वसई-विरार : जुलाई की बारिश अब बीत चुकी है। उफनती नदियों का पानी अपने दायरे में लौट रहा है, रास्तों पर जमा पानी उतर चुका है और पालघर जिले के उन गांवों में भी जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य होने लगा है, जहां कुछ दिन पहले तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लेकिन पानी उतरने के बाद जिले के कई स्कूलों में जो तस्वीर बची है, वह इस आपदा की कहानी शायद लंबे समय तक सुनाती रहेगी।
किसी स्कूल की छत गायब है। किसी की सुरक्षा दीवार जमीन पर पड़ी है। कहीं कक्षा के फर्श पर सूखता हुआ कीचड़ है तो कहीं पानी में भीग चुकी किताबें और बच्चों के बैग। स्कूल कार्यालयों में रखे वर्षों पुराने दस्तावेज खराब हो गए हैं। कंप्यूटर, प्रोजेक्टर और प्रिंटर जैसे उपकरण पानी की भेंट चढ़ गए। जिन कमरों में कुछ दिन पहले बच्चे ब्लैकबोर्ड के सामने बैठकर पढ़ रहे थे, वहां जुलाई के अंतिम दिनों में बारिश और बाढ़ ने अपना कब्जा जमा लिया।
22 और 23 जुलाई को पालघर (Palghar) जिले में हुई अतिवृष्टि, सोसाटेदार हवाओं और बांधों से छोड़े गए पानी के कारण उत्पन्न बाढ़ की स्थिति ने जिले की शिक्षा व्यवस्था को गंभीर चोट पहुंचाई। जिला परिषद स्कूलों के साथ निजी और अनुदानित विद्यालय, आश्रमशालाएं तथा आंगनवाड़ियां भी इसकी चपेट में आईं। पालघर जिला परिषद के प्राथमिक शिक्षा विभाग और कार्यकारी अभियंताओं के शुरुआती आकलन के अनुसार जिले की केवल 36 जिला परिषद स्कूल इमारतों को करीब 167.50 लाख रुपये यानी 1 करोड़ 67 लाख 50 हजार रुपये का नुकसान हुआ है।
इस नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा दहानू में सामने आया, जहां सात स्कूलों को करीब 52.50 लाख रुपये की क्षति का अनुमान है। तलासरी की छह स्कूलों को 33.50 लाख, पालघर की सात स्कूलों को 27.50 लाख, जव्हार की चार स्कूलों को 21.50 लाख, विक्रमगढ़ की दो स्कूलों को 11 लाख, वसई की तीन स्कूलों को 10 लाख, वाडा की पांच स्कूलों को 6.50 लाख और मोखाडा की दो स्कूलों को करीब पांच लाख रुपये का नुकसान हुआ।
ये आंकड़े सरकारी कागज पर इस आपदा का आकार बताते हैं, लेकिन किसी स्कूल की क्षति को केवल रुपयों में समझना आसान नहीं है। एक छत पांच या दस लाख रुपये में दोबारा बनाई जा सकती है, लेकिन उस छत के नीचे पढ़ने वाले बच्चों की बाधित पढ़ाई की कीमत कैसे तय होगी? पानी में खराब हुआ कंप्यूटर खरीदा जा सकता है, लेकिन स्कूल कई सप्ताह सामान्य रूप से न चल सके तो बच्चों के छूटे हुए शिक्षण समय का हिसाब किस खाते में दर्ज होगा?
