Vasai Virar : भारत में डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी पहचान बन चुका UPI(यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) आज सिर्फ पैसे भेजने का माध्यम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक, ऑटो वाले से लेकर ऑनलाइन खरीदारी तक—क्यूआर कोड (QR Code) स्कैन करना अब उतना ही सामान्य हो गया है, जितना कभी जेब से नकद निकालना हुआ करता था।
लेकिन अब इसी ‘मुफ्त’ सुविधा के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है – क्या यूपीआई हमेशा मुफ्त रहेगा?
फिलहाल इसका जवाब है – यूपीआई पर कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है। लेकिन सरकार ने ऐसा कानूनी रास्ता जरूर खोल दिया है, जिसके जरिए भविष्य में कुछ डिजिटल लेन-देन पर एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगाया जा सकता है।
6 अगस्त 2026 को लोकसभा से पारित कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम (पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट) में बदलाव किया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए यह तय कर सकती है कि किन डिजिटल भुगतान प्रणालियों और किस तरह के लेन-देन पर शुल्क लगाया जा सकता है।
यानी फिलहाल क्यूआर कोड स्कैन करते ही जेब से अतिरिक्त पैसा निकलने वाला नहीं है, लेकिन ‘मुफ्त यूपीआई’ की गारंटी अब पहले जैसी कानूनी स्थिति में नहीं है।
असली निशाना आम आदमी नहीं, बड़े कारोबारी?
जो प्रस्ताव सामने आए हैं, उनके मुताबिक शुल्क की चर्चा मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन और बड़े व्यापारियों को लेकर है।
रिपोर्टों के मुताबिक सालाना करीब 1.5 करोड़ रुपये से अधिक कारोबार करने वाले बड़े व्यापारियों को संभावित दायरे में रखा जा सकता है। वहीं छोटे व्यापारियों और कम मूल्य के लेन-देन को इससे बाहर रखने की संभावना है।
कुछ प्रस्तावित मॉडलों में करीब 0.5 प्रतिशत तक शुल्क की चर्चा भी सामने आई है। हालांकि, सरकार ने अभी अंतिम शुल्क दर या इसका अंतिम दायरा अधिसूचित नहीं किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि कल से हर यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगने वाला नहीं है। सरकार के सामने अभी यह तय करने का सवाल है कि किस लेन-देन पर, किस दर से और किससे शुल्क लिया जाए।
यही वजह है कि ‘यूपीआई पर शुल्क’ जैसी सुर्खियां वास्तविक स्थिति को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकती हैं।
यूपीआई मुफ्त हुआ कैसे और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
यूपीआई को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने शुरुआत से ही कम लागत और आसान डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया। जनवरी 2020 से भीम-यूपीआई (बीएचआईएम-यूपीआई) और रुपे डेबिट कार्ड (RuPay Debit Card) के लिए एमडीआर को शून्य कर दिया गया था।
इसके बाद सरकार ने बैंकों और भुगतान व्यवस्था से जुड़े दूसरे संस्थानों को प्रोत्साहन राशि देना शुरू किया, ताकि छोटे मूल्य के डिजिटल भुगतानों की लागत की भरपाई की जा सके। दिसंबर 2021 में सरकार ने 2,000 रुपये तक के भीम-यूपीआई से व्यापारी भुगतान और रुपे डेबिट कार्ड लेन-देन के लिए एक साल की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद इस योजना के लिए वित्तीय प्रावधान भी बढ़ाया गया।
आज भी सरकार कम मूल्य वाले व्यापारिक यूपीआई लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए बजट में राशि रखती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इसके लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है –
जब यूपीआई की लागत का एक हिस्सा पहले से ही सरकारी प्रोत्साहन के जरिए उठाया जा रहा है, तो भविष्य में व्यापारियों से एमडीआर वसूलना कितना जरूरी है?
लेकिन क्या यूपीआई वास्तव में ‘मुफ्त’ है?
