Vasai Virar : महाराष्ट्र में चल रही Special Intensive Revision (SIR) ने राज्य की मतदाता सूची को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। करीब 1.80 करोड़ मतदाताओं के Enumeration Forms ‘अनकलेक्टेबल’ श्रेणी में पहुंचने के बाद 24 अगस्त को जारी होने वाली प्रारूप मतदाता सूची में इन नामों के दिखाई नहीं देने की आशंका है। मुंबई में अकेले करीब 30 लाख मतदाता इस श्रेणी में बताए जा रहे हैं।
यह आंकड़ा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि SIR शुरू होने के साथ ही मतदाता सूची से वास्तविक मतदाताओं के नाम गलती से हटने, प्रक्रिया की पारदर्शिता और दावे-आपत्तियों की व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। महाराष्ट्र में SIR लागू होने से पहले ही निर्वाचन विभाग को अतिरिक्त पारदर्शिता उपायों का ऐलान करना पड़ा था। मई में महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोक्कलिंगम ने कहा था कि हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करने के साथ राजनीतिक दलों के Booth Level Agents को भी उपलब्ध कराई जाएगी और गलतियों को चिन्हित करने के लिए उन्हें समय दिया जाएगा।
अब जब 1.80 करोड़ नाम ‘अनकलेक्टेबल’ की श्रेणी में पहुंच गए हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल फिर सामने आ रहा है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर मतदाता अपने पंजीकृत पते पर क्यों नहीं मिल पाए और इन मामलों की वास्तविकता की जांच किस स्तर तक हुई है?
सबसे बड़ा सवाल – क्या ‘अनकलेक्टेबल’ का मतलब ‘फर्जी’ है?
नहीं। यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।
‘अनकलेक्टेबल’ में ऐसे मतदाता भी शामिल हो सकते हैं जो अपने पुराने पते पर उपलब्ध नहीं थे, दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनका नाम कहीं और दर्ज है। इसलिए 1.80 करोड़ का आंकड़ा सीधे तौर पर 1.80 करोड़ फर्जी मतदाताओं का आंकड़ा नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जो वास्तविक मतदाता नौकरी, किराये के मकान, बीमारी, यात्रा, redevelopment या किसी अन्य वजह से उस समय अपने पते पर मौजूद नहीं था, क्या उसका नाम भी इसी प्रक्रिया में बाहर हो जाएगा?
SIR पर पहले चिंता थी, अब आंकड़े ने सवाल और बड़ा कर दिया
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ-सुथरा और अधिक सटीक बनाना है। निर्वाचन आयोग के अनुसार तेजी से बढ़ता शहरीकरण, लगातार हो रहा migration, मृत्यु और duplicate entries जैसी वजहों से नई सिरे से मतदाता सूची की जांच जरूरी हुई है।
लेकिन लोकतंत्र में मतदाता सूची की सफाई जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि एक भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे।
महाराष्ट्र में यह चिंता खास तौर पर मुंबई, ठाणे, पालघर और वसई-विरार जैसे इलाकों में महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां बड़ी संख्या में लोग रोजगार, किराये और आवासीय बदलाव के कारण लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।
अब निर्वाचन आयोग से कुछ सीधे सवाल
इतने बड़े आंकड़े के सामने आने के बाद Election Commission से कुछ सवालों के स्पष्ट जवाब अपेक्षित हैं:-
क्या 1.80 करोड़ ‘अनकलेक्टेबल’ मामलों का वास्तविक भौतिक सत्यापन हुआ है?
इनमें कितने मतदाता मृत, कितने स्थायी रूप से स्थानांतरित, कितने duplicate और कितने सिर्फ उस समय घर पर उपलब्ध नहीं थे?
क्या हर ‘अनकलेक्टेबल’ मतदाता को अपना नाम बचाने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा?
मुंबई जैसे महानगर में जहां लाखों लोग किराये या redevelopment के कारण पते बदलते हैं, उनके लिए क्या अलग और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था है?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल –
अगर SIR का उद्देश्य ‘एक भी पात्र मतदाता को बाहर नहीं करना’ है, तो निर्वाचन आयोग यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि 1.80 करोड़ के इस बड़े आंकड़े में एक भी वास्तविक मतदाता प्रशासनिक प्रक्रिया की गलती का शिकार न बने?
निर्वाचन विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट सूची अंतिम सूची नहीं है और पात्र मतदाताओं को दावा दर्ज करने का अवसर मिलेगा। महाराष्ट्र CEO की वेबसाइट पर SIR से संबंधित जानकारी और हेल्पलाइन 1950 भी उपलब्ध कराई गई है।
लेकिन सवाल यही है कि क्या हर आम मतदाता को समय रहते यह पता भी चलेगा कि उसका नाम ड्राफ्ट सूची से गायब है?
क्योंकि लोकतंत्र में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “नाम छूट गया तो Form 6 भर दीजिए।” असली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि जिस नागरिक को मतदान का अधिकार है, उसका नाम गलती से पहले हटे ही नहीं।
महाराष्ट्र की 24 अगस्त वाली ड्राफ्ट मतदाता सूची इसलिए सिर्फ आंकड़ों की सूची नहीं होगी। यह SIR की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा भी होगी।
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