Vasai Virar: किसी आम नागरिक के लिए सरकारी दफ्तर का दरवाजा खटखटाना कभी आसान नहीं होता। शिकायत लिखना, आवेदन देना, अधिकारियों से मिलना, फिर उसी शिकायत का पीछा करना और हर बार इस उम्मीद के साथ लौटना कि अगली बार शायद कार्रवाई होगी—यह प्रक्रिया अपने आप में थका देने वाली होती है। लेकिन जब यही सिलसिला महीनों से वर्षों में बदल जाए और अंततः न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद मिले आदेश भी जमीन पर दिखाई न दें, तब मामला केवल एक नागरिक की परेशानी तक सीमित नहीं रहता। सवाल पूरी व्यवस्था की कार्यशैली पर उठने लगता है।
वसई पूर्व के Sigrun Splendor Co-operative Housing Society, Madhuban Township, Gokhiware, Vasai East का मामला आज इसी सवाल के केंद्र में है। यहां एक ओर कथित अवैध निर्माण और कॉमन एरिया पर अतिक्रमण का मामला है, दूसरी ओर कबूतरों की बीट से पैदा हो रही स्वास्थ्य संबंधी समस्या और Fire Safety का खतरा बताया जा रहा है। इन सबके बीच एक पीड़ित निवासी पिछले चार वर्षों से प्रशासनिक व्यवस्था के दरवाजे खटखटा रहा है। शिकायतें हुईं, नोटिस जारी हुईं, सुनवाई हुई, हाईकोर्ट का आदेश आया, अवमानना की कार्यवाही तक पहुंची और फिर अवैध निर्माणों को अवैध घोषित करने के आदेश भी जारी हुए। लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है- जमीन पर कार्रवाई कहां है?
मार्च 2022 में पीड़ित निवासी एवं शिकायतकर्ता राहुल रंजन ने वसई-विरार शहर महानगरपालिका में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कबूतरों की बीट से उत्पन्न स्वास्थ्य संकट, सोसाइटी के कॉमन एरिया पर अतिक्रमण और MRTP कानून के उल्लंघन से जुड़े कथित अवैध निर्माणों का मुद्दा उठाया गया था। लेकिन महानगरपालिका तक पहुंचने से पहले राहुल रंजन ने सोसाइटी के स्तर पर भी समाधान तलाशने की कोशिश की थी। उनके अनुसार, उन्होंने Sigrun Splendor Co-operative Housing Society के संचालक मंडल से वर्षों तक कई बार लिखित और मौखिक रूप से अनुरोध किया कि कॉमन एरिया पर हुए अतिक्रमण हटाए जाएं, अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की जाए और कबूतरों की बीट से पैदा हुई समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। उनका आरोप है कि इन अनुरोधों के बावजूद सोसाइटी प्रबंधन की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
जब सोसाइटी स्तर पर समाधान नहीं निकला तो मामला महानगरपालिका तक पहुंचा। लंबे समय तक शिकायतों और प्रयासों के बाद वर्ष 2023 में वसई-विरार शहर महानगरपालिका ने सोसाइटी के लगभग 39-40 फ्लैट एवं दुकान मालिकों को MRTP अधिनियम के तहत नोटिस जारी की। इस कार्रवाई से उम्मीद बनी कि अब कथित अवैध निर्माणों के खिलाफ आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार, नोटिस के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा। कागजों पर प्रक्रिया चलती रही और जमीन पर कथित अवैध निर्माण अपनी जगह कायम रहे।
