Vasai-Virar : किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके प्राकृतिक संसाधन, आर्थिक शक्ति या तकनीकी क्षमता मात्र नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों के उस विश्वास में निहित होती है, जिसके आधार पर वे राज्य की संस्थाओं को अपना संरक्षक और कानून को अपना सहारा मानते हैं। यही विश्वास जब कमजोर होने लगता है, तो लोकतंत्र की चमक के पीछे एक गहरी दरार दिखाई देने लगती है। भ्रष्टाचार इसी दरार को चौड़ा करने वाली सबसे गंभीर प्रवृत्तियों में से एक है।
भ्रष्टाचार को अक्सर रिश्वत के लेन-देन तक सीमित करके देखा जाता है। किंतु इसकी वास्तविक परिधि इससे कहीं व्यापक है। सार्वजनिक पद का निजी हित के लिए उपयोग, सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग, ठेकों और परियोजनाओं में अनियमितता, भाई-भतीजावाद, प्रभावशाली लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाना तथा नियमों और प्रक्रियाओं का चुनिंदा हितों के अनुरूप इस्तेमाल—ये सभी उस व्यवस्था का हिस्सा हैं, जहां सार्वजनिक हित पीछे और निजी स्वार्थ आगे आ जाता है।
भारत आर्थिक और तकनीकी प्रगति के अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर रहा है। डिजिटल शासन के विस्तार ने सरकारी सेवाओं तक पहुंच को सरल बनाने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाने की नई संभावनाएं पैदा की हैं। लेकिन तकनीकी आधुनिकीकरण के समानांतर भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों का लगातार सामने आना एक असहज प्रश्न खड़ा करता है—क्या हमारी संस्थागत व्यवस्था भी उतनी ही तेजी से परिपक्व हो रही है, जितनी तेजी से हमारा तकनीकी ढांचा विकसित हो रहा है?
केंद्रीय सतर्कता आयोग की वर्ष 2025 की रिपोर्ट इस प्रश्न को और गंभीर बना देती है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष सरकारी संस्थाओं के विरुद्ध आयोग को 70 हजार से अधिक भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें प्राप्त हुईं। विभिन्न बैंकों से संबंधित 9,933 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 9,520 का निपटारा किया गया। रेलवे से संबंधित 9,381 शिकायतें प्राप्त हुईं और उनमें से 8,754 का निपटारा हुआ। आवास एवं शहरी मामलों के विभाग से संबंधित 6,531 शिकायतें भी आयोग के समक्ष पहुंचीं।
इन आंकड़ों को केवल शिकायतों की संख्या मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन प्रत्येक शिकायत के पीछे किसी नागरिक का अनुभव और किसी संस्था के कामकाज को लेकर उठी आपत्ति मौजूद है। इससे भी अधिक गंभीर प्रश्न उन मामलों का है, जो शिकायत बनने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं।
कितने लोग रिश्वत देकर अपना काम करा लेते हैं और शिकायत नहीं करते? कितने लोग इस आशंका से चुप रह जाते हैं कि शिकायत करने पर उनका काम और अधिक कठिन हो सकता है? कितने लोग यह मान चुके हैं कि व्यवस्था को बदलने की अपेक्षा उसके साथ समझौता कर लेना ही अधिक व्यावहारिक है?
