Vasai Virar: भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार के पास देश में मौजूद स्वास्थ्यकर्मियों की वास्तविक, अद्यतन और भरोसेमंद तस्वीर है? खासकर नर्सिंग जैसे क्षेत्र में, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी जिम्मेदारी सीधे नर्सों के कंधों पर होती है, यह सवाल और गंभीर हो जाता है।
अस्पताल के सामान्य वार्ड से लेकर ICU, ऑपरेशन थिएटर, प्रसूति सेवाओं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और आपातकालीन सेवाओं तक नर्सिंग पेशेवर स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल हैं। ऐसे में किसी देश के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि उसके पास कुल कितनी नर्सें हैं, कितनी सक्रिय हैं, वे कहां तैनात हैं, उनकी विशेषज्ञता क्या है और जरूरत पड़ने पर उनमें से कितनों को तत्काल किसी दूसरे क्षेत्र में भेजा जा सकता है।
यहीं भारत के Nurses Registration & Tracking System यानी NRTS को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक देश में 46.02 लाख नर्सिंग कर्मी पंजीकृत थे। इनमें Registered Nurses & Registered Midwives यानी RN & RM, Auxiliary Nurse Midwives यानी ANM और Lady Health Visitors यानी LHV शामिल हैं। लेकिन उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के अनुसार इनमें से सिर्फ 14.24 लाख नर्सिंग कर्मी ही NRTS में नामांकित हैं। यानी करीब 31.78 लाख पंजीकृत नर्सिंग कर्मियों का राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्टर में नामांकन नहीं हुआ है।
यहां सबसे पहले एक जरूरी बात स्पष्ट करना आवश्यक है। इन 31.78 लाख नर्सों को “अपंजीकृत” या “अवैध” कहना सही नहीं होगा। किसी नर्स का State Nursing Council में पंजीकरण होना और NRTS में राष्ट्रीय स्तर पर नामांकन होना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। राज्य परिषद नर्स को कानूनी रूप से अभ्यास करने का लाइसेंस देती है, जबकि NRTS का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों के पंजीकरण रिकॉर्ड को एक राष्ट्रीय डिजिटल Live Register में जोड़ना है।
लेकिन यहीं से असली सवाल पैदा होता है।
अगर देश में 46 लाख से अधिक नर्सिंग कर्मी पंजीकृत हैं, तो राष्ट्रीय Live Register में उनका इतना बड़ा हिस्सा क्यों नहीं है?
क्या भारत के पास अपनी nursing workforce की पूरी और प्रमाणित राष्ट्रीय तस्वीर मौजूद है? क्या सरकार यह बता सकती है कि देश में कितनी नर्सें वास्तव में सक्रिय हैं? कितनी दूसरे राज्यों में काम कर रही हैं? कितनी विदेश जा चुकी हैं? कितनों का registration सक्रिय है और कितनों का नवीनीकरण लंबित है? कितनी नर्सें ICU, critical care, emergency, neonatal care या दूसरी विशेषज्ञ सेवाओं में प्रशिक्षित हैं?
अगर इन सवालों के जवाब अलग-अलग राज्य परिषदों, अलग-अलग databases और पुराने रजिस्टरों में बिखरे हुए हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य नीति और workforce planning आखिर कितनी सटीक हो सकती है?
