Vasai Virar : शहरों में तेज आवाज अब सिर्फ असुविधा का विषय नहीं रह गई है। डीजे, लाउडस्पीकर और साउंड सिस्टम का बढ़ता शोर लोगों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करता है। इसके बावजूद नियमों के पालन की जिम्मेदारी अक्सर शिकायतों और कभी-कभार होने वाली कार्रवाई तक सीमित रह जाती है। Patna High Court (पटना हाईकोर्ट) का हालिया रुख इसी रवैये पर सवाल खड़ा करता है।
फरवरी 2025 में सुरेंद्र प्रसाद बनाम बिहार राज्य मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पटना में डीजे ट्रॉली और लाउडस्पीकर से होने वाले शोर को गंभीरता से लिया। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अदालत ने पुलिस से यह जानकारी मांगी कि शोर फैलाने वाले उपकरणों के संचालकों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और उन्हें किस आधार पर अनुमति दी गई।
अक्टूबर में पुलिस की रिपोर्ट सामने आई। पटना, बाढ़ और फतुहा में उपकरण जब्त किए गए, जुर्माना लगाया गया और दूसरी कार्रवाई भी हुई। लेकिन मसौढ़ी में कोई कार्रवाई नहीं हुई। न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने इसे अविश्वसनीय माना। सवाल वाजिब था – क्या वहां तीन महीने तक शोर से जुड़े नियमों का एक भी उल्लंघन नहीं हुआ?
यहीं से इस मामले का बड़ा सवाल सामने आता है। क्या प्रशासन तभी सक्रिय होगा, जब कोई नागरिक शिकायत दर्ज कराए?
हाईकोर्ट ने इसी सोच को बदलने की कोशिश की है। अदालत ने अधिकारियों को केवल शिकायत मिलने का इंतजार करने के बजाय नियमित रूप से नियम लागू करने को कहा है। डीजे, साउंड सिस्टम ऑपरेटर और इवेंट हॉल संचालकों के पंजीकरण का निर्देश भी इसी दिशा में एक व्यावहारिक कदम है। जब प्रशासन के पास संचालकों का रिकॉर्ड होगा, तो नियमों का पालन सुनिश्चित करना और उल्लंघन होने पर जवाबदेही तय करना आसान होगा।
रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर पर रोक कोई नई बात नहीं है। लेकिन अदालत का रात 9:55 बजे तक लाउडस्पीकर बंद करने का निर्देश इस बात को दिखाता है कि नियमों को लागू करने में छोटी-सी व्यावहारिक तैयारी भी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। अक्सर ‘बस पांच मिनट और’ से शुरू होने वाली छूट धीरे-धीरे नियमों को ही अप्रासंगिक बना देती है।
बिहार ही नहीं, देश के कई हिस्सों में त्योहारों, शादियों, धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान तेज आवाज को लेकर विवाद होते रहे हैं। यहां प्रशासन के सामने एक मुश्किल संतुलन भी है। लोगों को अपनी परंपराओं और उत्सव मनाने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता दूसरे लोगों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार की कीमत पर नहीं हो सकती।
यही कारण है कि इस मामले में केवल डीजे पर कार्रवाई से ज्यादा महत्वपूर्ण नियमों के समान और लगातार लागू होने की व्यवस्था है। अगर कार्रवाई केवल चुनिंदा आयोजनों या शिकायतों के आधार पर होगी, तो नियमों की विश्वसनीयता कमजोर होगी। इसके विपरीत, सभी संचालकों का पंजीकरण, नियमित निरीक्षण और उल्लंघन पर एक समान कार्रवाई प्रशासन को अधिक प्रभावी बना सकती है।
पटना हाईकोर्ट का हस्तक्षेप इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने समस्या के लक्षणों के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी पर भी ध्यान दिया है। हालांकि किसी भी न्यायिक निर्देश की असली सफलता आदेश जारी होने में नहीं, बल्कि उसके पालन में होती है।
अब देखना यह है कि राज्य सरकार और प्रशासन इस आदेश को कुछ समय की सख्ती तक सीमित रखते हैं या ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ नियमित और निष्पक्ष कार्रवाई को प्रशासन की स्थायी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाते हैं।
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