इसके बाद राहुल रंजन की दौड़ वालीव प्रभाग समिति (G) से लेकर महानगरपालिका मुख्यालय तक जारी रही। उन्होंने सहायक आयुक्त श्रीमती धनश्री शिंदे, श्रीमती नीलम निजाई, श्रीमती मनाली शिंदे, श्री दयानंद मानकर और श्री नीलेश म्हात्रे, उपायुक्त श्री किशोर गवस, श्री अजित मुठे और श्री दीपक सावंत, अतिरिक्त आयुक्त श्री रमेश मनाले तथा आयुक्त श्री अनिल पवार एवं श्री मनोज सूर्यवंशी सहित विभिन्न अधिकारियों से कार्रवाई की गुहार लगाई। शिकायतकर्ता के अनुसार, हर स्तर पर उन्हें आश्वासन मिला, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
आखिरकार जब प्रशासनिक स्तर पर रास्ता बंद होता दिखाई दिया तो राहुल रंजन ने माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अप्रैल 2025 में माननीय न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और माननीय न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने वसई-विरार शहर महानगरपालिका को अवैध निर्माणों के संबंध में तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। यह आदेश अपने आप में महत्वपूर्ण था, क्योंकि शिकायतकर्ता के अनुसार इससे पहले MRTP कानून के तहत न तो प्रभावी सुनवाई हुई थी और न ही अंतिम कार्रवाई।
लेकिन यहां से इस मामले की कहानी और भी सवाल खड़े करती है। हाईकोर्ट ने अप्रैल 2025 में तत्काल कार्रवाई का निर्देश दिया, लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार लगभग तीन महीने बाद जून 2025 में MRTP की सुनवाई लगाई गई। सुनवाई हुई, लेकिन उसके बाद आदेश भी तत्काल जारी नहीं हुआ। राहुल रंजन के अनुसार, सुनवाई के आदेश को लगभग तीन-चार महीने तक रोककर रखा गया और जब तक Contempt of Court की नौबत नहीं आई, तब तक आदेश पारित नहीं किया गया।
सितंबर 2025 में जब माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से अवमानना की कार्यवाही में वसई-विरार शहर महानगरपालिका को नोटिस जारी हुई, उसके बाद प्रक्रिया में तेजी दिखाई दी। अक्टूबर 2025 में सहायक आयुक्त श्री नीलेश म्हात्रे, प्रभाग-G, वालीव की ओर से MRTP सुनवाई के आदेश पारित किए गए। इन आदेशों में संबंधित 39-40 नोटिसधारकों के निर्माणों, परमानेंट शेड, कॉमन एरिया पर किए गए कब्जों तथा सोसाइटी की संपत्तियों पर किए गए अतिक्रमण को अवैध घोषित करते हुए स्वनिष्कासन (Self-Demolition) के निर्देश दिए गए। इसके बाद संबंधित लोगों को नोटिस जारी कर 17 नवंबर 2025 को ध्वस्तीकरण कार्रवाई की तारीख भी निर्धारित की गई।
वसई-विरार शहर महानगरपालिका की ओर से कागजों पर यह कार्रवाई आगे बढ़ी, लेकिन जमीन पर तस्वीर नहीं बदली। निर्धारित तारीख बीत जाने के बाद भी, शिकायतकर्ता के अनुसार, न ध्वस्तीकरण हुआ, न अतिक्रमण हटाए गए और न ही कॉमन एरिया को पूरी तरह मुक्त कराया गया। ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है – जब महानगरपालिका ने स्वयं इन निर्माणों को अवैध घोषित कर दिया था, तो फिर उन्हें हटाने की कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हुई?
यहीं से इस मामले का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है – क्या किसी निर्माण को अवैध घोषित कर देना ही प्रशासन की जिम्मेदारी की अंतिम सीमा है?