करीब एक दशक पुरानी योजना, फिर भी अधूरा राष्ट्रीय रजिस्टर
NRTS कोई नई योजना नहीं है। भारतीय नर्सिंग परिषद के अनुसार, इसे 2016-17 में एक computerized interactive system के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य देशभर में registered nurses का एक Live Register तैयार करना था।
उस समय समस्या साफ थी। अलग-अलग State Nursing Councils के पास अपने-अपने registration systems थे। रिकॉर्ड रखने के तरीके अलग थे, technology अलग थी और data formats में भी समानता नहीं थी। ऐसे में पूरे देश की nursing workforce का एक भरोसेमंद national database तैयार करना आसान नहीं था।
इसी समस्या को दूर करने के लिए NRTS की परिकल्पना की गई। उद्देश्य था कि हर नर्स की पहचान, registration, qualification और professional status को एक राष्ट्रीय डिजिटल व्यवस्था से जोड़ा जाए। नर्सों को National Unique Identity Number यानी NUID देने और Nurse Passbook जैसी व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया।
साल 2019 में सरकार ने लोकसभा में बताया था कि NRTS के लिए 25 करोड़ रुपये earmark किए गए हैं। सभी State Nursing Councils को hardware और manpower उपलब्ध कराने तथा data collection के लिए enrolment agencies तैनात करने की जानकारी भी दी गई थी।
यहां लगभग एक दशक बाद सरकार से स्वाभाविक सवाल पूछा जाना चाहिए—
जब योजना के लिए पैसा था, hardware था, manpower था और enrolment agencies भी थीं, तो फिर आज भी national register इतना अधूरा क्यों है?
क्या समस्या केवल तकनीकी थी? अगर नहीं, तो समस्या कहां थी?
क्या State Nursing Councils ने समय पर अपना पूरा data उपलब्ध नहीं कराया? क्या पुराने records digitise नहीं हुए? क्या verification प्रक्रिया धीमी रही? या फिर NRTS की संरचना ही ऐसी रही कि राज्यों से data को लगातार और real-time तरीके से national system में लाना संभव नहीं हुआ?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
NRTS में enrolment और राज्य में registration के बीच का अंतर
इस पूरे विषय में सबसे ज्यादा भ्रम इसी बिंदु को लेकर है। NRTS में नामांकन का अर्थ किसी नर्स को नया लाइसेंस देना नहीं है। भारतीय नर्सिंग परिषद के अनुसार नर्सों के registration और practice licence की मूल जिम्मेदारी State Nursing Registration Councils की है।
NRTS का उद्देश्य उन राज्य स्तरीय registrations को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ना और उनका एक standardized digital record तैयार करना है।
इसका अर्थ यह हुआ कि कोई नर्स महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार या किसी अन्य राज्य की Nursing Council में पूरी तरह वैध रूप से registered हो सकती है, लेकिन उसका record NRTS में अभी तक दिखाई नहीं दे सकता।
इसलिए 46.02 लाख और 14.24 लाख के आंकड़ों के बीच का अंतर “registered बनाम unregistered nurses” का अंतर नहीं है।
यह राज्य स्तर के registration और राष्ट्रीय स्तर के digital integration के बीच का अंतर है।
लेकिन स्वास्थ्य नीति के लिए यह अंतर फिर भी बेहद महत्वपूर्ण है।
क्योंकि यदि national database में data अधूरा है तो सरकार के पास national workforce की वास्तविक तस्वीर अधूरी ही रहेगी।
“Live Register” आखिर कितना Live है?
यहीं NRTS की सबसे बड़ी परीक्षा है। किसी database को Live Register कहना केवल इसलिए पर्याप्त नहीं है कि उसमें लाखों नाम मौजूद हैं। एक वास्तविक Live Register में यह लगातार अपडेट होना चाहिए कि कौन active है, किसका registration renew हुआ है, किसका registration expire हो चुका है, किसका licence suspend या cancel हुआ है, कौन retirement ले चुका है और कौन देश छोड़कर विदेश में काम कर रहा है।
नर्सिंग workforce के मामले में यह जानकारी और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि registered workforce और active workforce हमेशा एक जैसी नहीं होती।
एक नर्स दस साल पहले registered हो सकती है, लेकिन आज वह पेशे में सक्रिय न हो। कोई विदेश में काम कर रही हो सकती है। कोई दूसरे राज्य में चली गई हो सकती है। कोई registration renew नहीं करा पाई हो सकती है।
इसलिए केवल यह कहना कि भारत में 46.02 लाख nursing personnel registered हैं, workforce की पूरी तस्वीर नहीं देता।
सरकार को यह बताना होगा कि इनमें से वास्तव में कितनी nurses आज healthcare delivery system में सक्रिय हैं। और इस सवाल का जवाब देने के लिए एक मजबूत, updated और verified national registry जरूरी है।
2024 का आंकड़ा भी गंभीर सवाल खड़ा करता है
भारतीय नर्सिंग परिषद की 2023-24 Annual Report में 31 मार्च 2024 तक NRTS में 11,76,375 enrolments का आंकड़ा दिया गया था। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सभी State Nursing Councils को NRTS platform पर लाया जा चुका है।
अगर State Nursing Councils को platform पर लाया जा चुका था, तो फिर एक बड़ा सवाल यह है कि उनके सभी registered nursing personnel का data national system में पूरी तरह क्यों नहीं दिख रहा?