यहां तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यूपीआई पर ग्राहक से सीधे शुल्क नहीं लिया जाता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी व्यवस्था की कोई लागत नहीं है।
बैंकों के सर्वर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी की निगरानी, नेटवर्क क्षमता, तकनीकी उन्नयन, ग्राहक सहायता और भुगतान प्रणाली के रखरखाव पर लगातार खर्च होता है।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी इस बहस के मूल प्रश्न की ओर इशारा कर चुके हैं कि यूपीआई की लागत कोई न कोई वहन करता है।
यानी बहस सिर्फ यह नहीं है कि यूपीआई मुफ्त रहे या शुल्क लगे।
असली सवाल है –
इस विशाल डिजिटल भुगतान ढांचे की लागत का उचित बंटवारा कैसे हो?
सरकार के सामने बड़ी दुविधा
सरकार के लिए चुनौती दो तरफा है।
एक तरफ यूपीआई को सस्ता और व्यापक रखना है, ताकि डिजिटल भुगतान की रफ्तार न थमे। दूसरी तरफ बैंकों और भुगतान कंपनियों को लंबे समय तक ऐसी व्यवस्था में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिसमें लेन-देन लगातार बढ़ते रहें लेकिन कमाई का मॉडल स्पष्ट न हो।
इसीलिए बड़े व्यापारियों से सीमित एमडीआर लेने का विचार सामने आया है। इसका तर्क यह है कि बड़े कारोबारी उच्च मूल्य के डिजिटल लेन-देन से सीधे व्यावसायिक लाभ हासिल करते हैं और मामूली भुगतान-प्रसंस्करण शुल्क उनके लिए अपेक्षाकृत कम बोझ हो सकता है।
वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 में यूपीआई प्रोत्साहन के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान यह दिखाता है कि सरकार अभी भी डिजिटल भुगतान को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।
खतरा शुल्क से ज्यादा ‘बोझ आगे बढ़ाने’ का है
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि एमडीआर कौन देगा, बल्कि यह है कि अंतिम बोझ किसकी जेब पर पहुंचेगा। मान लीजिए किसी बड़े व्यापारी पर 0.3 या 0.5 प्रतिशत का एमडीआर लगता है। तकनीकी रूप से ग्राहक की ओर से भुगतान अभी भी मुफ्त रह सकता है। लेकिन व्यापारी अपनी लागत बढ़ने पर उत्पाद या सेवा की कीमत बढ़ा सकता है।
यानी ग्राहक को स्क्रीन पर यूपीआई के लिए ‘शून्य शुल्क’ दिखाई दे, लेकिन उस शुल्क की कीमत पहले से बढ़े हुए सामान या सेवा के दाम में शामिल हो सकती है।
यहीं से यह बहस केवल बैंक और व्यापारी के बीच की नहीं रहती, बल्कि उपभोक्ता के हित का सवाल बन जाती है।
क्या लोग फिर नकदी की ओर लौटेंगे?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में नकदी से डिजिटल भुगतान की ओर बड़ा बदलाव देखा है। यूपीआई ने इस बदलाव को तेज किया, क्योंकि इसमें कार्ड, मशीन या नकदी रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
अगर बड़े व्यापारियों पर एमडीआर लगता है और वे इसका बोझ ग्राहकों पर डालते हैं, तो उच्च मूल्य के भुगतान में नकदी, कार्ड या दूसरे माध्यमों की ओर कुछ बदलाव संभव है। हालांकि, केवल शुल्क लागू होने से देश अचानक नकदी आधारित अर्थव्यवस्था में वापस लौट जाएगा, ऐसा मानना भी अतिशयोक्ति होगी। यूपीआई की सुविधा, तत्काल भुगतान और व्यापक स्वीकार्यता इतनी मजबूत हो चुकी है कि मामूली लागत के बावजूद बहुत से ग्राहक इसका इस्तेमाल जारी रखेंगे।
असल जोखिम छोटे कारोबारियों और उन उपभोक्ताओं में है, जिनके लिए डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी खूबी ही ‘बिना अतिरिक्त लागत’ है।
नोटबंदी से यूपीआई तक – राजनीतिक सवाल भी
यूपीआई शुल्क की चर्चा ने एक पुराने राजनीतिक सवाल को भी फिर जिंदा कर दिया है—क्या सरकार ने लोगों को नकदी से डिजिटल भुगतान की तरफ इसलिए धकेला था कि भविष्य में डिजिटल भुगतान से शुल्क वसूला जा सके? इस तर्क को सीधे नीति का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। यूपीआई का विस्तार कई नीतियों, बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार, स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच, डिजिटल पहचान तथा निजी भुगतान ऐप की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है।
लेकिन यह भी सच है कि सरकार ने लंबे समय तक ‘कम लागत वाले डिजिटल भुगतान’ मॉडल को अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था की ताकत के रूप में पेश किया है।
इसलिए अब शुल्क की कोई भी व्यवस्था केवल आर्थिक नजरिए से नहीं, बल्कि नीति की विश्वसनीयता के नजरिए से भी देखी जाएगी।
क्या यूपीआई का भविष्य खतरे में है?