कबूतरों की बीट से जुड़ा स्वास्थ्य संकट इस मामले को और गंभीर बनाता है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके फ्लैट की बालकनी से सटे कथित अवैध निर्माणों और परमानेंट शेडों पर वर्षों से बड़ी संख्या में कबूतरों का जमावड़ा रहता है। कबूतरों की बीट, उससे उड़ने वाले सूक्ष्म कण और आसपास जमा गंदगी के कारण उनका परिवार पिछले सात-आठ वर्षों से गंभीर श्वसन संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है। यह दावा शिकायतकर्ता का है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मामला केवल सौंदर्य या स्वच्छता तक सीमित नहीं है; यहां स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।
कबूतरों को दाना खिलाने और उससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिम को लेकर माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट(Bombay High court) के 24 जुलाई 2025 के निर्देशों ने भी इस विषय की गंभीरता को सामने रखा है। न्यायालय ने कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक, उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी और प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल हस्तक्षेप के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि Sigrun Splendor परिसर में समस्या का प्रभावी समाधान नहीं हुआ।
इसके साथ ही कॉमन एरिया पर कथित अतिक्रमण का मामला Fire Safety से जुड़ जाता है। किसी भी आवासीय परिसर में आपातकाल के समय अग्निशमन वाहनों की आवाजाही और लोगों की सुरक्षित निकासी के लिए रास्तों का खुला रहना जरूरी है। यदि इन्हीं हिस्सों पर स्थायी निर्माण या शेड खड़े हों तो आग लगने की स्थिति में जोखिम कई गुना बढ़ सकता है। राहुल रंजन का कहना है कि इन कथित अवैध बांधकामों के कारण सोसाइटी की Fire Safety गंभीर रूप से प्रभावित है और किसी भी आग की स्थिति में firefighting operations बाधित हो सकते हैं, जिससे रहवासियों के जीवन और संपत्ति पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
पीड़ित निवासी राहुल रंजन कहते हैं –
“मैंने मार्च 2022 से लेकर आज तक महानगरपालिका के हर स्तर पर गुहार लगाई। सोसाइटी के संचालक मंडल से भी वर्षों तक अनुरोध किया। वर्ष 2023 में हमारी सोसाइटी के 39-40 सदस्यों को MRTP के तहत नोटिस भेजी गई, लेकिन उसके बाद भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। अप्रैल 2025 में माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्काल कार्रवाई के आदेश के करीब तीन महीने बाद सुनवाई लगाई गई। सुनवाई हो गई, लेकिन उसके आदेश को भी तीन-चार महीने तक रोककर रखा गया। जब तक Contempt of Court की नोटिस नहीं आई, तब तक उस सुनवाई का आदेश पारित नहीं किया गया। अवमानना की कार्रवाई शुरू होने के बाद आनन-फानन में MRTP सुनवाई के आदेश पारित किए गए और हमारी सोसाइटी में किए गए सभी संबंधित बांधकाम, परमानेंट शेड और अतिक्रमण को अवैध घोषित करते हुए स्वनिष्कासन का आदेश दिया गया। इसके बाद 17 नवंबर 2025 को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की तारीख भी दी गई, लेकिन आज तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
कबूतरों की बीट हमारे परिवार के स्वास्थ्य पर लगातार गंभीर असर डाल रही है। कॉमन एरिया पर कब्जे हमारे अधिकार छीन रहे हैं और Fire Safety भी पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। इन अवैध बांधकामों के कारण सोसाइटी की Fire Safety गंभीर रूप से खतरे में है और यदि किसी भी प्रकार की आग लगने की स्थिति उत्पन्न होती है तो अग्निशमन कार्यवाही (firefighting operations) बुरी तरह प्रभावित होगी, जिससे सोसाइटी के सभी रहवासियों के जीवन और संपत्ति पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। यदि माननीय बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों का भी पालन नहीं होता, तो एक सामान्य नागरिक आखिर न्याय के लिए किस दरवाजे पर जाए? क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है?”
एक पत्रकार की नजर से देखें तो इस मामले की सबसे बेचैन करने वाली बात केवल यह नहीं है कि एक सोसाइटी में अवैध निर्माणों की शिकायत है। असली सवाल यह है कि एक नागरिक ने पहले अपने स्तर पर समस्या सुलझाने की कोशिश की, फिर सोसाइटी के संचालक मंडल से अनुरोध किया, उसके बाद महानगरपालिका के अलग-अलग अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए और अंततः न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने भी निर्देश दिए। इसके बाद भी यदि अंतिम परिणाम वही शून्य है, तो नागरिक आखिर किस व्यवस्था पर भरोसा करे?