किसी platform पर council का मौजूद होना और council के सभी historical और current records का उस platform पर verified होना दो अलग बातें हैं।
यही वह अंतर है जिसे सरकार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए।
कितने records migrate हुए? कितने pending हैं? कितने पुराने paper registers अभी digitise नहीं हुए? कितने records duplicate हैं? कितने records verification में अटके हुए हैं? जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक NRTS की सफलता को केवल “platform integration” के आधार पर मापना मुश्किल है।
राज्यों की स्वायत्तता बनाम राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यवस्था
भारत की संघीय व्यवस्था में State Nursing Councils की अपनी वैधानिक भूमिका है। इसे खत्म करना न तो जरूरी है और न ही व्यावहारिक। लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य की regulatory autonomy और राष्ट्रीय digital registry एक साथ नहीं चल सकती?
बिल्कुल चल सकती है।
राज्य परिषद registration और licensing का अधिकार अपने पास रख सकती है, जबकि NRTS राष्ट्रीय digital identity, verification और workforce information का platform बन सकता है। एक nurse का State Registration Number उसकी राज्य स्तरीय पहचान हो सकता है, जबकि NUID उसकी national professional identity। यही व्यवस्था interstate mobility को भी आसान बना सकती है।
अगर कोई nurse महाराष्ट्र से कर्नाटक जाती है या तमिलनाडु से दिल्ली में नौकरी करती है, तो उसकी professional identity शून्य से शुरू नहीं होनी चाहिए। उसके qualifications, registration history और professional status का verified digital record उसके साथ जाना चाहिए।
यही NRTS का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था।
2026 के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले ने भी इस जरूरत को रेखांकित किया
अप्रैल 2026 में मद्रास हाईकोर्ट ने NRTS से जुड़े मामले में national digital platform की अवधारणा और उसके उद्देश्यों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। फैसले में national database, transparency, registration traceability, reciprocal recognition और duplication रोकने जैसे उद्देश्यों पर चर्चा हुई। National Unique Identification Number को राज्यों और jurisdictions के बीच professional identity की portability और traceability से भी जोड़ा गया।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि NRTS केवल एक सरकारी वेबसाइट नहीं है। यह देश में nursing profession की national portability और professional traceability से जुड़ा infrastructure है।
अगर यह infrastructure अधूरा है, तो उसका असर सिर्फ सरकारी database पर नहीं पड़ता। इसका असर उन नर्सों पर भी पड़ता है जो रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य या भारत से विदेश जाना चाहती हैं।
डिजिटल गैप का असर नर्सों के करियर पर भी
एक नर्स के लिए registration केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं है। यही उसकी professional identity और practice की वैधता का आधार है।
यदि registration verification में देरी होती है तो नौकरी में देरी हो सकती है। यदि दूसरे राज्य में transfer के लिए रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं है तो administrative process लंबा हो सकता है। विदेश में नौकरी के लिए qualification और registration verification की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
भारतीय नर्सें दुनिया के कई देशों की healthcare systems में काम करती हैं। ऐसे में भारत के लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि उसकी कितनी trained nursing workforce विदेश में है।
भारतीय नर्सिंग परिषद ने स्वयं विदेशों में काम कर रही भारतीय नर्सों को NRTS में enrolment के लिए अपील की थी। इसका उद्देश्य भारत और विदेशों में काम कर रही भारतीय nurses का Live Register तैयार करना था।
लेकिन इससे एक और बड़ा सवाल सामने आता है—
क्या भारत के पास अपनी nursing migration का भी सटीक और updated database है? अगर नहीं, तो भारत एक बड़े health workforce resource को सिर्फ “विदेश जाने वाले professionals” के रूप में देख रहा है, workforce planning के नजरिए से नहीं।
स्वास्थ्य नीति बिना सही डेटा के कितनी प्रभावी?
