Vasai-Virar : मणिपुर की हिंसा को शुरू हुए तीन साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन शांति अब भी दूर दिखाई देती है। मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुआ संघर्ष अब सिर्फ दो समुदायों के बीच टकराव की कहानी नहीं रह गया है। हाल के घटनाक्रमों ने कुकी और नागा समुदायों के बीच बढ़ती खाई को भी सामने ला दिया है। यही इस संकट का सबसे भयावह पहलू है—हर हिंसा के बाद बदले की कार्रवाई और हर बदले के बाद एक नई दरार।

हाल में कुकी-बहुल कांगपोकपी जिले में चार नागा नागरिकों की हत्या ने तनाव को और बढ़ा दिया। इस घटना को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए और इलाके में पहले से मौजूद अविश्वास और गहरा गया। इससे पहले मई में तीन कुकी-थाडौ चर्च नेताओं की हत्या हुई थी। इसके बाद दोनों पक्षों से अपहरण और बंधक बनाए जाने की घटनाएं सामने आईं। जून में छह नागा पुरुषों के शव बरामद होने के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए।

इन घटनाओं को अलग-अलग अपराधों की सूची की तरह देखना आसान है, लेकिन इनके पीछे एक ज्यादा गंभीर तस्वीर छिपी है। मणिपुर में हिंसा अब एक ऐसे चक्र में बदलती जा रही है जिसमें एक समुदाय के खिलाफ हमला दूसरे समुदाय में असुरक्षा और प्रतिशोध की भावना पैदा करता है। फिर जवाबी कार्रवाई अगले हमले का कारण बनती है। धीरे-धीरे कानून और न्याय की जगह सामुदायिक पहचान लेने लगती है।

यही वह स्थिति है जहां किसी व्यक्ति का अपराध पूरे समुदाय के खिलाफ गुस्से में बदल जाता है।

सड़कें भी बन गई हैं अविश्वास की सीमा

मणिपुर का संकट केवल गांवों और पहाड़ियों तक सीमित नहीं है। राज्य की सड़कें और राजमार्ग भी अब सामुदायिक तनाव की अभिव्यक्ति बन चुके हैं।

मैतेई, कुकी और नागा समूहों द्वारा लगाए गए अवरोध और नाकेबंदी सामान्य जनजीवन को प्रभावित करते हैं। जरूरी सामान की आपूर्ति बाधित होती है, ईंधन और खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं और कई इलाकों में अस्पतालों तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच मुश्किल हो जाती है।

कांगपोकपी की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है। यह क्षेत्र नागा-बहुल सेनापति जिले और मैतेई-बहुल घाटी क्षेत्रों के बीच स्थित है। इसलिए यहां सड़क पर होने वाला कोई भी अवरोध केवल यातायात रोकने की घटना नहीं है; वह समुदायों के बीच संपर्क और भरोसे को भी प्रभावित करता है।

जब किसी नागरिक को दूसरे समुदाय के इलाके से गुजरने में डर लगे, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह जाता। यह बताता है कि राज्य के भीतर सामाजिक संपर्क की सामान्य व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।

राहत शिविरों में लंबा इंतजार

इस संघर्ष की सबसे दर्दनाक तस्वीर उन राहत शिविरों में दिखाई देती है जहां हजारों लोग वर्षों से अपने घरों से दूर रह रहे हैं।

आरटीआई से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, मई 2023 के बाद राहत शिविरों और विस्थापितों के लिए बनाए गए अस्थायी आवासों में 700 से अधिक लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा मणिपुर के मानवीय संकट की गंभीरता बताता है।

विस्थापन केवल घर छूट जाने का नाम नहीं है। इसके साथ रोजगार छूटता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, सामाजिक रिश्ते टूटते हैं और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि लंबे समय तक अलग-अलग समुदायों का अलग-अलग इलाकों में रहना सामाजिक दूरी को स्थायी रूप दे सकता है। जो दूरी पहले कुछ किलोमीटर की थी, वह धीरे-धीरे मानसिक दूरी में बदल सकती है।

सरकार बदली, लेकिन संकट नहीं

करीब एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन के बाद फरवरी 2026 में मणिपुर में निर्वाचित सरकार की वापसी से उम्मीद जगी थी। युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में अलग-अलग समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई। मैतेई समुदाय से मुख्यमंत्री और कुकी तथा नागा समुदायों से उपमुख्यमंत्रियों की मौजूदगी को राजनीतिक संतुलन की दिशा में कदम माना गया।