इन प्रश्नों का कोई सटीक आंकड़ा नहीं है। लेकिन भ्रष्टाचार की वास्तविक गहराई शायद इन्हीं अनदेखे अनुभवों में छिपी है।
भ्रष्टाचार का आर्थिक नुकसान निश्चित रूप से गंभीर है। सरकारी धन का दुरुपयोग विकास की प्राथमिकताओं को प्रभावित करता है, सार्वजनिक परियोजनाओं की लागत बढ़ाता है और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण में बाधा डालता है। लेकिन इससे भी अधिक गंभीर उसका नैतिक और संस्थागत प्रभाव है। जब नागरिक को यह अनुभव होने लगे कि कानून से अधिक प्रभावशाली है पैसा, प्रक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण है पहचान और अधिकार से अधिक निर्णायक है पहुंच, तब राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का संबंध कमजोर पड़ने लगता है।
लोकतंत्र की मूल भावना समानता में निहित है। प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि उसे कानून के सामने समान अधिकार और संरक्षण प्राप्त होगा। लेकिन यदि अपने ही वैधानिक अधिकार तक पहुंचने के लिए किसी व्यक्ति को रिश्वत या सिफारिश का सहारा लेना पड़े, तो समानता का सिद्धांत व्यवहार में खोखला पड़ जाता है।
इस विडंबना का सबसे अधिक भार गरीब और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति किसी वैकल्पिक माध्यम का सहारा ले सकता है। प्रभावशाली व्यक्ति अपनी पहुंच का उपयोग कर सकता है। लेकिन जिसके पास न धन है, न प्रभाव और न ही किसी शक्ति-केंद्र तक पहुंच, उसके लिए सरकारी संस्था ही अंतिम आश्रय होती है। यदि वही संस्था उसके लिए बाधा बन जाए, तो कल्याणकारी शासन की पूरी अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
यही कारण है कि भ्रष्टाचार को केवल ‘लेन-देन’ की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह अवसरों की समानता को प्रभावित करता है। यह सामाजिक न्याय को कमजोर करता है। यह प्रशासनिक निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है और अंततः नागरिकों को यह सोचने के लिए विवश करता है कि व्यवस्था वास्तव में किसके लिए काम कर रही है।
डिजिटलीकरण को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण साधन माना जा सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान समझना उचित नहीं होगा। ऑनलाइन सेवाएं प्रक्रियाओं को पारदर्शी बना सकती हैं, परंतु निर्णय लेने की मानसिकता को अपने आप नहीं बदल सकतीं। डिजिटल प्रणाली रिश्वत के पारंपरिक स्वरूप को सीमित कर सकती है, लेकिन यदि निगरानी कमजोर हो और जवाबदेही अस्पष्ट हो, तो भ्रष्टाचार नए रास्ते खोज सकता है।
तकनीक प्रक्रिया बदल सकती है; जवाबदेही ही प्रवृत्ति बदलती है।
इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध वास्तविक लड़ाई संस्थागत जवाबदेही की लड़ाई है। निर्णय लेने वाले प्रत्येक स्तर पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। प्रक्रियाएं सरल हों, नियम स्पष्ट हों, निर्णयों में पारदर्शिता हो और शिकायतों के निवारण की व्यवस्था नागरिकों के लिए विश्वसनीय हो—तभी भ्रष्टाचार के अवसर सीमित किए जा सकते हैं।
इसके साथ समयबद्ध कार्रवाई भी अनिवार्य है। यदि किसी भ्रष्टाचार के मामले में जांच वर्षों तक चलती रहे, दोष तय होने में अनावश्यक विलंब हो और कार्रवाई प्रभावशाली व्यक्तियों के मामले में कमजोर पड़ती दिखाई दे, तो कानून का निवारक प्रभाव स्वतः कम होने लगता है। कानून की शक्ति उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन में होती है।
सार्वजनिक पद किसी व्यक्ति को विशेषाधिकार दे सकता है, लेकिन उसे कानून से ऊपर नहीं कर सकता। लोकतांत्रिक शासन में जवाबदेही का सिद्धांत पद देखकर नहीं बदल सकता।
भ्रष्टाचार की समस्या का एक दूसरा पहलू सामाजिक स्वीकृति भी है। विडंबना यह है कि समाज भ्रष्टाचार को गलत मानते हुए भी कई बार उसे ‘व्यावहारिक मजबूरी’ के रूप में स्वीकार कर लेता है। “बिना दिए काम नहीं होगा”, “सिस्टम ही ऐसा है” और “सब जगह यही चलता है” जैसे वाक्य भ्रष्टाचार को सामान्य बनाने वाली मानसिकता के संकेत हैं।
यहीं समस्या सबसे अधिक गंभीर हो जाती है।
क्योंकि भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी सफलता तब नहीं होती, जब कोई व्यक्ति रिश्वत मांगता है। उसकी सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब नागरिक यह मान लेता है कि रिश्वत दिए बिना काम होना संभव ही नहीं है।
यह मानसिकता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए किसी भी आर्थिक घोटाले से अधिक खतरनाक हो सकती है, क्योंकि यह नागरिक को प्रतिरोध से समझौते की ओर ले जाती है।
विकास की वास्तविक कसौटी भी इसी बिंदु पर निर्धारित होती है। किसी देश में कितने एक्सप्रेसवे बने, कितने पुल खड़े हुए, कितनी मेट्रो परियोजनाएं शुरू हुईं या कितनी सरकारी सेवाएं डिजिटल हुईं—ये सभी प्रगति के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। लेकिन सुशासन की अंतिम परीक्षा किसी सरकारी विज्ञापन में नहीं, उस सामान्य नागरिक के अनुभव में होती है जो किसी सरकारी कार्यालय की कतार में खड़ा है।
क्या उसे अपना काम कराने के लिए सिफारिश की आवश्यकता नहीं है?
