Vasai-Virar : सरकारी योजनाओं की सफलता का सबसे सही पैमाना उनके विज्ञापन नहीं, बल्कि उन योजनाओं से मिलने वाला वास्तविक लाभ है। ग्रामीण रोजगार के मामले में यह पैमाना और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां किसी आंकड़े के पीछे एक परिवार की रसोई, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतें जुड़ी होती हैं।
इसीलिए VB-G RAM G को लेकर सामने आए शुरुआती आंकड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
केंद्र सरकार ने MGNREGA की जगह VB-G RAM G को ग्रामीण भारत के लिए नई और बेहतर रोजगार व्यवस्था के रूप में पेश किया है। दावा है कि अब ग्रामीण परिवारों को 100 के बजाय 125 दिन के रोजगार की गारंटी मिलेगी। अधिक बजट, बेहतर मजदूरी और डिजिटल तकनीक के जरिए पारदर्शिता -न ई व्यवस्था की तस्वीर सुनने में निश्चित रूप से आकर्षक लगती है।
लेकिन असली सवाल यही है – जब गारंटी 100 से बढ़कर 125 दिन हुई है, तो वास्तविक रोजगार घट क्यों रहा है?
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में ग्रामीण रोजगार के person-days पिछले साल के इसी महीने की तुलना में करीब 50 फीसदी कम रहे। इससे पहले जनवरी से जून 2026 के बीच भी person-days करीब 33.54 करोड़ से घटकर 21.52 करोड़ रह गए। यानी करीब 35.8 फीसदी की गिरावट।
सरकारी रिपोर्ट में यह सिर्फ ‘person-days’ हैं। लेकिन गांव के मजदूर के लिए इसका सीधा अर्थ है – काम के कम दिन और हाथ में कम पैसा।
यहीं 125 दिन की गारंटी का दावा अपनी सबसे कठिन परीक्षा में आता है।
कानून में रोजगार के 25 दिन बढ़ा देना एक बात है और उन दिनों में वास्तव में काम उपलब्ध कराना दूसरी। अगर पुराने 100 दिन भी पर्याप्त रूप से नहीं मिल पा रहे हैं और person-days लगातार घट रहे हैं, तो 125 दिन का आंकड़ा गरीब मजदूर के लिए कितना मायने रखता है?
MGNREGA की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने ग्रामीण गरीब के लिए रोजगार को सरकारी कृपा के बजाय अधिकार का रूप दिया। योजना में भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और प्रशासनिक कमियां थीं लेकिन उसका मूल विचार स्पष्ट था: गरीब काम मांग सकता है और सरकार पर उसे रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है।
इसलिए अगर MGNREGA में खामियां थीं, तो सवाल यह होना चाहिए था कि उन्हें कैसे दूर किया जाए। सवाल यह नहीं कि रोजगार के अधिकार की संरचना को ही कितना बदला जाए।
VB-G RAM G के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह पुराने अधिकार को कमजोर किए बिना नई व्यवस्था की कमियों को दूर करे।
बड़ा बजट, लेकिन कितना वास्तविक रोजगार?
सरकार ने VB-G RAM G के लिए 95 हजार करोड़ रुपये के केंद्रीय आवंटन को बड़ा कदम बताया है। राज्यों की 40 फीसदी हिस्सेदारी जोड़ने पर कुल राशि करीब 1.55 लाख करोड़ रुपये बताई जाती है।
लेकिन गरीब मजदूर के लिए बजट का आंकड़ा अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता।
उसे यह जानना है कि उसके गांव में काम कब मिलेगा, कितने दिन मिलेगा और मजदूरी कब मिलेगी।
यहीं राज्यों की 40 फीसदी हिस्सेदारी भी बहस का विषय बनती है। देश के सभी राज्यों की आर्थिक क्षमता समान नहीं है। अगर रोजगार की उपलब्धता राज्य की वित्तीय क्षमता पर अधिक निर्भर होने लगे, तो गरीब के रोजगार के अधिकार में भी क्षेत्रीय असमानता पैदा हो सकती है।
सरकार इसे सहकारी संघवाद कह सकती है। लेकिन मजदूर के लिए सवाल बहुत सरल है – केंद्र कितना देगा और राज्य कितना देगा, इससे ज्यादा जरूरी है कि उसे काम कितना मिलेगा।
मजदूरी बढ़ी, लेकिन क्या जिंदगी भी बेहतर हुई?
