Vasai-Virar : महंगाई की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकार के आंकड़ों में यह प्रतिशत में दिखाई देती है, लेकिन आम आदमी की जिंदगी में यह घटती हुई बचत, छोटी होती खरीदारी और बढ़ते घरेलू खर्च के रूप में महसूस होती है। बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो उसका सीधा असर घर के बजट पर पड़ता है। आमदनी सीमित हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए, तो आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे उस परिवार के लिए उतने मायने नहीं रखते, जो महीने का हिसाब जोड़ते-जोड़ते परेशान है।

सितंबर की शुरुआत में कमर्शियल रसोई गैस सिलेंडर के दाम में ₹9.50 की बढ़ोतरी हुई। एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF 5.46 फीसदी महंगा हुआ। मुंबई में CNG के दाम ₹2 प्रति किलो और PNG ₹1 प्रति यूनिट बढ़ गए। दूध की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी आम परिवार के खर्च में एक और बोझ जोड़ दिया। अलग-अलग देखें तो शायद इनमें से कोई एक बढ़ोतरी बहुत बड़ी न दिखाई दे, लेकिन महंगाई का असर कभी किसी एक वस्तु की कीमत से नहीं समझा जाता। असली दबाव तब सामने आता है जब रोजमर्रा की कई जरूरतें एक साथ महंगी होती हैं।

इसी तस्वीर में चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी को भी देखा जाना चाहिए। चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे सिर्फ बाजार की मांग नहीं है। इसके पीछे गन्ने की उपलब्धता, मौसम, फसल की बीमारियां, चीनी मिलों की उत्पादन लागत, घरेलू मांग, बाजार में उपलब्ध स्टॉक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों जैसे कई कारण काम करते हैं।

हालिया स्थिति में घरेलू चीनी उत्पादन उम्मीद से कम रहने का दबाव महत्वपूर्ण है। कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश, जलभराव और फसल में बीमारियों ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जब गन्ने की उपलब्धता घटती है तो चीनी उत्पादन पर असर पड़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, त्योहारों का मौसम शुरू होते ही मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। ऐसे समय में अगर उत्पादन और उपलब्धता पर दबाव हो, तो कीमतों में तेजी आ सकती है।

इसके साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति भी जुड़ जाती है। दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी परिस्थितियों का असर वैश्विक कीमतों पर पड़ता है और वैश्विक बाजार की हलचल भारतीय बाजार को भी प्रभावित कर सकती है। बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता और कुछ जगहों पर जमाखोरी या सट्टेबाजी की आशंका भी कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना सकती है। यही वजह है कि सरकार ने स्टॉक लिमिट और निगरानी जैसे कदमों का सहारा लिया है।

चीनी की कीमतों पर चर्चा करते समय एथेनॉल का मुद्दा भी अक्सर उठाया जाता है। लेकिन मौजूदा तेजी को सिर्फ एथेनॉल उत्पादन के कारण बताना पूरी तस्वीर नहीं होगी। हाल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा पहले की तुलना में कम हुआ है और एथेनॉल उत्पादन में मक्का जैसे अनाज की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। इसलिए वर्तमान स्थिति को समझने के लिए कम उत्पादन, फसल को नुकसान, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार और बाजार में उपलब्ध स्टॉक – इन सभी पहलुओं को साथ देखना होगा।

लेकिन चीनी की कीमत बढ़ने का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि घर में चाय थोड़ी महंगी पड़ जाएगी। असली असर इससे कहीं बड़ा है। चीनी खाद्य उद्योग की एक महत्वपूर्ण कच्ची सामग्री है। मिठाई की दुकानों से लेकर बेकरी, बिस्कुट, आइसक्रीम, पेय पदार्थ और कई पैकेज्ड फूड उत्पादों तक इसकी लागत जुड़ी हुई है। इसलिए चीनी महंगी होने पर उपभोक्ता को उसका असर हमेशा चीनी के पैकेट पर दिखाई नहीं देता। कई बार वही बढ़ी हुई लागत किसी मिठाई, बिस्कुट या दूसरे खाद्य उत्पाद की कीमत में शामिल होकर सामने आती है।

यानी महंगाई एक दुकान पर रुकती नहीं है। वह पूरी सप्लाई चेन में आगे बढ़ती है।

कमर्शियल गैस महंगी होती है तो होटल और रेस्टोरेंट की लागत बढ़ सकती है। CNG महंगी होती है तो परिवहन महंगा हो सकता है। परिवहन महंगा होता है तो माल ढुलाई की लागत प्रभावित हो सकती है। और अंततः बढ़ी हुई लागत किसी न किसी रूप में उपभोक्ता तक पहुंचती है। मुंबई में CNG की कीमत बढ़ने के बाद ऑटो और टैक्सी का न्यूनतम किराया बढ़ना इसी श्रृंखला का एक उदाहरण है।

यही वह बिंदु है जहां महंगाई का सवाल सिर्फ बाजार का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि आर्थिक नीति और शासन का सवाल बन जाता है।

सरकार आर्थिक विकास की तेज रफ्तार के आंकड़े सामने रखती है। GDP बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाए हुए है। ये निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन एक आम परिवार के लिए सवाल कुछ और है – क्या उसकी आमदनी और क्रयशक्ति भी उसी गति से बढ़ रही है?

