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वसई-विरार में स्मार्ट मीटर के खिलाफ सर्वपक्षीय हुंकार

वसई-विरार में स्मार्ट मीटर के खिलाफ सर्वपक्षीय आंदोलन और बढ़े बिजली बिलों पर विरोध
स्मार्ट मीटर के खिलाफ वसई-विरार में सर्वपक्षीय आंदोलन; उपभोक्ता मांग रहे हैं मीटर जांच की रिपोर्ट।

वसई : वसई-विरार में स्मार्ट बिजली मीटर का मुद्दा अब महज बिजली बिल और मीटर बदलने की प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुद्दा अब सड़क पर उतर चुका है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्मार्ट मीटर के विरोध में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दल एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं। बहुजन विकास आघाड़ी, कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट, राष्ट्रवादी कांग्रेस, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, कम्युनिस्ट पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का सर्वपक्षीय विरोध इस बात का संकेत है कि उपभोक्ताओं के बीच पैदा हुआ असंतोष अब राजनीतिक सीमाओं से भी बड़ा होता जा रहा है।

7 सितंबर को मुंबई-अहमदाबाद राष्ट्रीय महामार्ग पर शिरसाड फाटा के पास प्रस्तावित ‘महामार्ग रोको’ आंदोलन को गणेशोत्सव और जैन समाज के पर्युषण पर्व को देखते हुए फिलहाल स्थगित किया गया, लेकिन आंदोलन वापस नहीं लिया गया। इसके बजाय वसई पूर्व से महावितरण के मुख्य कार्यालय तक सर्वपक्षीय धडक मोर्चा निकालने का फैसला किया गया। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि स्मार्ट मीटरों को लेकर उनकी मांगों और शिकायतों का समाधान नहीं हुआ, तो आगे राष्ट्रीय महामार्ग पर आंदोलन किया जा सकता है।

इस आंदोलन की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह विरोध अब किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। अलग-अलग दलों और सामाजिक संगठनों के नेताओं का एक मंच पर आना बताता है कि स्मार्ट मीटर का सवाल स्थानीय राजनीति से निकलकर उपभोक्ता अधिकार और बिजली व्यवस्था की जवाबदेही का मुद्दा बन चुका है।

कांग्रेस की ओर से वसई-विरार महानगरपालिका में स्मार्ट मीटर के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने और विभिन्न दलों की समिति गठित करने की मांग भी सामने आई है। यानी विरोध अब केवल महावितरण कार्यालय के बाहर प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे स्थानीय प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी उठाया जा रहा है।

आखिर इस गुस्से की वजह क्या है?

नागरिकों की सबसे बड़ी शिकायत बढ़े हुए बिजली बिलों को लेकर है। कई उपभोक्ताओं का आरोप है कि स्मार्ट मीटर लगाए जाने के बाद उनके बिलों में अचानक और कई मामलों में कथित तौर पर दोगुनी वृद्धि हुई। स्थानीय स्तर पर स्मार्ट मीटर के खिलाफ चल रहे विरोध और धरने के दौरान 700 से अधिक उपभोक्ताओं की अतिरिक्त बिलिंग संबंधी शिकायतें सामने आने का दावा किया गया है। यह संख्या किसी स्वतंत्र सरकारी ऑडिट से प्रमाणित नहीं है, लेकिन यदि इतने बड़े पैमाने पर शिकायतें सामने आने का दावा किया जा रहा है, तो प्रशासन के लिए इसे गंभीरता से जांचना जरूरी है।

और यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महावितरण के अपने समाधान शिविर में भी बढ़े हुए बिजली बिलों से संबंधित बड़ी संख्या में शिकायतें सामने आईं। नालासोपारा, आचोले और विरार में आयोजित समाधान शिविर में 770 नागरिक पहुंचे और इनमें से 440 शिकायतें बढ़े हुए बिजली बिलों से संबंधित थीं। महावितरण के अनुसार 412 शिकायतों का तत्काल निपटारा किया गया और उपभोक्ताओं के अनुरोध पर 358 समानांतर मीटर लगाए गए।

यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।

अगर स्मार्ट मीटरों की रीडिंग पर सवाल उठाने की कोई वजह नहीं है, तो फिर सैकड़ों उपभोक्ताओं के यहां समानांतर मीटर लगाने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर समानांतर मीटर लगाकर खपत की तुलना की जा रही है, तो उस तुलना के परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? कितने मामलों में स्मार्ट मीटर और समानांतर मीटर की रीडिंग में अंतर पाया गया? कितने मीटर सही निकले? कितने मामलों में बिल कम या संशोधित किया गया? और कितने मामलों में शिकायतकर्ता की आशंका गलत साबित हुई?

