वसई विरार: एक विद्यार्थी जब परीक्षा केंद्र में प्रवेश करता है तो उसके हाथ में सिर्फ एडमिट कार्ड नहीं होता। उसके साथ महीनों की तैयारी, परिवार की उम्मीदें और भविष्य के सपने भी उस परीक्षा कक्ष में दाखिल होते हैं। वह इस भरोसे के साथ प्रश्नों का सामना करता है कि परीक्षा की कसौटी सबके लिए एक जैसी है और परिणाम में वही आगे जाएगा, जिसने बेहतर तैयारी और प्रदर्शन किया है।
लेकिन क्या हो, जब इसी भरोसे पर सवाल उठने लगें?
महाराष्ट्र(Maharashtra) में TET और CET जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं को लेकर एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने कुछ ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कथित पेपर लीक से शुरू हुआ उनका सवाल परीक्षा परिणामों के पैटर्न, परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों और टेंडर प्रक्रिया तक पहुंचता है। पवार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए चेतावनी भी दी है कि यदि इन मुद्दों पर सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाया तो राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
रोहित पवार के आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन उन्होंने जिन बिंदुओं को सामने रखा है, वे महाराष्ट्र की परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर एक व्यापक बहस जरूर खड़ी करते हैं।
पेपर लीक की सामान्य तस्वीर हमारे सामने अक्सर एक ही होती है—परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र किसी के हाथ लग गया और फिर वह सोशल मीडिया या किसी दूसरे माध्यम से बाहर पहुंच गया। रोहित पवार इस परिभाषा को अधूरा मानते हैं। उनका कहना है कि परीक्षा में अनुचित लाभ पहुंचाने के कई तरीके हो सकते हैं। पूरा प्रश्नपत्र बाहर आए यह जरूरी नहीं; महत्वपूर्ण प्रश्नों की जानकारी, मार्किंग पैटर्न या परीक्षा से जुड़ी संवेदनशील सूचनाएं यदि पहले ही चुनिंदा लोगों तक पहुंच जाएं, तो परीक्षा की समानता वहीं समाप्त हो जाती है।
पवार का दावा है कि TET और FDA जैसी परीक्षाओं में भी ऐसी आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका सवाल इसलिए सिर्फ ‘पेपर कब लीक हुआ’ तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘परीक्षा की गोपनीय जानकारी तक किसकी पहुंच थी’ तक जाता है।
यहीं से यह मामला और गंभीर हो जाता है।
पवार ने CET के परिणामों में दिखाई देने वाले कथित बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक वर्ष 2023 से पहले CET के शीर्ष 100 विद्यार्थियों में अधिकांश ऐसे होते थे, जिनके 12वीं कक्षा के PCM यानी फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में 80 प्रतिशत से अधिक अंक थे। उनका दावा है कि 2023 के बाद इस पैटर्न में बदलाव दिखाई दिया और ऐसे विद्यार्थी भी बेहद ऊंचे पर्सेंटाइल के साथ सामने आए, जिनके बोर्ड परीक्षा में PCM के अंक अपेक्षाकृत काफी कम थे।
अपने आरोप के समर्थन में रोहित पवार ने एक भाई-बहन का उदाहरण दिया। उनका दावा है कि दोनों ने CET में 99.99 पर्सेंटाइल हासिल की, जबकि 12वीं के PCM में उनके अंक क्रमशः 56.67 प्रतिशत और 51 प्रतिशत थे। पवार ने यह आरोप भी लगाया कि इन विद्यार्थियों के पिता भाजपा के मंडल अध्यक्ष हैं।
इसी उदाहरण को सामने रखकर उन्होंने पूछा है कि बोर्ड परीक्षा में करीब 50 से 55 प्रतिशत के आसपास अंक पाने वाला विद्यार्थी CET में 99.99 पर्सेंटाइल तक कैसे पहुंच सकता है?
यह सवाल सुनने में जितना सीधा लगता है, इसका जवाब उतना सरल नहीं है।
12वीं बोर्ड और CET दो अलग प्रकार की परीक्षाएं हैं। उनका पैटर्न, प्रतिस्पर्धा, तैयारी की रणनीति और मूल्यांकन अलग हो सकता है। इसलिए बोर्ड में कम अंक पाने वाले विद्यार्थी का CET में शानदार प्रदर्शन करना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। किसी छात्र की मेहनत और क्षमता को केवल उसके पुराने अंकों के आधार पर संदिग्ध ठहराना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि किसी वर्ष के बाद शीर्ष परिणामों में बड़े स्तर पर कोई असामान्य बदलाव दिखाई देता है, तो उसका सांख्यिकीय और तकनीकी परीक्षण किया जा सकता है। शायद इसी वजह से रोहित पवार की सबसे महत्वपूर्ण मांग परिणामों के फॉरेंसिक ऑडिट की है।
उन्होंने वर्ष 2023 से अब तक हुए CET परिणामों की विस्तृत जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि विद्यार्थियों के CET परिणामों का उनके पुराने शैक्षणिक रिकॉर्ड से मिलान किया जाए और डेटा के आधार पर यह देखा जाए कि क्या किसी विशेष अवधि, परीक्षा केंद्र, एजेंसी या परिणाम समूह में कोई असामान्य पैटर्न सामने आता है।
यदि परिणामों में कोई गड़बड़ी नहीं है, तो ऐसा ऑडिट परीक्षा प्रणाली के प्रति भरोसा और मजबूत कर सकता है। और यदि कहीं कोई विसंगति है, तो उसे सामने लाने का रास्ता भी यही है।
मगर पवार के सवाल केवल रिजल्ट की अंकतालिका पर नहीं रुकते। वे परीक्षा कराने वाली व्यवस्था के भीतर भी झांकते हैं।