क्या उसे अपने अधिकार के लिए अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता?
क्या वह इस विश्वास के साथ किसी सरकारी संस्था के पास जा सकता है कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार होगा?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां में है, तभी सुशासन को जमीन पर महसूस किया जा सकता है।
अन्यथा विकास की चमक और प्रशासनिक वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई बनी रहती है।
भ्रष्टाचार की शुरुआत भी अक्सर बहुत मामूली दिखाई देती है। कुछ नोटों के बदले फाइल आगे बढ़ाना, नियम में छोटी-सी अनदेखी करना या किसी परिचित के लिए प्रक्रिया को थोड़ा आसान कर देना। लेकिन ऐसे छोटे समझौते जब बार-बार दोहराए जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे व्यवस्था की संस्कृति में बदल जाते हैं।
और जब भ्रष्टाचार संस्कृति बन जाए, तब उससे लड़ना केवल कानून का प्रश्न नहीं रह जाता। वह नैतिक पुनर्निर्माण का प्रश्न बन जाता है।
इसीलिए भ्रष्टाचार के उन्मूलन का अर्थ केवल भ्रष्ट व्यक्तियों को पकड़ना नहीं होना चाहिए। उससे कहीं अधिक आवश्यक है उन परिस्थितियों को बदलना, जो भ्रष्टाचार को जन्म देती हैं—जटिल प्रक्रियाएं, अस्पष्ट नियम, कमजोर निगरानी, लंबित जांच, प्रभाव का दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी।
लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी योजनाएं घोषित कीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि सामान्य नागरिक को उन योजनाओं और सेवाओं तक पहुंचने में कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ा।
केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट में दर्ज 70 हजार से अधिक शिकायतें इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं। इन्हें केवल निपटाए जाने वाले मामलों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता पर उठते प्रश्नों के रूप में पढ़े जाने की आवश्यकता है।
क्योंकि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान वह धन नहीं है, जिसकी हेराफेरी हो जाती है। सबसे बड़ी क्षति वह विश्वास है, जो एक बार टूटने के बाद आसानी से वापस नहीं आता।
सरकारी खजाने की भरपाई की जा सकती है, लेकिन नागरिक के टूटे हुए भरोसे की भरपाई कहीं अधिक कठिन है।
अंततः किसी भी लोकतंत्र की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं कि उसके पास कितने शक्तिशाली संस्थान हैं, बल्कि यह है कि सामान्य नागरिक उन संस्थाओं के सामने स्वयं को कितना सुरक्षित, सम्मानित और अधिकार-संपन्न महसूस करता है।
70 हजार से अधिक शिकायतें इसलिए केवल एक आंकड़ा नहीं हैं। वे एक चेतावनी हैं।
एक ऐसी चेतावनी, जो पूछती है कि विकास की गति के साथ क्या शासन की नैतिकता भी आगे बढ़ रही है? क्या तकनीकी परिवर्तन के साथ संस्थागत जवाबदेही मजबूत हो रही है? और क्या नागरिक को वास्तव में यह भरोसा है कि उसका काम बिना सिफारिश, बिना प्रभाव और बिना रिश्वत के भी हो सकता है?
इन प्रश्नों से बचना आसान हो सकता है, लेकिन उनका सामना किए बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध किसी भी अभियान को पूर्ण सफलता नहीं मिल सकती।
क्योंकि अंततः भ्रष्टाचार सिर्फ धन का अपहरण नहीं करता।
वह अवसरों की समानता को छीनता है, संस्थाओं की साख को कमजोर करता है और नागरिक के विश्वास को धीरे-धीरे क्षीण करता है।
और जब नागरिक का भरोसा ही व्यवस्था से उठने लगे, तब संकट भ्रष्टाचार का नहीं रहता – संकट लोकतंत्र की आत्मा का हो जाता है।
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