इन सवालों के जवाब ही इस विवाद की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।

दूसरी ओर महावितरण का दावा है कि स्मार्ट मीटर व्यवस्था से उपभोक्ताओं को फायदा हुआ है। कंपनी के अनुसार वसई-विरार के करीब पांच लाख उपभोक्ताओं ने पिछले डेढ़ साल में लगभग 11.37 करोड़ रुपये की बचत की है। महावितरण का कहना है कि बिजली की खपत पर निगरानी, डिजिटल भुगतान, ‘गो ग्रीन’ योजना और सुबह 9 से शाम 5 बजे के बीच बिजली इस्तेमाल पर मिलने वाली छूट जैसे कारणों से उपभोक्ताओं को आर्थिक लाभ हुआ है। कंपनी ने यह भी कहा है कि वर्तमान व्यवस्था में स्मार्ट मीटर पोस्टपेड हैं।

लेकिन समस्या यहीं है।

एक तरफ महावितरण बचत के आंकड़े पेश कर रहा है और दूसरी तरफ नागरिक बढ़े हुए बिलों की शिकायत लेकर आंदोलन कर रहे हैं। एक तरफ कंपनी स्मार्ट मीटर को पारदर्शिता और सुविधा का माध्यम बता रही है, दूसरी तरफ उसी व्यवस्था को लेकर सर्वपक्षीय आंदोलन खड़ा हो गया है।

इन दोनों दावों के बीच वास्तविक सच क्या है?

इसका फैसला न तो महावितरण के प्रेस नोट से होना चाहिए और न ही केवल आंदोलनकारियों के आरोपों से। इसका फैसला स्वतंत्र, तकनीकी और पारदर्शी जांच से होना चाहिए।

यहीं स्मार्ट मीटर की ‘प्रामाणिकता’ का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत में स्मार्ट मीटरों के तकनीकी परीक्षण के लिए सरकारी और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की व्यवस्था मौजूद है। महावितरण के पास NABL मान्यता प्राप्त मीटर परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। CPRI जैसी संस्थाओं के पास स्मार्ट मीटरों की सटीकता और निर्धारित तकनीकी मानकों की जांच की सुविधाएं हैं। मुंबई स्थित STQC प्रयोगशाला में भी स्मार्ट मीटरों के निर्धारित मानकों के तहत परीक्षण की सुविधा उपलब्ध है।

महावितरण की तकनीकी शर्तों में स्मार्ट मीटरों के लिए NABL मान्यता प्राप्त तीसरे पक्ष की प्रयोगशालाओं से टाइप टेस्ट रिपोर्ट की आवश्यकता का प्रावधान भी है। लेकिन यहां एक बेहद महत्वपूर्ण अंतर है।

किसी स्मार्ट मीटर मॉडल का टाइप टेस्ट पास होना और महाराष्ट्र में लगाए गए हर मीटर की वास्तविक फील्ड परफॉर्मेंस साबित होना—दो अलग बातें हैं। टाइप टेस्ट यह बताता है कि संबंधित मॉडल ने निर्धारित परिस्थितियों में तकनीकी मानकों को पूरा किया। लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि महाराष्ट्र में लगाए गए प्रत्येक मीटर की वास्तविक फील्ड स्थिति में व्यक्तिगत रूप से जांच हुई है और सभी मीटर सही पाए गए हैं।

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।

करोड़ों मीटर लगाए जा रहे हैं, हजारों करोड़ रुपये की परियोजना चल रही है लेकिन इन मीटरों की वास्तविक फील्ड परफॉर्मेंस का सार्वजनिक डेटा कहां है?