आम आदमी के लिए न्यायालय कोई सामान्य सरकारी कार्यालय नहीं होता। वह वहां तभी जाता है जब बाकी रास्ते बंद हो चुके होते हैं। उसके लिए अदालत आखिरी उम्मीद होती है। वह अपनी बची हुई ताकत, समय और संसाधन लगाकर वहां पहुंचता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि अदालत का आदेश प्रशासन के लिए अंतिम निर्देश होगा और उसके बाद न्याय जमीन पर दिखाई देगा।
लेकिन यदि अदालत के आदेश के बाद भी उसे उसी समस्या के साथ अपने घर लौटना पड़े, तो उसकी पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती। वह सवाल बन जाती है- क्या न्याय पाने के बाद भी न्याय के क्रियान्वयन के लिए एक नागरिक को अलग लड़ाई लड़नी होगी?
यही वह बिंदु है जहां Sigrun Splendor का मामला पूरे प्रशासनिक तंत्र को आईना दिखाता है।
किसी निर्माण को अवैध घोषित करना पर्याप्त नहीं है। नोटिस जारी करना भी पर्याप्त नहीं है। सुनवाई करना भी पर्याप्त नहीं है। न्यायालय में जवाब देना भी पर्याप्त नहीं है। आखिरकार नागरिक को चाहिए क्या? कार्रवाई।
वह चाहता है कि उसका कॉमन एरिया वास्तव में मुक्त हो। वह चाहता है कि उसके घर के आसपास स्वास्थ्य का खतरा वास्तव में कम हो। वह चाहता है कि आग लगने की स्थिति में फायर ब्रिगेड का रास्ता वास्तव में खुला हो। और सबसे बढ़कर, वह चाहता है कि जिस कानून पर उसने भरोसा किया, वह उसके सामने दिखाई भी दे।
आज इस मामले में सबसे बड़े सवाल यही हैं – वसई-विरार शहर महानगरपालिका ने जिन निर्माणों को अवैध घोषित किया, वे अब तक क्यों कायम हैं? 17 नवंबर 2025 की प्रस्तावित कार्रवाई क्यों नहीं हुई? हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों रही? और क्या महानगरपालिका को कार्रवाई के लिए हर बार न्यायालय की सख्ती या अवमानना की नौबत का इंतजार करना पड़ेगा?
इन सवालों के जवाब केवल राहुल रंजन नहीं, बल्कि वसई-विरार के हर उस नागरिक को चाहिए जो यह मानता है कि कानून सबके लिए बराबर है।
क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि एक सामान्य नागरिक, चाहे उसके पास कोई राजनीतिक ताकत हो या न हो, यह भरोसा रख सके कि जब महानगरपालिका नहीं सुनेगी, तब न्यायालय सुनेगा; और जब न्यायालय आदेश देगा, तब महानगरपालिका उसे लागू करेगी।
अगर इस पूरी कड़ी में आखिरी कड़ी ही कमजोर पड़ जाए, तो नुकसान सिर्फ एक शिकायतकर्ता का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है जिस पर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी है।
Sigrun Splendor की कहानी इसलिए खत्म नहीं होती कि आदेश जारी हो गया। कहानी तब खत्म होगी, जब आदेश जमीन पर दिखाई देगा।
और तब तक सवाल बना रहेगा –
उच्च न्यायालय के आदेश भी बेअसर क्यों?
अवैध निर्माण कब हटेंगे, कॉमन एरिया कब मुक्त होगा और वसई-विरार शहर महानगरपालिका कब जवाब देगी?
—–समाप्त—–
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