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SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद? दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार दर्ज कराई आपत्ति

Election Commission of India SIR voter list revision and Form 6
SIR के दौरान मतदाता सूची, Form 6 और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल

वसई-विरार। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रही बहस अब चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली तक पहुंचती दिखाई दे रही है। The Indian Express की एक पड़ताल के मुताबिक, पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम-से-कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और आदेशों को लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराई। इनमें एक ही दिन चार अलग-अलग मामलों पर आपत्ति दर्ज की गई।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध केवल SIR से नहीं था। नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता सूची से जुड़ी अपीलों और चुनाव आयोग के IT सिस्टम की निगरानी जैसे मुद्दे भी इनमें शामिल थे।

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां

क्रम संख्या तारीख आपत्ति दर्ज करने वाले क्या थी आपत्ति?
1. 28 अक्टूबर 2025 सुखबीर सिंह संधू आयोग की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम से पत्र और आदेश जारी किए गए।
2. 16 अप्रैल 2026 सुखबीर सिंह संधू नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में उन्हें मीडिया से जानकारी मिली।
3. 16 अप्रैल 2026 सुखबीर सिंह संधू आयोग की मंजूरी के बिना संदेश जारी किए गए।
4. 16 अप्रैल 2026 विवेक जोशी एक साल से अधिक समय से आयोग की बैठकों के बाद मिनट्स जारी किए जा रहे थे लेकिन अगली बैठक का एजेंडा पहले उपलब्ध नहीं कराया जा रहा था।
5. 16 अप्रैल 2026 विवेक जोशी आयोग की मंजूरी के बिना अधिकारियों को विदेश यात्राओं पर भेजा जा रहा था।
6. 24 अप्रैल 2026 विवेक जोशी विवेक जोशी ने दोहराया कि आयोग की मंजूरी के बिना कोई आधिकारिक संदेश जारी नहीं होने चाहिए।
7. 16 मई 2026 विवेक जोशी सरकार की मंजूरी के बिना नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। संधू ने 19 मई को इस पर सहमति जताई।
8. 29 मई 2026 विवेक जोशी चेतावनी दी कि मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत किया जा रहा है और इसका ऑडिट जरूरी है।
9. 29 जुलाई 2026 जोशी ने कैबिनेट सचिव को एक अधिकारी आयोग की जानकारी के बिना काम का बंटवारा कर रहा था।
10. 29 जुलाई 2026 संधू ने कैबिनेट सचिव को काम के आवंटन से जुड़े मुद्दे को दोहराया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
11. 30 जुलाई 2026 जोशी और संधू ने दोनों चुनाव आयुक्तों ने काम के आवंटन से जुड़े एक आदेश को रद्द कर दिया।
12. 12 अगस्त 2026 सुखबीर सिंह संधू पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल के सामने चुनाव आयोग की ओर से अपील करने की अनुमति किसने दी?
13. 13 अगस्त 2026 सुखबीर सिंह संधू फॉर्म 6 में बदलाव को ‘अनाधिकृत और गैरकानूनी’ बताया।
14. 14 अगस्त 2026 सुखबीर सिंह संधू फील्ड अफसरों को ECINET सिस्टम तक पहुंच नहीं मिल रही थी। डीजी (आईटी) के पास इसे प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं है।

Form 6 में बदलाव पर सवाल

मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलाव से जुड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, Form 6 में एक नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से पूछा जा रहा था कि क्या उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पहले हुए SIR की मतदाता सूची में मौजूद था। इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म आगे नहीं बढ़ रहा था।

मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि संबंधित नियमों में बदलाव किए बिना Form 6 को इस तरह संशोधित नहीं किया जा सकता। संधू ने भी इस राय से सहमति जताई थी।

दस्तावेज़ के अनुसार, इसके बावजूद बदलाव लागू किया गया। बाद में 13 अगस्त को संधू ने रिकॉर्ड पर इस बदलाव को “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए सवाल को तत्काल हटाने की बात कही।

मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर चिंता

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का दूसरा अहम हिस्सा मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम से संबंधित था।

चुनाव आयोग की व्यवस्था में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का Electoral Registration Officer यानी ERO मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव की प्रक्रिया संभालता है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने सवाल उठाया कि क्या इन वैधानिक अधिकारियों की मतदाता डेटाबेस तक पहुंच सीमित की जा रही है।

मई में जोशी ने इसे मतदाता डेटाबेस के “धीरे-धीरे केंद्रीकरण” का मामला बताया और ऑडिट का सुझाव दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की बात कही कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के पास मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की क्षमता न हो।

