Mumbai: महाराष्ट्र में लगातार गहराता जल संकट अब राज्य की फल आधारित कृषि अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेष रूप से मराठवाड़ा और विदर्भ के प्रमुख फल उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी, बढ़ते तापमान और सिंचाई के सीमित साधनों के कारण संतरा, मौसंबी और अनार की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई इलाकों में फलों का आकार सामान्य से काफी छोटा रह गया है, जबकि बड़ी संख्या में पेड़ सूखने लगे हैं। इससे किसानों को न केवल मौजूदा फसल का नुकसान उठाना पड़ रहा है, बल्कि वर्षों से तैयार किए गए बगीचों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 26 सितंबर के बीच महाराष्ट्र में सामान्य से लगभग 18 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसके बाद राज्य के 358 में से 304 तालुकों में सूखा अथवा सूखे जैसी स्थिति घोषित की गई। मराठवाड़ा और विदर्भ में बारिश की कमी के साथ उसका असमान वितरण भी कृषि संकट का प्रमुख कारण बना। कई स्थानों पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई, जबकि कुछ क्षेत्रों में बारिश ऐसे समय हुई जब फसलों को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता नहीं थी।

फल उत्पादक क्षेत्रों में गहराता संकट

मराठवाड़ा का जालना जिला लंबे समय से मौसंबी और अनार उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है। जिले के अंबड, घनसावंगी और रोहिलागढ़ सहित बीड के गेवराई तथा छत्रपति संभाजीनगर के पैठण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मौसंबी के बगीचे विकसित किए गए थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बार-बार पड़ने वाले सूखे, पानी की कमी और कीटों के प्रकोप ने इस क्षेत्र की फल उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

अनेक बगीचों में मौसंबी के फल पर्याप्त विकसित नहीं हो पाए हैं। पानी की कमी के कारण हरे फल सिकुड़कर छोटे रह गए हैं और कुछ पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं। लगातार फसल खराब होने और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण कई किसानों को फल उत्पादन छोड़ने अथवा दूसरी फसलों की ओर रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

इसी प्रकार विदर्भ के अमरावती जिले सहित प्रमुख संतरा उत्पादक क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक है। पानी की कमी से संतरे के फल समय से पहले गिर रहे हैं और उनका आकार सामान्य से काफी छोटा रह गया है। कुछ किसान पेड़ों को बचाने के लिए कच्चे फल तोड़ने जैसे उपाय अपना रहे हैं, ताकि पेड़ों पर पानी और पोषक तत्वों की मांग कम हो सके।

अनार की खेती को भी भारी नुकसान

सूखे का असर केवल संतरा और मौसंबी तक सीमित नहीं है। मराठवाड़ा में अनार की खेती भी गंभीर संकट का सामना कर रही है। अनार के बगीचों को तैयार करने में किसानों को पौधरोपण, सिंचाई, खाद, कीटनाशक और देखभाल पर पर्याप्त निवेश करना पड़ता है। लेकिन बारिश की कमी और सिंचाई के साधनों के अभाव में कई बगीचों के सैकड़ों पेड़ सूख गए हैं।

जिन पेड़ों पर फल लगे भी हैं, उनमें से अनेक फल आकार और गुणवत्ता के लिहाज से बाजार में बेचने योग्य नहीं रह गए हैं। परिणामस्वरूप किसानों को उत्पादन लागत की भरपाई करना भी मुश्किल हो रहा है।

महाराष्ट्र के इन क्षेत्रों में सूखे का संकट नया नहीं है। वर्ष 2012 और 2014 के गंभीर सूखे तथा बाद के वर्षों में कीटों के प्रकोप ने भी मौसंबी के बगीचों को व्यापक नुकसान पहुंचाया था। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाओं से फल उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है।

उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका

नागपुर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय सिट्रस अनुसंधान संस्थान (ICAR-Central Citrus Research Institute) के वैज्ञानिकों के अनुसार, विदर्भ के प्रमुख संतरा उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक रही। बारिश वाले दिनों की संख्या कम होने और वर्षा के असमान वितरण के कारण बगीचों में पर्याप्त सिंचाई नहीं हो सकी।

वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिक तापमान, मिट्टी में नमी की कमी और वाष्पीकरण की तेज दर ने मिलकर फलों के विकास को प्रभावित किया है। पानी की कमी होने पर पौधे उपलब्ध नमी का उपयोग फलों के विकास के बजाय स्वयं को जीवित रखने के लिए करने लगते हैं। इससे फलों का आकार छोटा रह जाता है और गंभीर स्थिति में पेड़ भी सूखने लगते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 13 टन सिट्रस फलों का उत्पादन होता है और एक फल का औसत वजन 140 से 180 ग्राम तक रहता है। लेकिन सूखे से प्रभावित बगीचों में उत्पादन घटकर लगभग 7 से 8 टन प्रति हेक्टेयर रह जाने की आशंका है। इस अनुमान के आधार पर उत्पादन में लगभग 38 से 46 प्रतिशत तक गिरावट हो सकती है।

इसके अतिरिक्त संतरा और मौसंबी की अंबिया तथा मृग बहार, अर्थात फूल आने और फल विकसित होने के दोनों प्रमुख चक्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है। इससे मौजूदा उत्पादन के साथ आगामी फसल भी प्रभावित हो सकती है।

बारिश की मात्रा के साथ उसका समय भी महत्वपूर्ण

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, किसी क्षेत्र में सूखे का आकलन केवल कुल वर्षा के आधार पर नहीं किया जा सकता। बारिश का समय, उसकी अवधि, क्षेत्रीय वितरण और फसल की विकास अवस्था भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यदि पौधों को फूल आने या फल विकसित होने के समय पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो बाद में होने वाली बारिश से उस नुकसान की पूरी भरपाई संभव नहीं होती। इसी कारण कृषि सूखे और जल-स्रोतों के सूखे के बीच अंतर समझना आवश्यक है। कई बार जलाशयों में पानी उपलब्ध होने के बावजूद खेतों तक पर्याप्त सिंचाई नहीं पहुंच पाती।

पानी की लगातार कमी से फल छोटे रह जाते हैं, उनका रंग और गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा बाजार में उचित मूल्य मिलने की संभावना घट जाती है। कमजोर पेड़ों पर कीटों और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

किसानों के सामने दीर्घकालिक आर्थिक संकट

फल आधारित खेती की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बगीचा तैयार करने में कई वर्ष लगते हैं। यदि कोई पेड़ पूरी तरह सूख जाता है और उसके दोबारा विकसित होने की संभावना समाप्त हो जाती है, तो किसान को उसे हटाकर नया पौधा लगाना पड़ता है। नए बगीचे से व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में सामान्यतः लगभग चार वर्ष लग सकते हैं।

इस दौरान किसानों को पौधों की देखभाल, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों पर लगातार खर्च करना पड़ता है, जबकि नियमित आमदनी का स्रोत सीमित हो जाता है। इस प्रकार एक गंभीर सूखा केवल एक मौसम की फसल नष्ट नहीं करता, बल्कि कई वर्षों की पूंजी, मेहनत और संभावित आय को प्रभावित करता है।

स्थानीय उत्पादन घटने का असर फल बाजारों पर भी पड़ सकता है। मौसंबी और संतरे की उपलब्धता कम होने पर महाराष्ट्र को दूसरे राज्यों से आपूर्ति पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। इससे परिवहन लागत, बाजार की आपूर्ति व्यवस्था और उपभोक्ता कीमतों पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है।

दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता

महाराष्ट्र के फल उत्पादक क्षेत्रों में बार-बार उत्पन्न हो रहा सूखा कृषि प्रबंधन और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसके लिए सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी में नमी संरक्षण तथा वैज्ञानिक बागवानी प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

इसके साथ ही सूखे से प्रभावित बगीचों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, वास्तविक नुकसान का पारदर्शी आकलन, समयबद्ध मुआवजा, प्रभावी फसल बीमा और नष्ट हुए बगीचों के पुनर्विकास के लिए विशेष सहायता की आवश्यकता है। फल उत्पादक किसानों के लिए ऐसी दीर्घकालिक नीति भी जरूरी है, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों और लगातार बढ़ते उत्पादन जोखिमों को ध्यान में रखे।

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में उभरता यह संकट केवल कृषि उत्पादन में गिरावट का विषय नहीं है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की आजीविका, कृषि निवेश और भविष्य की खाद्य आपूर्ति से जुड़ी व्यापक चुनौती है। यदि जल प्रबंधन, कृषि अनुसंधान और किसान सहायता के स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य के पारंपरिक फल उत्पादक क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता और आर्थिक स्थिरता पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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