मुंबई: पुलिस अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर डराने और ‘डिजिटल अरेस्ट’ का झांसा देने वाले साइबर ठगों ने अंधेरी के 79 वर्षीय सेवानिवृत्त व्यक्ति से करीब ₹1.10 करोड़ ठग लिए। मामले की जांच कर रही उत्तर क्षेत्र साइबर पुलिस ने उस कंपनी के एक निदेशक को गिरफ्तार किया है, जिसके बैंक खाते में कथित तौर पर ठगी की रकम में से ₹71 लाख पहुंचे थे।

पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार व्यक्ति की भूमिका बैंक खाता उपलब्ध कराने और रकम आगे पहुंचाने के आरोप से जुड़ी है। गिरफ्तारी का अर्थ अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। ठगी की पूरी श्रृंखला, कॉल करने वाले व्यक्तियों और रकम के अंतिम लाभार्थियों का पता लगाने के लिए जांच जारी है।

एक फोन कॉल से शुरू हुआ डर का खेल

घटना की शुरुआत 25 सितंबर को हुई थी। अज्ञात व्यक्ति ने खुद को नाशिक के पंचवटी पुलिस स्टेशन का अधिकारी बताते हुए बुजुर्ग को फोन किया। कॉल करने वाले ने दावा किया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल कर नाशिक में एक बैंक खाता खोला गया है और वह खाता ₹15 करोड़ के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ा है।

ठगों ने यह भी आरोप लगाया कि बुजुर्ग को इस कथित लेन-देन के बदले ₹2 करोड़ का कमीशन मिला है। बुजुर्ग ने किसी भी खाते या रकम की जानकारी होने से इनकार किया, लेकिन आरोपियों ने वीडियो कॉल पर पूछताछ जारी रखी और सहयोग नहीं करने पर उन्हें तथा उनके परिवार को गिरफ्तार करने की धमकी दी।

परिवार से बात करने से रोका, चार खातों में भेजवाई रकम

आरोप है कि ठगों ने जांच को ‘गोपनीय’ बताते हुए पीड़ित को परिवार, पड़ोसियों और परिचितों से बातचीत नहीं करने को कहा। इसके बाद बैंक खातों, निवेश और संपत्ति से जुड़ी जानकारी ली गई। रकम की जांच के नाम पर उन्हें चार अलग-अलग बैंक खातों में पैसे भेजने के निर्देश दिए गए और भरोसा दिलाया गया कि सत्यापन पूरा होने पर पूरी रकम लौटा दी जाएगी।

डर और दबाव में बुजुर्ग ने ₹29 लाख, ₹42 लाख, ₹9.5 लाख और ₹30 लाख की चार किस्तों में रकम ट्रांसफर कर दी। बाद में उन्होंने अपनी हाउसिंग सोसायटी के एक पदाधिकारी को पूरी बात बताई। तभी उन्हें समझ आया कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं और इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

₹71 लाख वाले कंपनी खाते से गिरफ्तारी तक पहुंची पुलिस

जांच में पुलिस ने उन बैंक खातों की मनी ट्रेल खंगाली, जिनमें रकम भेजी गई थी। इनमें से एक कंपनी के खाते में ₹71 लाख जमा होने का पता चला। इसी आधार पर कंपनी के निदेशक तक पहुंचकर उसे गिरफ्तार किया गया। पुलिस यह जांच रही है कि खाता किस उद्देश्य से खोला गया था, रकम आगे किन खातों में भेजी गई और नेटवर्क में कितने लोग शामिल हैं।

इससे पहले भी फर्जी जांच अधिकारी बनकर ठगी और मुलुंड से जुड़े बड़े साइबर नेटवर्क के मामले सामने आ चुके हैं। इन घटनाओं में एक समान तरीका दिखाई देता है—सरकारी एजेंसी का नाम, गिरफ्तारी का डर और तुरंत पैसे भेजने का दबाव।

‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं

पुलिस या दूसरी जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके बैंक खाते की जांच के नाम पर निजी खाते में रकम ट्रांसफर करने को नहीं कहती। ऐसा फोन आए तो कॉल काटें, कोई OTP, स्क्रीन शेयर, बैंक विवरण या पहचान दस्तावेज न भेजें। परिवार के किसी सदस्य को तुरंत जानकारी दें।

पैसे ट्रांसफर हो गए हों तो तत्काल 1930 पर कॉल करें और केंद्र सरकार के आधिकारिक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। बैंक को भी तुरंत सूचना देने से रकम रोकने की संभावना बढ़ सकती है। कॉल नंबर, चैट, बैंक रसीद और स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखना जांच में मदद करता है।