ निरीक्षण होंगे। फिर मौसम बदलेगा और फाइलें भी।
लेकिन इस पूरी पटकथा में एक पात्र हर बार वही रहता है—आम नागरिक। वही हर साल जोखिम उठाता है, वही बोतलबंद पानी खरीदता है, वही बच्चों की तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल की कतार में खड़ा होता है, और वही अगले मानसून तक यह उम्मीद करता है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा।
यह सवाल किसी एक विभाग का नहीं, शहरी प्रशासन की प्राथमिकताओं का है। करोड़ों रुपये की विकास योजनाएँ, नई सड़कें, ऊँची इमारतें और स्मार्ट सिटी के दावे तब फीके पड़ जाते हैं, जब नागरिक अपने ही घर में पानी को सूंघकर यह तय करने लगें कि उसे पीना है या नहीं।
यदि महानगरपालिका को वास्तव में नागरिकों का विश्वास वापस जीतना है, तो सबसे पहले उसे सलाह नहीं, सबूत देने होंगे। प्रभावित क्षेत्रों की जल गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। पाइपलाइन नेटवर्क का ऑडिट कराया जाए। जिन स्थानों पर समस्या मिली है, वहाँ समयबद्ध कार्रवाई की जानकारी नागरिकों के साथ साझा की जाए। पारदर्शिता ही विश्वास की पहली सीढ़ी है।
आख़िर में बात केवल पानी की नहीं है। बात उस भरोसे की है, जिसे किसी भी शहर की सबसे बड़ी पूँजी माना जाता है। जब नागरिक अपने ही नल के पानी पर विश्वास खोने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि संकट पाइपलाइन में नहीं, व्यवस्था की सोच में है।
और तब अनायास ही वह पंक्ति याद आती है—
“पानी दा रंग वेख के, आंखियाँ चो हंजो रोड़ दे..”
क्योंकि इस बार आँसू सिर्फ़ पानी का रंग देखकर नहीं निकले, बल्कि इसलिए भी कि जिस व्यवस्था पर भरोसा था, उसका रंग भी कुछ धुंधला-सा दिखाई देने लगा।