उन्होंने CET सेल की टेंडर प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। पवार का दावा है कि EduSpark को टेंडर मिलने का रास्ता बनाने के लिए टेंडर की शर्तों में तीन बार बदलाव किया गया। उनका यह भी आरोप है कि EduSpark ने परीक्षा संचालन से जुड़ा काम MeritTrac को सौंपा।
पवार ने MeritTrac को लेकर भी सवाल उठाए और दावा किया कि इस कंपनी को जम्मू-कश्मीर सरकार से संबंधित JKSSB और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा कथित अनियमितताओं के कारण पहले ब्लैकलिस्ट किया जा चुका है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित संस्थाओं तथा कंपनियों का पक्ष भी पूरी तस्वीर समझने के लिए उतना ही जरूरी है। लेकिन आरोप यदि परीक्षा कराने वाली एजेंसी के चयन तक पहुंच रहे हों, तो सरकार और संबंधित परीक्षा प्राधिकरण की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि पूरी प्रक्रिया को दस्तावेजों और तथ्यों के साथ सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए।
क्योंकि परीक्षा में पारदर्शिता केवल प्रश्नपत्र की सुरक्षा से नहीं आती। परीक्षा किस कंपनी ने कराई, उसका चयन कैसे हुआ, डेटा किसके पास था, सर्वर और परीक्षा केंद्रों की निगरानी किसने की और परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया में कितने स्तरों पर जांच हुई – ये सभी उसी पारदर्शिता का हिस्सा हैं।
इस बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली है।
रोहित पवार का दावा है कि परीक्षाओं के ऑनलाइन होने के बाद पेपर लीक और कथित गड़बड़ियों की घटनाएं बढ़ी हैं। उनका कहना है कि ऑफलाइन परीक्षाओं के दौर में इस तरह की समस्याएं इस स्तर पर देखने को नहीं मिलती थीं।
हालांकि समस्या का समाधान केवल ऑनलाइन से वापस ऑफलाइन हो जाना शायद नहीं है। डिजिटल परीक्षा प्रणाली के अपने फायदे हैं—तेजी, बड़े पैमाने पर परीक्षा आयोजित करने की क्षमता, परिणाम तैयार करने में सुविधा और प्रक्रिया को तकनीकी रूप से ट्रैक करने की संभावना। लेकिन जितनी बड़ी भूमिका तकनीक की होती जाती है, उतनी ही मजबूत साइबर सुरक्षा और डिजिटल ऑडिट की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है।
कागज का प्रश्नपत्र ताले में बंद किया जा सकता है, लेकिन डिजिटल प्रश्नपत्र की सुरक्षा पासवर्ड से कहीं आगे की चीज है। सर्वर एक्सेस, डेटा लॉग, परीक्षा केंद्रों की मशीनें, प्रश्नों का वितरण, उम्मीदवारों की डिजिटल गतिविधि और परिणाम तैयार होने तक की पूरी श्रृंखला को सुरक्षित रखना पड़ता है। कहीं एक कमजोर कड़ी पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है।
इसीलिए मौजूदा विवाद को केवल ‘ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन’ की बहस में सीमित करने के बजाय परीक्षा प्रणाली की तकनीकी सुरक्षा और जवाबदेही की कसौटी पर देखना ज्यादा जरूरी है।
रोहित पवार ने इन मुद्दों को लेकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी की है। साथ ही उनका कहना है कि यदि सरकार ने कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच नहीं कराई और उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं की, तो वे महाराष्ट्र में बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे।
राजनीतिक रूप से यह मुद्दा आने वाले दिनों में कितना बड़ा होगा, यह सरकार की प्रतिक्रिया और सामने आने वाले तथ्यों पर निर्भर करेगा। लेकिन इस विवाद में राजनीति से कहीं बड़ा एक पक्ष है—विद्यार्थी का भरोसा।
एक प्रतियोगी परीक्षा में एक-दो अंक का अंतर मामूली दिखाई दे सकता है, लेकिन उसी अंतर से किसी विद्यार्थी का कॉलेज बदल सकता है, उसकी पसंद की शाखा छूट सकती है या वर्षों की तैयारी के बावजूद वह अवसर से वंचित हो सकता है। ऐसी व्यवस्था में निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि वह दिखाई भी देनी चाहिए।
यही कारण है कि परीक्षा प्रणाली पर उठे सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं दिया जा सकता। यदि रोहित पवार के आरोपों में तथ्य हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। यदि आरोप निराधार हैं, तो सरकार और परीक्षा प्राधिकरण के पास भी तथ्यों, तकनीकी रिकॉर्ड और स्वतंत्र ऑडिट के जरिए उन्हें गलत साबित करने का अवसर है।
दोनों परिस्थितियों में रास्ता एक ही है—पारदर्शिता।
महाराष्ट्र की परीक्षा व्यवस्था के सामने आज शायद सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसी एक विद्यार्थी ने 99.99 पर्सेंटाइल कैसे हासिल की। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लाखों विद्यार्थी 99.99 प्रतिशत विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि परीक्षा में सभी के लिए अवसर समान था?
क्योंकि किसी परीक्षा का परिणाम केवल मेरिट लिस्ट नहीं बनाता, वह व्यवस्था के प्रति विश्वास भी बनाता है।
और जब उस विश्वास पर सवाल उठते हैं, तब परीक्षा सिर्फ विद्यार्थियों की नहीं रहती – परीक्षा पूरे सिस्टम की शुरू हो जाती है।
—–समाप्त—–
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