शायद नहीं। बल्कि सवाल यह है कि यूपीआई के अगले चरण का आर्थिक मॉडल क्या होगा।
भारत का यूपीआई नेटवर्क अब इतना बड़ा हो चुका है कि उसकी अगली चुनौती सिर्फ ज्यादा से ज्यादा लेन-देन करना नहीं है। अब उसे साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, बेहतर तकनीक, विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर भी भारी निवेश करना होगा।
ऐसे में कुछ बड़े और उच्च-मूल्य वाले कारोबारी लेन-देन पर सीमित एमडीआर का मॉडल आर्थिक रूप से तर्कसंगत हो सकता है – बशर्ते छोटे व्यापारी, व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान और सामान्य उपभोक्ता इससे सुरक्षित रहें।
सरकार के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही होगा कि शुल्क को बेहद सीमित दायरे में रखा जाए, दर पारदर्शी हो, छोटे कारोबारियों को स्पष्ट छूट मिले और किसी व्यापारी को मनमाने ढंग से ग्राहक से अलग से ‘यूपीआई शुल्क’ वसूलने की अनुमति न हो।
असली सवाल ‘मुफ्त यूपीआई’ का नहीं, भरोसे का है
यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी तकनीक नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत भरोसा है। लोगों को भरोसा है कि 100 रुपये भेजने पर 100 रुपये ही जाएंगे। कोई कार्ड शुल्क नहीं, कोई मशीन शुल्क नहीं, कोई अलग भुगतान शुल्क नहीं। अगर भविष्य में शुल्क व्यवस्था आती है तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह भरोसा न टूटे।
यूपीआई को टिकाऊ बनाना जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत आम आदमी की डिजिटल आदत और भरोसे से नहीं वसूली जानी चाहिए। क्योंकि यूपीआई सिर्फ भुगतान का मंच नहीं रह गया है। यह भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है।
और रीढ़ मजबूत करने के लिए लागत उठानी पड़े तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि –
‘कौन भुगतान करेगा?’
सवाल यह होना चाहिए –
‘कौन कितना और क्यों भुगतान करेगा?’
यही तय करेगा कि भारत का यूपीआई आने वाले वर्षों में दुनिया के लिए डिजिटल भुगतान का मॉडल बनेगा या फिर अपनी ही सफलता की कीमत चुकाने लगेगा।
महत्वपूर्ण: फिलहाल यूपीआई पर कोई नया शुल्क लागू नहीं है। 2026 का विधायी बदलाव मुख्य रूप से सरकार को भविष्य में अधिसूचना के जरिए कुछ डिजिटल भुगतान पर शुल्क की अनुमति देने का अधिकार देता है। प्रस्तावित एमडीआर की दर और अंतिम दायरा अभी अंतिम रूप से अधिसूचित नहीं हैं।
—–समाप्त—–
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