अगर सरकार के पास जांच की प्रयोगशालाएं हैं, अगर महावितरण के पास तकनीकी मानक हैं, अगर समानांतर और चेक मीटर की व्यवस्था है और अगर उपभोक्ता शिकायतों के समाधान के लिए नियामकीय तंत्र मौजूद है, तो फिर इन सभी प्रक्रियाओं के परिणाम जनता के सामने रखने में क्या परेशानी है?

कितने मीटरों की स्वतंत्र जांच हुई? कितने मीटर जांच में असफल हुए? कितने बदले गए? कितने मामलों में स्मार्ट मीटर और चेक मीटर की रीडिंग में अंतर मिला? कितने उपभोक्ताओं के बिल संशोधित हुए? कितने मामलों में अतिरिक्त राशि वापस की गई?

इन सवालों के जवाब सिर्फ वसई-विरार के नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के बिजली उपभोक्ताओं के लिए जरूरी हैं।

यहां कानून और नियामकीय व्यवस्था भी उपभोक्ता को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार देती है। Electricity Act में सही मीटर के माध्यम से बिजली आपूर्ति की आवश्यकता स्पष्ट है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के नियम मीटरों की जांच और परीक्षण की जिम्मेदारी तय करते हैं। महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग की व्यवस्था में भी यदि उपभोक्ता को लगता है कि मीटर की रीडिंग उसकी वास्तविक खपत से मेल नहीं खा रही है, तो मीटर की जांच और जरूरत पड़ने पर NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में परीक्षण की प्रक्रिया उपलब्ध है।

मीटर बदलने के मामले में भी पूरी बहस को केवल ‘सहमति ली गई या नहीं’ तक सीमित करना उचित नहीं होगा। महाराष्ट्र के नियामकीय प्रावधानों में मीटर बदलने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कम-से-कम दो दिन की पूर्व सूचना और पुराने तथा नए मीटर की रीडिंग का रिकॉर्ड रखने जैसी आवश्यकताएं हैं। इसलिए असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या उपभोक्ता को नियमानुसार सूचना दी गई? क्या पुराने मीटर की अंतिम रीडिंग दर्ज की गई? क्या नए मीटर की शुरुआती रीडिंग का रिकॉर्ड दिया गया? और क्या पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से हुई?

यानी बहस को भावनाओं से निकालकर दस्तावेज और डेटा तक ले जाना होगा।

अगर किसी उपभोक्ता को लगता है कि उसका मीटर उसकी वास्तविक खपत के अनुरूप रीडिंग नहीं दे रहा है, तो उसके लिए मीटर टेस्टिंग और नियामकीय शिकायत की व्यवस्था मौजूद है। जरूरत पड़ने पर NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच का रास्ता उपलब्ध है। ऐसे मामलों में सिर्फ यह कह देना कि ‘मीटर सही है’ पर्याप्त जवाब नहीं होना चाहिए। उपभोक्ता को यह दिखाना भी जरूरी है कि मीटर सही कैसे साबित हुआ।

यही वह बिंदु है जहां वसई-विरार का सर्वपक्षीय आंदोलन पूरे महाराष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।

आज वसई-विरार में सवाल स्मार्ट मीटर के खिलाफ उठ रहा है, लेकिन कल यही सवाल महाराष्ट्र के दूसरे शहरों और जिलों में भी उठ सकता है। राज्य में बड़े पैमाने पर स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। ऐसे में यदि सरकार वास्तव में इस परियोजना को सफल बनाना चाहती है, तो उसे विरोध को केवल राजनीतिक आंदोलन मानकर खारिज करने के बजाय उसमें उठाए जा रहे तकनीकी और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े सवालों का जवाब देना होगा।

क्योंकि आंदोलन को रोका जा सकता है, लेकिन सवाल को नहीं।

सरकार यह कह सकती है कि स्मार्ट मीटर आधुनिक तकनीक है। महावितरण कह सकता है कि उपभोक्ताओं को इससे बचत हुई है। विशेषज्ञ कह सकते हैं कि तकनीक निर्धारित मानकों के अनुरूप है। लेकिन आम उपभोक्ता का सवाल इससे कहीं सीधा है – मेरे घर में लगा मीटर सही है या नहीं?