लगभग 300 रुपये प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी को सुधार के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन सतपथी समिति ने जून 2018 की कीमतों पर ही 375 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी की सिफारिश की थी।
आज जब महंगाई ने भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे बुनियादी खर्च बढ़ा दिए हैं, तब केवल nominal मजदूरी को बढ़ा हुआ बताना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि मजदूरी बढ़ना और वास्तविक क्रय शक्ति बढ़ना एक ही बात नहीं है।
अगर मजदूरी बढ़ती है, लेकिन महंगाई उससे तेज बढ़ती है, तो कागज पर बढ़ी रकम गरीब परिवार की जिंदगी में वास्तविक सुधार नहीं ला पाती।
तकनीक पारदर्शिता बने, बाधा नहीं
VB-G RAM G की एक बड़ी विशेषता डिजिटल निगरानी व्यवस्था बताई जा रही है। E-KYC, NMMS, जियो-टैगिंग, जियो-फेंसिंग और फोटो आधारित हाजिरी भ्रष्टाचार रोकने में उपयोगी हो सकती हैं।
लेकिन तकनीक का मूल्यांकन उसके आधुनिक होने से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमजोर व्यक्ति के लिए उपयोगी होने से होना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्र में खराब इंटरनेट, स्मार्टफोन की अनुपलब्धता, तकनीकी गड़बड़ी या फोटो अपलोड की समस्या किसी अधिकारी के लिए सिर्फ तकनीकी समस्या हो सकती है। मजदूर के लिए वही समस्या एक दिन की मजदूरी का नुकसान बन सकती है।
तकनीक तब तक अधिकार की सहयोगी है, जब तक वह अधिकार तक पहुंच आसान बनाती है। जिस दिन तकनीकी शर्तें ही रोजगार पाने की बाधा बनने लगें, उसी दिन पारदर्शिता और बहिष्कार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
सबसे बड़ा सवाल: सुधार किसके लिए?
यह पूरी बहस केवल MGNREGA बनाम VB-G RAM G की राजनीतिक बहस नहीं होनी चाहिए।
अगर MGNREGA में भ्रष्टाचार था – उसे खत्म किया जाना चाहिए था।
अगर भुगतान में देरी थी – भुगतान व्यवस्था सुधारी जानी चाहिए थी।
अगर फर्जी लाभार्थी थे – पहचान प्रणाली मजबूत की जानी चाहिए थी।
अगर तकनीक की जरूरत थी – ऐसी तकनीक लाई जानी चाहिए थी जो मजदूर की मदद करे।
लेकिन अगर नई व्यवस्था में रोजगार के वास्तविक दिन घट जाएं, राज्यों पर वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ जाए और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण गरीब की पहुंच कठिन हो जाए, तो यह पूछना जरूरी है कि सुधार का लाभ आखिर किसे मिल रहा है।
ग्रामीण भारत में विकास की परिभाषा अभी बहुत सरल है।
जिसके पास जमीन नहीं है, उसके लिए विकास का अर्थ रोजगार है।
जिसके पास बचत नहीं है, उसके लिए समय पर मजदूरी है।
और जिसके परिवार का खर्च रोज की कमाई से चलता है, उसके लिए रोजगार का हर दिन महत्वपूर्ण है।
इसलिए 125 दिन की गारंटी सुनकर उत्साहित होने से पहले यह देखना जरूरी है कि उन 125 दिनों में से कितने दिन वास्तव में मजदूर के हिस्से आए।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि कानून कितने दिन के रोजगार की गारंटी देता है।
असली सवाल यह है कि मजदूर के हाथ में कितने दिन का काम पहुंचता है।
MGNREGA की सबसे बड़ी विरासत यही थी कि गरीब सरकार के सामने खड़ा होकर कह सकता था—“मुझे काम चाहिए।”
VB-G RAM G की सफलता का पैमाना भी यही होना चाहिए कि क्या उसने इस आवाज को और मजबूत किया है।
क्योंकि अंततः विकसित भारत की पहचान किसी सरकारी विज्ञापन, बजट के बड़े आंकड़े या डिजिटल व्यवस्था से नहीं होगी।
उसकी पहचान उस मजदूर से होगी जो शाम को काम करके घर लौटे और उसकी जेब में उस दिन की पूरी मजदूरी हो।
—–समाप्त—–
Food Safety in India : खबरों की खबर – भाग 4 (अंतिम भाग) | आपकी थाली में आखिर क्या है?