लेकिन मौजूदा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण बात सामने रखते हैं—राजनीतिक प्रतिनिधित्व जरूरी है, लेकिन वह अपने आप सामाजिक भरोसा पैदा नहीं कर सकता।

सरकार में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी तभी प्रभावी होगी जब वह जमीन पर सुरक्षा, संवाद और विश्वास बहाली में दिखाई दे।

किसी समुदाय का प्रतिनिधि सत्ता में मौजूद हो और उसी समय उस समुदाय के लोग अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करें, तो राजनीतिक व्यवस्था की पहुंच की सीमाएं साफ दिखाई देने लगती हैं।

कानून का रास्ता ही एकमात्र रास्ता

हालिया हिंसा के दोषियों की पहचान और गिरफ्तारी तत्काल होनी चाहिए। किसी भी नागरिक की हत्या को उसकी सामुदायिक पहचान के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

कानून का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए—चाहे आरोपी मैतेई हो, कुकी हो या नागा।

लेकिन गिरफ्तारियां इस संकट का अंतिम समाधान नहीं हैं। सरकार को उस वातावरण को बदलना होगा जिसमें हिंसा के बाद बदला लेना न्याय का विकल्प समझा जाने लगता है।

इसके लिए सशस्त्र समूहों की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण, अवैध हथियारों की समस्या से निपटना और नागरिकों के खिलाफ हिंसा करने वालों पर निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। साथ ही संवेदनशील इलाकों में नागरिकों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मणिपुर को संवाद की जरूरत है

भूमि, पहचान, प्रशासनिक अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे जटिल हैं। इनका समाधान किसी एक सरकारी आदेश या एक राजनीतिक बैठक से नहीं निकलेगा।

इसके लिए लगातार चलने वाली राजनीतिक प्रक्रिया चाहिए, जिसमें मैतेई, कुकी और नागा समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हों। लेकिन संवाद केवल राजनीतिक नेताओं के बीच सीमित नहीं रहना चाहिए। नागरिक समाज, महिला संगठन, चर्च और अन्य सामाजिक संस्थाएं, युवा और स्थानीय नेतृत्व भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनें।

सबसे पहले उन मुद्दों पर सहमति बनाई जा सकती है जिन पर तत्काल कार्रवाई संभव है—लोग सुरक्षित तरीके से एक जगह से दूसरी जगह जा सकें, जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनी रहे, व्यापार और स्वास्थ्य सेवाएं बाधित न हों और विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी का रास्ता तैयार हो।

बड़े राजनीतिक सवालों का समाधान समय ले सकता है। लेकिन लोगों को सुरक्षित जीवन देने का इंतजार और लंबा नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा खतरा टूटता भरोसा है

मणिपुर की त्रासदी को सिर्फ आंकड़ों में नहीं समझा जा सकता। यह उन रिश्तों की कहानी भी है जो हिंसा के बीच टूट रहे हैं।

जब एक हत्या पूरे समुदाय के खिलाफ गुस्सा पैदा करे, जब एक अपहरण के बाद जवाबी अपहरण हो, जब एक गांव में आग लगने के बाद दूसरे गांव पर हमले की आशंका पैदा हो—तो संघर्ष केवल जमीन पर नहीं होता। वह लोगों की सोच और उनके सामाजिक रिश्तों में भी जगह बना लेता है।

यही कारण है कि मणिपुर को केवल बंदूकें शांत कराने की नहीं, बदले की मानसिकता तोड़ने की जरूरत है।

हर हिंसा का जवाब हिंसा होगा तो यह चक्र कभी खत्म नहीं होगा। हर हत्या अगली हत्या का कारण बनेगी और हर जवाबी कार्रवाई समुदायों के बीच एक और दीवार खड़ी करेगी।

मणिपुर के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा।

सवाल यह है कि क्या मैतेई, कुकी और नागा समुदाय फिर से एक-दूसरे के साथ सुरक्षित नागरिकों की तरह रह पाएंगे?

क्योंकि मणिपुर में शांति तब नहीं आएगी जब सिर्फ गोलियां बंद हो जाएंगी।

शांति तब आएगी, जब हर हिंसा के बाद बदला लेने की जगह न्याय होगा और हर बदले के बाद नई दरार पैदा होने के बजाय संवाद का रास्ता खुलेगा।

—–समाप्त—–

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