और इस सवाल का जवाब किसी बयान से नहीं, जांच रिपोर्ट से मिलना चाहिए।

इसलिए अब समय आ गया है कि वसई-विरार में लगाए गए स्मार्ट मीटरों का स्वतंत्र रैंडम सैंपल लेकर NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में परीक्षण कराया जाए। समानांतर मीटरों से की गई तुलना के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। बढ़े हुए बिलों की शिकायतों का स्वतंत्र ऑडिट हो। कितने बिल संशोधित किए गए और कितने उपभोक्ताओं को राहत मिली, इसकी जानकारी सार्वजनिक हो। मीटर बदलने की प्रक्रिया में पूर्व सूचना और रीडिंग रिकॉर्ड के पालन की भी जांच हो।

और सबसे महत्वपूर्ण – पूरे महाराष्ट्र के स्मार्ट मीटर रोलआउट का एक सार्वजनिक ‘फील्ड परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड’ जारी किया जाए।

क्योंकि जनता को यह बताना पर्याप्त नहीं है कि स्मार्ट मीटर तकनीकी रूप से प्रमाणित है। जनता यह जानना चाहती है कि उसके घर में लगा हुआ मीटर व्यवहार में कितना सही है।

वसई-विरार का सर्वपक्षीय आंदोलन इसलिए केवल एक राजनीतिक आंदोलन मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसे उस भरोसे के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए जो किसी भी सार्वजनिक सेवा के लिए गंभीर चेतावनी है। जब अलग-अलग राजनीतिक दल और आम उपभोक्ता एक ही सवाल उठा रहे हों, तो उस सवाल का जवाब भी उतनी ही गंभीरता से दिया जाना चाहिए।

स्मार्ट मीटर का विरोध करने वालों से भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या वे तकनीक के खिलाफ हैं या उसके क्रियान्वयन और पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सरकार और महावितरण से सवाल इससे बड़ा है—अगर तकनीक इतनी भरोसेमंद है, तो स्वतंत्र जांच और उसके परिणाम सार्वजनिक करने में हिचक क्यों?

मीटर सही है तो रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए।

यही सबसे आसान रास्ता है।

रिपोर्ट सही निकली तो महावितरण के दावे मजबूत होंगे, उपभोक्ताओं का भ्रम दूर होगा और स्मार्ट मीटरों के पक्ष में भरोसा बढ़ेगा। और अगर कहीं गड़बड़ी मिलती है, तो समय रहते सुधार किया जा सकेगा।

लेकिन अगर सार्वजनिक जांच के बजाय केवल दावे और आरोप चलते रहे, तो अविश्वास भी बढ़ेगा और आंदोलन भी।

आज वसई-विरार की सड़कों से उठ रही आवाज सिर्फ एक मीटर के खिलाफ आवाज नहीं है। यह उस सवाल की आवाज है कि तकनीक जनता के लिए है तो जनता को उसके परिणाम जानने का अधिकार भी होना चाहिए।

स्मार्ट मीटर अगर वास्तव में जनता के हित में हैं, तो जनता को उनके खिलाफ खड़ा करने वाली सबसे बड़ी गलती तकनीक नहीं, बल्कि पारदर्शिता की कमी होगी।

इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार और महावितरण सिर्फ स्मार्ट मीटर लगाने की रफ्तार न बताएं, बल्कि उसकी सटीकता, शिकायतें, जांच, चेक मीटर के परिणाम और बिल सुधार का पूरा हिसाब भी जनता के सामने रखें।

क्योंकि मीटर स्मार्ट होना अच्छी बात है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है:

व्यवस्था स्मार्ट हो, जांच पारदर्शी हो और जनता का भरोसा कायम हो।

और वसई-विरार आज यही सवाल पूछ रहा है – स्मार्ट मीटर सही है तो इसकी प्रमाणिकता की रिपोर्ट कहाँ है?

—–समाप्त—–

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