बहाडोली स्थित श्री ज्ञानवर्धिनी शिक्षण संस्था द्वारा संचालित नूतन विद्यालय में तेज हवा ने स्कूल भवन के ऊपर लगी पूरी शेड उड़ा दी। सौभाग्य से कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन चार कक्षाएं और मध्यवर्ती कार्यालय बुरी तरह प्रभावित हुए। छत हटने के बाद बारिश सीधे भीतर पहुंची। अलमारियों में रखे दस्तावेज भीग गए। कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, जेरॉक्स मशीन, प्रिंटर, टेबल और अलमारियां खराब हो गईं। विद्यार्थियों के बैग और दूसरी शैक्षणिक सामग्री भी पानी की चपेट में आई। कक्षाओं की हालत ऐसी हो गई कि उनमें बच्चों को बैठाकर पढ़ाना मुश्किल हो गया।
बहाडोली की यह तस्वीर अकेली नहीं है। तलासरी के अच्छाड खंडीपाडा स्कूल की छत गिर गई और करीब पांच लाख रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया। गिरगांव भुजडपाडा और वेवजी डोंगरीपाडा स्कूलों की छतों के पत्रे हवा में उड़ गए। कवाडा ठाकरपाडा में सुरक्षा दीवार गिर गई। दहानू के कासा घोळ और ओसारवाडी स्कूलों की सुरक्षा दीवारें ढह गईं, जबकि वाघईपाडा और धानीवरी में छत तथा किचन शेड को नुकसान पहुंचा। जव्हार के कोरतड पाटीलपाडा स्कूल की दीवारों में गंभीर दरारें आईं। यहां करीब 15 लाख रुपये के नुकसान का अनुमान है और नई कक्षा के निर्माण की जरूरत बताई गई है। पालघर के महागांव, मोरेकुरण, दुर्वेस, पालघर उर्दू, सोमटा और गांजे की स्कूलों की छतों के पत्रे टूटकर उड़ गए। वसई के सायवन में किचन शेड पर पेड़ गिरा और पोमण क्षेत्र में जीर्ण स्लैब गिरने की घटनाएं सामने आईं।
इन घटनाओं को केवल जुलाई की असाधारण बारिश का परिणाम मानकर आगे बढ़ जाना आसान होगा। लेकिन पालघर के स्कूल भवनों की पुरानी स्थिति को देखें तो इस आपदा से एक बड़ा प्रश्न भी उभरता है—क्या बारिश ने संकट पैदा किया है, या उसने पहले से मौजूद कमजोरियों को और स्पष्ट कर दिया है?
सितंबर 2025 में प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया था कि पालघर जिले की 29 जिला परिषद स्कूलों की 62 कक्षाओं को इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त और खतरनाक घोषित किया जा चुका था। इन कक्षाओं की स्थिति जनवरी 2024 में हुई जांच के बाद सामने आई थी और उन्हें हटाकर नई कक्षाओं के निर्माण की दिशा में कार्रवाई की आवश्यकता बताई गई थी। सितंबर 2025 तक अपेक्षित कार्रवाई लंबित रहने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई थी। मोखाडा में एक स्कूल की दस कक्षाओं के नवीनीकरण के लिए करीब डेढ़ करोड़ रुपये की जरूरत बताई गई थी, जबकि तालुका की 60 जिला परिषद स्कूलों की 99 कक्षाओं में मरम्मत के प्रस्ताव का भी उल्लेख था।
यह कहना उचित नहीं होगा कि जुलाई में क्षतिग्रस्त हुई हर इमारत पहले से कमजोर थी। असाधारण बारिश और तेज हवाएं अच्छी इमारतों को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं। लेकिन यदि किसी जिले में पहले से दर्जनों कक्षाएं खतरनाक घोषित हों और अगले ही मानसून में स्कूलों की छतों, दीवारों और कक्षाओं को व्यापक नुकसान पहुंचे, तो स्कूल भवनों के रखरखाव और मानसून-पूर्व सुरक्षा जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पालघर की शिक्षा की चुनौती केवल इमारतों तक सीमित भी नहीं है। जिले का भूगोल स्वयं शिक्षा व्यवस्था के सामने कठिन परिस्थितियां पैदा करता है। एक ओर वसई-विरार जैसा तेजी से शहरी होता इलाका है और दूसरी ओर जव्हार, मोखाडा, विक्रमगढ़, तलासरी और दहानू के पहाड़ी, वन और आदिवासी क्षेत्र। कई गांव और पाड़े एक-दूसरे से दूर हैं। सामान्य दिनों में जो दूरी कठिन लगती है, मानसून में वही दूरी नदी-नालों, खराब रास्तों और टूटे संपर्क के कारण कहीं अधिक बड़ी हो जाती है।
इसी भूगोल के बीच जिला परिषद और आश्रमशालाएं हजारों बच्चों के लिए शिक्षा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इसलिए जब कोई स्कूल बंद होता है या वहां शिक्षक उपलब्ध नहीं होता, तो शहर की तरह पास में दूसरा विकल्प मिल जाना हमेशा संभव नहीं होता।