क्योंकि GDP का बढ़ना और घरेलू बजट का मजबूत होना एक ही बात नहीं है।

अगर किसी परिवार की आय बढ़ती है, लेकिन उसी दौरान भोजन, ऊर्जा, परिवहन, शिक्षा और दूसरी आवश्यकताओं पर होने वाला खर्च उससे तेज गति से बढ़ जाता है, तो उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति पर दबाव आ सकता है। बचत कम हो सकती है, गैर-जरूरी खर्च पहले कट सकते हैं और धीरे-धीरे जरूरी जरूरतों पर भी समझौता करना पड़ सकता है।

यही वजह है कि आर्थिक विकास की असली परीक्षा सिर्फ GDP के आंकड़ों में नहीं होती। उसकी परीक्षा उस घर में होती है जहां महीने की शुरुआत में राशन की पूरी सूची बनाई जाती है और महीने के अंत में उसी सूची से कुछ चीजें हटानी पड़ती हैं।

और यहीं से महंगाई का सवाल राजनीति से भी जुड़ जाता है।

आज सत्ता में बैठे कई नेता कभी विपक्ष में रहते हुए महंगाई को लेकर तत्कालीन सरकारों पर तीखे हमले करते थे। पेट्रोल-डीजल, गैस और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों को सरकार की नाकामी बताया जाता था। जनता से उम्मीदें जगाई जाती थीं कि सत्ता बदलने के बाद महंगाई से राहत मिलेगी।

लेकिन सत्ता में आने के बाद तस्वीर अक्सर बदल जाती है।

विपक्ष में महंगाई सरकार की नाकामी होती है और सत्ता में आने के बाद वही महंगाई अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, वैश्विक बाजार, कच्चे माल, मौसम और आपूर्ति की मजबूरियों का परिणाम बन जाती है।

बेशक, सरकार हर वस्तु की कीमत सीधे नियंत्रित नहीं कर सकती। गन्ने की फसल पर मौसम के असर को सरकार रोक नहीं सकती और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर हलचल को नियंत्रित करना संभव है। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ कीमत बढ़ने के बाद उसके कारण गिनाने तक सीमित नहीं हो सकती।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे, जमाखोरी पर प्रभावी कार्रवाई हो, बाजार में अनावश्यक सट्टेबाजी को रोका जाए और उपभोक्ताओं को अत्यधिक कीमत वृद्धि से राहत मिले। साथ ही किसानों और उत्पादकों के हितों का भी ध्यान रखना जरूरी है। चीनी के मामले में भी यही संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है—किसान को गन्ने का उचित मूल्य मिले, मिलें आर्थिक रूप से टिकाऊ रहें और उपभोक्ता को जरूरत की चीनी अत्यधिक महंगी न खरीदनी पड़े।

इसलिए महंगाई का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कीमतें क्यों बढ़ीं। बड़ा सवाल यह है कि उस बढ़ी हुई कीमत का बोझ कौन उठा रहा है?

किसान अपनी लागत से जूझता है। मिल उत्पादन लागत से। व्यापारी बाजार की अनिश्चितता से। और अंत में उपभोक्ता बढ़ी हुई कीमत से। आम आदमी यह नहीं कहता कि दुनिया में महंगाई बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। वह सिर्फ यह चाहता है कि उसकी आय और खर्च के बीच की दूरी लगातार न बढ़े। उसे यह चिंता न करनी पड़े कि महीने के आखिरी सप्ताह में दूध, राशन, गैस या आने-जाने के लिए पैसे बचेंगे या नहीं।

उसे हर सुबह GDP की नई दर सुनने से ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि किराने की दुकान पर उसकी सूची कितनी लंबी रह सकती है। यही वह अंतर है जिसे आर्थिक विकास के आंकड़ों से आगे जाकर समझने की जरूरत है।

देश की अर्थव्यवस्था का बढ़ना जरूरी है। लेकिन उस बढ़ती अर्थव्यवस्था में आम आदमी की आय, क्रयशक्ति, बचत और जीवन की गुणवत्ता भी बढ़नी चाहिए। विकास का लाभ अगर आंकड़ों में दिखाई दे लेकिन परिवार के बजट में महसूस न हो, तो उस विकास की चमक अधूरी रह जाती है।

सरकार विकास के आंकड़े गिन रही है। जनता अपने खर्च के आंकड़े। सरकार कहती है—अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।

जनता पूछती है – फिर घर का बजट कमजोर क्यों हो रहा है?

यही वह सवाल है जिसका जवाब सिर्फ GDP के आंकड़े नहीं दे सकते। क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था की असली सफलता तब मानी जाएगी, जब उसकी वृद्धि का असर उस नागरिक की जिंदगी में दिखाई दे जो हर महीने अपनी आय और खर्च के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। आखिर जनता को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बने। वह यह भी चाहती है कि उस बड़ी अर्थव्यवस्था में उसका छोटा-सा घर थोड़ा बेहतर चले।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश कितना आगे बढ़ा।

सवाल यह भी है कि उसके साथ आम आदमी कितना आगे बढ़ा।

और जब तक इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक आम आदमी की आवाज यही पूछती रहेगी—

“देश की अर्थव्यवस्था तो उड़ान भर रही है… आम आदमी की जेब कब उड़ान भरेगी?”

—–समाप्त—–

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