महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा को लेकर अपना रुख और कड़ा कर दिया है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 15 अगस्त 2026 के बाद जो ड्राइवर मराठी नहीं बोल पाएंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाएगी। पहली बार नियम तोड़ने पर जुर्माना लगाया जाएगा और बार-बार उल्लंघन करने वालों पर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य सरकार के इस फैसले को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति और परिवहन क्षेत्र में बहस तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि यह कदम स्थानीय यात्रियों और ड्राइवरों के बीच संवाद आसान बनाने के लिए उठाया गया है, जबकि कुछ संगठनों ने इसे मजबूरी करार दिया है।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि महाराष्ट्र में व्यवसाय करने वाले लोगों को स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान या सलमान खान ने सरकार से ट्रांसपोर्ट लाइसेंस नहीं लिया है और न ही उद्योगपति मुकेश अंबानी या गौतम अडानी पैसेंजर ट्रांसपोर्ट परमिट लेकर सड़क पर वाहन चला रहे हैं।
सरनाइक ने कहा:
“जो लोग महाराष्ट्र में सार्वजनिक परिवहन का व्यवसाय करना चाहते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा सीखनी होगी। यह राज्य के लोगों के साथ संवाद और सेवा का हिस्सा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का उद्देश्य किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं, बल्कि यात्रियों और ड्राइवरों के बीच बेहतर संवाद सुनिश्चित करना है।
सरनाइक ने साफ किया कि मराठी भाषा से जुड़ा यह नियम नया नहीं है। उनके मुताबिक यह नियम वर्ष 1989 से मौजूद है, लेकिन अब इसे सख्ती से लागू किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि कई विधायकों ने रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) में जमा किए जा रहे नकली लाइसेंस और फर्जी दस्तावेजों को लेकर शिकायतें की थीं। इन शिकायतों के बाद सरकार ने पुराने नियमों को दोबारा प्रभावी तरीके से लागू करने का फैसला किया।
मंत्री ने बताया कि सरकार ने ड्राइवर यूनियनों की मांग को देखते हुए मराठी सीखने की अंतिम समयसीमा 15 अगस्त तक बढ़ा दी है। इसके बाद नियम लागू किए जाएंगे।
सरनाइक के अनुसार:
उन्होंने कहा कि सरकार का मकसद दंड देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि महाराष्ट्र में काम करने वाले ड्राइवर मराठी में बुनियादी संवाद कर सकें।
सरनाइक ने कहा कि यह मुद्दा मुख्य रूप से यात्रियों और ड्राइवरों के बीच कम्युनिकेशन से जुड़ा हुआ है।
उनके मुताबिक, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों से मुंबई आने वाले कई यात्री हिंदी नहीं समझते या बोल नहीं पाते। ऐसे में टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों के साथ गलतफहमी और बहस की स्थिति बन जाती है।
मंत्री ने दावा किया कि सरकार ने हाल ही में मीरा-भायंदर क्षेत्र में 3,500 ड्राइवरों का सर्वे कराया था। इस सर्वे में सामने आया कि:
सरकार का कहना है कि यही आंकड़े इस फैसले के पीछे की मुख्य वजहों में शामिल हैं।
सरनाइक ने कहा कि सरकार केवल नियम लागू नहीं कर रही, बल्कि ड्राइवरों को मराठी सीखने में मदद भी कर रही है।
इसके लिए:
सरकार का मानना है कि इससे ड्राइवर आसानी से बुनियादी मराठी सीख सकेंगे।
सरनाइक ने कहा कि सरकार की नीति बिल्कुल स्पष्ट है और इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि ड्राइवरों ने ट्रांसपोर्ट लाइसेंस लेते समय पहले ही एफिडेविट पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें पहचान पत्र, जन्म प्रमाणपत्र, बीमा दस्तावेज और मराठी भाषा की जानकारी जैसी शर्तें शामिल थीं।
मंत्री ने सवाल उठाते हुए कहा:
“जब आपने लाइसेंस लेते समय इन शर्तों को स्वीकार किया था, तो अब इसे मजबूरी कैसे कहा जा सकता है?”
सरकार के इस फैसले पर कुछ ड्राइवर यूनियनों और विपक्षी दलों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि दूसरे राज्यों से आए ड्राइवरों को अचानक भाषा के आधार पर दंडित करना उचित नहीं होगा। हालांकि सरकार का कहना है कि पर्याप्त समय और प्रशिक्षण दोनों उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
फिलहाल महाराष्ट्र सरकार अपने फैसले पर पूरी तरह कायम नजर आ रही है और 15 अगस्त के बाद नियमों के सख्त पालन के संकेत दे चुकी है।
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