शिक्षकों की उपलब्धता को लेकर भी पालघर पहले सवालों के घेरे में रहा है। जून 2023 में महाराष्ट्र राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष विवेक पंडित द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र के आधार पर प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया था कि उस समय जिले की 28 जिला परिषद स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं था और 105 स्कूलें केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रही थीं। उसी वर्ष आदिवासी विद्यार्थियों ने शिक्षकों की मांग को लेकर जिला परिषद तक मार्च किया था।
ये तीन वर्ष पुराने आंकड़े हैं और इन्हें 2026 की वर्तमान स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। संभव है कि इस बीच नियुक्तियों और स्थानांतरण के बाद परिस्थितियां बदली हों। लेकिन इसी कारण आज के आंकड़े महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जिले में वर्तमान में कितने शिक्षक पद स्वीकृत हैं, कितने भरे हुए हैं और कितने स्कूल अभी भी एक शिक्षक के भरोसे हैं—यह जानकारी शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी क्षतिग्रस्त इमारतों की संख्या।
क्योंकि आखिरकार स्कूल केवल चार दीवारों और छत का नाम नहीं है। मजबूत इमारत हो और शिक्षक न हो तो शिक्षा अधूरी है; शिक्षक हो लेकिन सुरक्षित कक्षा न हो तो व्यवस्था फिर अधूरी है। इसके आगे एक और कठिन मोड़ आता है – आठवीं के बाद की पढ़ाई। मई 2026 में सामने आई रिपोर्टों में पालघर के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में माध्यमिक स्कूलों की सीमित उपलब्धता के कारण नौवीं कक्षा में प्रवेश को लेकर कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाया गया था। दूरस्थ गांवों और पाड़ों में प्राथमिक या उच्च प्राथमिक स्कूल उपलब्ध होने के बावजूद माध्यमिक स्कूल कई किलोमीटर दूर हो सकता है। ऐसे में बच्चे की आगे की पढ़ाई उसकी योग्यता से कहीं अधिक परिवार की आर्थिक स्थिति, परिवहन, सड़क और दूरी पर निर्भर होने लगती है।
पालघर के संदर्भ में यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी सरकारी रिकॉर्ड में गांव को ‘स्कूल से आच्छादित’ दिखाया जा सकता है, लेकिन उस गांव के बच्चे के लिए नौवीं कक्षा कितनी दूर है, वहां पहुंचने का साधन क्या है और मानसून में वह रास्ता कितना सुरक्षित है—इन सवालों के उत्तर ही तय करते हैं कि शिक्षा वास्तव में उपलब्ध है या केवल कागज पर।
जुलाई की बाढ़ के दौरान आश्रमशालाओं में सामने आई स्थिति ने इसी भौगोलिक कठिनाई का सबसे मार्मिक रूप दिखाया। बेटेगांव आश्रमशाला चारों तरफ से बाढ़ के पानी से ऐसी घिर गई कि वहां सामान्य तरीके से पहुंचना संभव नहीं रहा। आखिरकार विद्यार्थियों तक भोजन के पैकेट पहुंचाने के लिए JCB का सहारा लेना पड़ा।
उर्से स्थित स्कूल में पानी घुसने के बाद बच्चों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। बोर्डी छात्रावास में विद्यार्थियों का सामान दूसरी जगह पहुंचाया गया। कुछ क्षेत्रों में बाहर से खाद्यान्न पहुंचाना संभव नहीं रहा तो पहले से रखा गया आरक्षित राशन काम आया। चलणी और अन्य स्थानों पर उसी से भोजन तैयार किया गया। विवळवेढे में महालक्ष्मी मंदिर ट्रस्ट ने मदद की और झाई में स्थानीय ग्रामीण विद्यार्थियों के भोजन की व्यवस्था के लिए आगे आए। साफ पानी के जार मंगाए गए और बिजली आपूर्ति बाधित रहने के बावजूद कर्मचारियों ने बच्चों की देखभाल जारी रखी।
संकट के समय कर्मचारियों, स्थानीय लोगों और सामाजिक संस्थाओं का यह प्रयास उल्लेखनीय है। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। यदि किसी आवासीय स्कूल तक मानसून में सामान्य संपर्क पूरी तरह टूट सकता है, तो क्या वहां वैकल्पिक संपर्क मार्ग उपलब्ध है? कितने दिनों का भोजन और पेयजल सुरक्षित रखा जाता है? बिजली बंद होने पर क्या व्यवस्था है? अचानक बच्चों को निकालना पड़े तो उनके लिए पहले से निर्धारित सुरक्षित स्थान कहां है?