किसी भी सरकार के लिए healthcare planning का पहला सवाल होना चाहिए—कितने लोग हैं और उनकी जरूरत कहां है?
यदि किसी राज्य में 50 हजार registered nurses हैं लेकिन यह पता नहीं कि उनमें से कितनी active हैं, कितनी दूसरे राज्यों में काम कर रही हैं और कितनी विदेश जा चुकी हैं, तो उस राज्य की workforce planning कितनी सटीक होगी?
इसी तरह किसी ऐसे जिले में जहां nursing workforce की भारी कमी है, सरकार को यह पता होना चाहिए कि वहां कितनी nurses हैं, कितनी specialist nurses हैं और कितने पद वास्तव में खाली हैं।
बिना reliable data के सरकार को अंदाजे पर निर्भर रहना पड़ सकता है। और healthcare में गलत अनुमान का अर्थ केवल गलत आंकड़ा नहीं होता।
इसका अर्थ हो सकता है – गलत जगह भर्ती, गलत जगह training capacity, गलत जगह budget allocation और गलत जगह health workforce deployment।
कुल संख्या से आगे बढ़कर वितरण पर ध्यान जरूरी
भारत की nursing workforce का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका असमान वितरण है।
दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में nursing workforce काफी मजबूत है, जबकि कई उत्तर और पूर्वी राज्यों में प्रति आबादी nursing personnel की उपलब्धता कम है। इसका मतलब यह है कि भारत की समस्या सिर्फ यह नहीं है कि “नर्सें कितनी हैं।”
सवाल यह भी है कि-
नर्सें कहां हैं?
और उससे भी बड़ा सवाल-
जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां कितनी नर्सें उपलब्ध हैं?
अगर राष्ट्रीय registry ही अधूरी है तो इस regional imbalance की सटीक तस्वीर बनाना और मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि WHO की 2025 State of the World’s Nursing report health workforce data, education, employment, retention और equitable distribution को nursing policy के महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में देखती है। भारत को भी nursing workforce के लिए ऐसी ही evidence-based planning की जरूरत है।
महामारी और आपदा में Live Register की असली जरूरत
COVID-19 महामारी ने पूरी दुनिया को दिखाया कि स्वास्थ्यकर्मियों की वास्तविक समय में उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है। कल्पना कीजिए कि किसी राज्य में अचानक महामारी फैलती है या किसी बड़े प्राकृतिक आपदा के कारण हजारों लोग अस्पतालों में पहुंचते हैं।
सरकार को तुरंत यह जानना होगा कि कितनी nurses उपलब्ध हैं, कितनी ICU और emergency care में प्रशिक्षित हैं, किन जिलों में अतिरिक्त workforce उपलब्ध है और किन क्षेत्रों में तत्काल manpower भेजी जा सकती है।
यदि national database में केवल पुराने registration records हैं और current employment तथा specialization का data नहीं है, तो emergency deployment की क्षमता सीमित रहेगी।
एक मजबूत NRTS को भविष्य में national nursing workforce command map की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उसे वास्तव में live बनाना होगा।
मरीजों की सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
यह कहना सही नहीं होगा कि NRTS में कम enrolment के कारण बड़ी संख्या में फर्जी nurses healthcare system में काम कर रही हैं। उपलब्ध आंकड़े ऐसा निष्कर्ष साबित नहीं करते। लेकिन fragmented और outdated records verification को मुश्किल जरूर बना सकते हैं।
एक आधुनिक healthcare system में किसी अस्पताल या healthcare provider के लिए यह संभव होना चाहिए कि वह किसी nurse की identity, qualification, registration status और professional validity को एक भरोसेमंद national system से verify कर सके।
मरीज को यह भरोसा होना चाहिए कि उसके सामने healthcare professional की credentials वास्तविक और current हैं। यही कारण है कि national nursing registry को केवल government database के रूप में नहीं, बल्कि patient safety infrastructure के रूप में भी देखना चाहिए।
