Vasai-Virar : भारत में इथेनॉल (Ethanol-Blended Petrol) को लेकर जिस गति से नीतिगत फैसले लिए जा रहे हैं, वह जितनी महत्वाकांक्षी दिखाई देती है, उतनी ही गंभीर बहस की भी मांग करती है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण से शुरू हुई पहल अब विमानन क्षेत्र तक पहुंचने की तैयारी में है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि और कार्बन उत्सर्जन में कमी का रास्ता बता रही है। इन उद्देश्यों से शायद ही किसी को असहमति हो।
लेकिन क्या किसी नीति के उद्देश्य ही उसकी सफलता की गारंटी होते हैं?
भारत में अक्सर बड़े सुधारों का मूल्यांकन उनके घोषित लक्ष्यों से किया जाता है, उनकी वास्तविक लागत से नहीं। इथेनॉल नीति भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि इथेनॉल अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि क्या भारत ने इस बदलाव की पूरी कीमत का आकलन किया है, या हम ऊर्जा सुरक्षा की तलाश में नए आर्थिक, कृषि और पर्यावरणीय जोखिमों को जन्म दे रहे हैं?
सरकार का तर्क है कि भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत जरूरत आयात करता है। यह तथ्य सही है और आयात निर्भरता कम करना राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। लेकिन किसी एक चुनौती का समाधान यदि दूसरी चुनौतियों को जन्म देने लगे, तो नीति की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
इथेनॉल की सबसे बड़ी तकनीकी सीमा उसकी ऊर्जा क्षमता है। वैज्ञानिक रूप से इसमें पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 से 33 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसका अर्थ है कि समान दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन की आवश्यकता होगी। यदि उपभोक्ता को कीमत लगभग समान चुकानी पड़े और माइलेज कम मिले, तो वास्तविक लाभ किसका होगा? सरकार ने आयात बचत का अनुमान तो सार्वजनिक किया है, लेकिन क्या उसने उपभोक्ताओं पर पड़ने वाली कुल अतिरिक्त लागत का भी समग्र आकलन सार्वजनिक किया है?
दूसरा और कहीं अधिक गंभीर प्रश्न देश के करोड़ों वाहन मालिकों से जुड़ा है। भारत की सड़कों पर आज भी बड़ी संख्या में ऐसे वाहन हैं जिन्हें E20 ईंधन को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया था। ऑटोमोबाइल कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने समय-समय पर चेतावनी दी है कि पुराने वाहनों में अधिक इथेनॉल मिश्रण से फ्यूल सिस्टम, रबर सील, पाइप और धातु के पुर्जों पर असर पड़ सकता है। यदि यह जोखिम वास्तविक है, तो क्या देशव्यापी स्तर पर स्वतंत्र, दीर्घकालिक और सार्वजनिक परीक्षण पूरे किए गए हैं? यदि हाँ, तो उनके निष्कर्ष आसानी से उपलब्ध क्यों नहीं हैं?
नीति का एक और कम चर्चित पक्ष कृषि है। इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, मक्का और चावल की मांग बढ़ रही है। इससे किसानों की आय बढ़ सकती है, लेकिन क्या इससे खेती का संतुलन भी बदलेगा? यदि दालों और तिलहनों का रकबा घटता है, तो खाद्य तेलों और आवश्यक खाद्यान्नों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। क्या हम तेल आयात कम करने के प्रयास में खाद्य आयात बढ़ाने का जोखिम उठा रहे हैं?
इसी तरह मक्का की बढ़ती मांग का असर पशुपालन पर पड़ना तय है। चारे की लागत बढ़ेगी तो डेयरी और पोल्ट्री उद्योग प्रभावित होंगे। अंततः दूध, अंडे और मांस जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी। ऊर्जा नीति के इन अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों पर सार्वजनिक विमर्श लगभग नदारद है।
सबसे चिंताजनक प्रश्न पानी का है। भारत दुनिया के सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त देशों में है, जबकि गन्ना सबसे अधिक पानी मांगने वाली फसलों में शामिल है। यदि इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए गन्ने का विस्तार होता है, तो क्या ऊर्जा सुरक्षा की कीमत भूजल चुकाएगा?
इथेनॉल समर्थक अक्सर ब्राज़ील का उदाहरण देते हैं। लेकिन तुलना तभी सार्थक होती है जब परिस्थितियाँ भी समान हों। ब्राज़ील ने लगभग पाँच दशकों तक चरणबद्ध तैयारी की—पहले वाहन तकनीक विकसित हुई, फिर ईंधन वितरण व्यवस्था बदली और उसके बाद उपभोक्ताओं को विकल्प मिले। भारत में परिवर्तन कहीं अधिक तेज़ी से लागू किया जा रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हमने ब्राज़ील का मॉडल अपनाया है, या केवल उसका परिणाम?
भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भर अवश्य बनना चाहिए, लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ किसी एक विकल्प पर अत्यधिक भरोसा नहीं हो सकता। भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रीन हाइड्रोजन, बायोगैस, कम्प्रेस्ड बायोगैस, टिकाऊ विमानन ईंधन और कृषि अवशेषों से बनने वाले दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधनों का भी है। एक परिपक्व ऊर्जा नीति वही होगी जो विकल्पों का संतुलन बनाए, न कि एक विकल्प को समाधान घोषित कर दे।
किसी भी राष्ट्रीय नीति का सबसे बड़ा परीक्षण उसके इरादे नहीं, बल्कि उसके परिणाम होते हैं। इथेनॉल भारत की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि उसकी सफलता की कीमत उपभोक्ता, किसान, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और पर्यावरण को चुकानी पड़े, तो कठिन सवाल पूछना केवल अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी है।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता का लक्ष्य जितना महत्वपूर्ण है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि उस लक्ष्य तक पहुंचने की कीमत भविष्य की पीढ़ियों को न चुकानी पड़े।
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