इन सवालों का संबंध केवल आपदा प्रबंधन से नहीं, शिक्षा की निरंतरता से भी है।
पालघर जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी जिले की साक्षरता दर 66.65 प्रतिशत बताती है। मुंबई के बिल्कुल पड़ोस में स्थित जिले के लिए यह आंकड़ा अपने भीतर एक महत्वपूर्ण सामाजिक कहानी समेटे हुए है। वसई-विरार की तेजी से बढ़ती शहरी आबादी और दूसरी ओर दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों की परिस्थितियों को एक औसत आंकड़े में रख देने से जिले के भीतर मौजूद अंतर दिखाई नहीं देते।
पालघर में शिक्षा का प्रश्न इसलिए केवल ‘कितने स्कूल हैं’ तक सीमित नहीं रह सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि वे स्कूल किस हालत में हैं, उनमें शिक्षक कितने हैं, बच्चों को वहां पहुंचने में कितना समय लगता है, आठवीं के बाद उनकी अगली कक्षा कितनी दूर है और मानसून के दौरान यह पूरी व्यवस्था कितनी टिकाऊ रहती है।
प्राकृतिक आपदाओं के बाद शासन की एक स्थापित प्रक्रिया होती है। नुकसान का पंचनामा किया जाता है, लागत का अनुमान तैयार होता है, प्रस्ताव भेजे जाते हैं, निधि स्वीकृत होती है और फिर मरम्मत का काम शुरू होता है। जुलाई की आपदा के बाद भी यह प्रक्रिया आवश्यक है। क्षतिग्रस्त 36 जिला परिषद स्कूलों को तत्काल सहायता और मरम्मत चाहिए।
लेकिन पालघर के मामले में केवल मरम्मत शायद पर्याप्त उत्तर नहीं होगा।
यदि कोई छत उसी तरह दोबारा बना दी गई जैसी पहले थी, तो क्या वह अगले असाधारण मानसून के लिए तैयार होगी? यदि खतरनाक कक्षाओं की सूची बनती रहे लेकिन उनके पुनर्निर्माण में वर्षों लगें, तो structural audit का उद्देश्य क्या रह जाता है? यदि आश्रमशाला तक बाढ़ के दौरान पहुंचना संभव नहीं है, तो क्या हर बार राहत पहुंचाने के लिए असाधारण साधनों का इंतजार किया जाएगा?
बदलती जलवायु और अधिक तीव्र मौसमी घटनाओं के दौर में स्कूल भवनों को केवल सामान्य सार्वजनिक निर्माण की तरह देखना शायद पर्याप्त नहीं है। स्कूलों में बच्चे होते हैं और इसलिए उनकी संरचनात्मक सुरक्षा के मानक अधिक कठोर होने चाहिए।
पालघर के लिए प्रत्येक सरकारी स्कूल और आश्रमशाला का नियमित मानसून-पूर्व structural safety audit, बाढ़ संभावित स्कूलों की अलग पहचान, कमजोर इमारतों के पुनर्निर्माण की निश्चित समयसीमा, बिजली उपकरणों और महत्वपूर्ण रिकॉर्ड को सुरक्षित ऊंचाई पर रखने की व्यवस्था, डिजिटल दस्तावेजीकरण, वैकल्पिक पेयजल और आपात ऊर्जा व्यवस्था जैसे उपाय अब केवल अच्छी प्रशासनिक प्रथा नहीं बल्कि आवश्यकता बनते जा रहे हैं।
इसी तरह शिक्षक उपलब्धता और माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच को भवन निर्माण से अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखने के बजाय एक ही शैक्षणिक श्रृंखला के हिस्से के रूप में देखना होगा। बच्चा पहली कक्षा में दाखिल हुआ, यह सफलता की शुरुआत है; वह सुरक्षित वातावरण में नियमित रूप से पढ़ता रहा, पर्याप्त शिक्षक मिले और बिना दूरी या संसाधनों की बाधा के बारहवीं तक पहुंच सका – वास्तविक सफलता वहां है।
इसीलिए जुलाई की आपदा से उपजा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न 1.67 करोड़ रुपये के नुकसान का नहीं है।