अगस्त में संधू ने भी इसी मुद्दे को उठाया। उन्होंने बताया कि राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की ओर से शिकायतें मिली हैं कि उन्हें ERONet तक पूरी और उचित पहुंच नहीं मिल रही है।

पश्चिम बंगाल में अपीलों पर सवाल

SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में भी विवाद सामने आया। मतदाता सूची से नाम हटाने और उन्हें दोबारा शामिल करने की प्रक्रिया को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

दस्तावेज़ के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद SIR के दौरान “logical discrepancies” के आधार पर चिह्नित मतदाताओं के मामलों पर न्यायिक अधिकारियों के जरिए फैसला कराने की व्यवस्था की गई। बाद में आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के सामने करीब 38 लाख अपीलें लंबित हैं।

इनमें 22.21 लाख अपीलें उन मतदाताओं की थीं जिनके नाम हटाए गए थे और वे उन्हें दोबारा जुड़वाना चाहते थे। करीब 16.10 लाख अपीलें ऐसे मतदाताओं के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल किया था और उनके नाम हटाने की मांग की गई थी।

इसी मामले में संधू ने सवाल उठाया कि आयोग की ओर से इन अपीलों को दायर करने की अनुमति किसने दी। उन्होंने पूछा कि अपील दायर करने के लिए किसे अधिकृत किया गया था और वास्तव में ये अपीलें किसने दाखिल कीं।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

मतदाता डेटाबेस और सॉफ्टवेयर से जुड़ी चिंताओं का एक उदाहरण गोवा में भी सामने आया।

SIR के दौरान कुछ मतदाताओं को “logical discrepancy” के आधार पर चिह्नित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ऐसे मतदाताओं को दस्तावेज पेश करने और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया।

गोवा में EROs ने मामलों की सुनवाई की। दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने 97 मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, सॉफ्टवेयर में EROs के इस फैसले को दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।

गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच इस समस्या के समाधान के लिए आठ बार पत्र लिखे और “rollback” विकल्प उपलब्ध कराने की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक, समयसीमा के भीतर यह सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई और ये 97 मतदाता अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।

आयोग में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल

इन घटनाओं के बीच चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आई।

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। दस्तावेज़ में उद्धृत 2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act की धारा 18 के अनुसार, आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर फैसला किया जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने आयोग के अधिकारियों को इन प्रावधानों की याद दिलाते हुए आयोग की मंजूरी के बिना उसके नाम से जारी होने वाले संचार पर भी सवाल उठाया।

IT सिस्टम को लेकर कैबिनेट सचिव को पत्र

काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा।

रिपोर्ट के मुताबिक, काम के बंटवारे में किए गए बदलाव से मतदाता सूची के IT सिस्टम पर निगरानी की एक परत हटने की स्थिति बनी। दोनों आयुक्तों ने कहा कि ये बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे। इसी अवधि में आयोग का नया डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet भी चर्चा में रहा।

चार महीने बाद हुई तीनों आयुक्तों की बैठक

रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की 9 सितंबर को बैठक हुई। यह चार महीनों में तीनों की पहली पूर्ण बैठक थी।

इससे पहले संधू और जोशी की ओर से लगातार दर्ज की गई आपत्तियों ने आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए थे।

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

The Indian Express ने 21 सितंबर को चुनाव आयोग से दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर कार्रवाई और उनके समाधान को लेकर सवाल भेजे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उसे आयोग की ओर से जवाब नहीं मिला। दोनों चुनाव आयुक्तों से भी इन मुद्दों और 9 सितंबर की बैठक को लेकर प्रतिक्रिया मांगी गई थी।

हालांकि, रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इस बात से इनकार किया कि SIR को लेकर आयोग में कोई निर्णयगत विभाजन था। उनका कहना है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए।

इस तरह सामने आई तस्वीर में एक ओर The Indian Express की पड़ताल में दर्ज 14 औपचारिक आपत्तियां, पत्र और फाइल टिप्पणियां हैं, जबकि दूसरी ओर आयोग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

विवाद का केंद्र केवल SIR के तहत मतदाता सूची में हुए बदलाव नहीं हैं। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि मतदाता सूची तैयार करने की वैधानिक प्रक्रिया में अंतिम नियंत्रण किसके पास है, डिजिटल सिस्टम में किस अधिकारी की क्या भूमिका है और चुनाव आयोग के भीतर फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे हैं।

—–समाप्त—–

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