सरकार से अब एक सीधा सवाल
अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार और भारतीय नर्सिंग परिषद NRTS की वास्तविक स्थिति को लेकर पारदर्शी राज्यवार आंकड़े सार्वजनिक करें। कितने नर्सिंग कर्मी पंजीकृत हैं, कितने NRTS में शामिल हैं, कितने रिकॉर्ड सत्यापन या अपडेट के इंतजार में हैं और किन राज्यों में सबसे बड़ा अंतर है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।
करीब एक दशक पुराने इस सिस्टम की सफलता केवल पोर्टल बनने से नहीं, बल्कि उसके पूर्ण, अद्यतन और विश्वसनीय होने से तय होगी।
और यदि NRTS को वास्तव में “Live Register” कहा जाता है, तो यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि उसका data कितनी नियमितता से update होता है और उसमें मौजूद records कितने प्रतिशत verified हैं।
क्योंकि केवल यह कहना कि “सभी State Nursing Councils platform पर हैं” पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उन परिषदों का पूरा और current data भी राष्ट्रीय रजिस्टर में मौजूद है?
सवाल 46 लाख बनाम 14 लाख का नहीं, भरोसेमंद डेटा का है
भारत में 46.02 लाख registered nursing personnel होना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन 14.24 लाख NRTS enrolment का आंकड़ा, जैसा कि उपलब्ध संसदीय आंकड़ों में सामने आता है, राष्ट्रीय स्तर पर digital integration के एक बड़े gap की ओर इशारा करता है।
यह कहना सही नहीं होगा कि बाकी 31.78 लाख नर्सें देश के स्वास्थ्य सिस्टम से बाहर हैं या उनका registration अवैध है।
लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि-राष्ट्रीय Live Register में उनका verified digital footprint क्यों नहीं है?
2016-17 में जिस समस्या की पहचान की गई, उसके समाधान के लिए portal बनाया गया। 2019 में इसके लिए 25 करोड़ रुपये earmark किए गए। State Nursing Councils को hardware और manpower देने की बात हुई। Enrolment agencies लगाई गईं। National Unique Identity की व्यवस्था बनाई गई। 2024 तक INC ने सभी State Nursing Councils को platform पर लाए जाने की बात भी कही।
फिर भी आज सवाल बाकी है।
क्या भारत अपनी nursing workforce को वास्तव में जानता है?
कहां कितनी nurses हैं? कितनी active हैं? कितनी specialist हैं? कितनी विदेश में हैं? कितनी दूसरे राज्यों में चली गई हैं? कितनों का registration active है? और जरूरत पड़ने पर सरकार कितनी nurses को कितनी जल्दी mobilise कर सकती है?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर के बिना 46 लाख का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या है। भारत को अब “कितनी नर्सें पंजीकृत हैं” से आगे बढ़कर “कितनी नर्सें वास्तव में उपलब्ध हैं और कहां उपलब्ध हैं” का जवाब चाहिए। NRTS को सिर्फ एक registration portal नहीं, बल्कि भारत की nursing workforce का verified, updated और genuinely live national map बनना होगा।
और अगर सरकार सचमुच इसे “Live Register” कहती है, तो अगला कदम सिर्फ enrolment बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
अगला कदम होना चाहिए – इस Live Register को जनता के सामने पारदर्शी, अद्यतन और जवाबदेह बनाना।
क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में अधूरा डेटा सिर्फ एक प्रशासनिक कमी नहीं है।
अधूरा डेटा मतलब अधूरी planning।
अधूरी planning मतलब गलत deployment।
और गलत deployment का असर आखिरकार मरीज तक पहुंचने वाली स्वास्थ्य सेवा पर पड़ सकता है।
भारत ने अगर अपनी nursing workforce को स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माना है, तो अब उस रीढ़ का सटीक राष्ट्रीय डिजिटल एक्स-रे भी तैयार करना होगा।
—–समाप्त—–
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