वास्तविक प्रश्न यह है कि पुनर्निर्माण के बाद पालघर के स्कूल पहले से कितने बेहतर होंगे।
क्या 2024 में खतरनाक घोषित कक्षाओं की स्थिति अगले मानसून से पहले बदल जाएगी? क्या क्षतिग्रस्त 36 स्कूलों की मरम्मत केवल पुराने स्वरूप को बहाल करेगी या उन्हें अधिक आपदा-रोधी बनाया जाएगा? जिले में वर्तमान शिक्षक रिक्तियों की वास्तविक तस्वीर सार्वजनिक होगी? क्या दूरस्थ पाड़ों के बच्चों के लिए आठवीं के बाद माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने की दीर्घकालीन योजना बनेगी? और क्या प्रत्येक आश्रमशाला के लिए ऐसी आपात योजना होगी कि अगली बाढ़ में किसी बच्चे के भोजन तक पहुंचने के लिए JCB अंतिम विकल्प न बने?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल शिक्षा विभाग के पास भी नहीं है। जिला परिषद, आदिवासी विकास विभाग, सार्वजनिक निर्माण विभाग, आपदा प्रबंधन तंत्र और राज्य सरकार—सभी की भूमिका इसमें जुड़ी हुई है।
बारिश को सरकार नहीं रोक सकती। नदी के उफान को हमेशा नियंत्रित करना भी संभव नहीं है। लेकिन बारिश आने से पहले स्कूल की छत मजबूत है या नहीं, यह जांचा जा सकता है। खतरनाक कक्षा को समय रहते बदला जा सकता है। खाली शिक्षक पद भरे जा सकते हैं। दूर रहने वाले बच्चे के लिए परिवहन या छात्रावास की व्यवस्था की जा सकती है। बाढ़ से घिर सकने वाली आश्रमशाला के लिए भोजन, पानी और निकासी की योजना पहले तैयार की जा सकती है।
यहीं प्राकृतिक आपदा और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के बीच की रेखा खिंचती है।
अगस्त में जब यह जिला जुलाई की तबाही से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, पालघर के क्षतिग्रस्त स्कूल सरकार के सामने केवल सहायता की मांग लेकर खड़े नहीं हैं। वे एक अवसर भी दे रहे हैं – पुरानी व्यवस्था को केवल जोड़ने-पैबंद लगाने के बजाय उसे नए सिरे से देखने का।
कुछ महीनों बाद टूटी दीवारें फिर खड़ी हो जाएंगी। छतों पर नए पत्रे लग जाएंगे। पानी में खराब हुई किताबें बदल दी जाएंगी। कंप्यूटर भी फिर खरीदे जा सकते हैं। दीवारों पर नया रंग चढ़ेगा और उन्हीं कमरों में बच्चों की आवाजें दोबारा सुनाई देने लगेंगी।
लेकिन अगले मानसून में यदि उन्हीं स्कूलों की छतें फिर कमजोर मिलती हैं, किसी खतरनाक घोषित कक्षा में फिर बच्चे बैठे दिखाई देते हैं, किसी दूरस्थ स्कूल में शिक्षक का इंतजार जारी रहता है या किसी आश्रमशाला तक पहुंचने के लिए फिर बाढ़ के बीच मशीन उतारनी पड़ती है, तो सवाल केवल प्रकृति से नहीं पूछा जाएगा।
तब यह सवाल व्यवस्था से होगा कि जुलाई 2026 की आपदा से आखिर सीखा क्या गया?
पालघर के बच्चों को केवल स्कूल की चारदीवारी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सुरक्षित कक्षा, पर्याप्त शिक्षक और ऐसी शिक्षा व्यवस्था देना भी उतना ही जरूरी है, जो बच्चे के गांव, उसकी आर्थिक स्थिति और मानसून की तीव्रता के साथ न बदल जाए।
जुलाई की बारिश ने पालघर की कई स्कूलों की छतें जरूर उड़ा दीं। लेकिन उसके बाद जो दिखाई दिया, वह शायद उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है – एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था, जिसकी मजबूती का असली पैमाना अगली बारिश में तय होगा।
—–समाप्त—–
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