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Maharashtra FDA action : खबरों की खबर भाग–3 | आपकी थाली में आखिर क्या है? खाद्य सुरक्षा की देशव्यापी पड़ताल

महाराष्ट्र FDA की खाद्य सुरक्षा कार्रवाई, दूध और पनीर की जांच
महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई में दूध और पनीर की जांच।

“मेट्रो सिटी समाचार की विशेष खोजपरक श्रृंखला- भाग–3”

रेस्तरां से आगे दूध की पूरी आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंची FDA की जांच, पनीर पर उठे सवाल तो महाराष्ट्र ने लिया बड़ा फैसला

Vasai-Virar : महाराष्ट्र में चल रही खाद्य सुरक्षा कार्रवाई का पहला चरण होटल, रेस्तरां, मिठाई की दुकानों और डेयरी उत्पादों पर केंद्रित दिखाई दिया। दूसरे चरण में मामला Bombay High Court तक पहुंचा और यह सवाल उठा कि खाद्य सुरक्षा के नियम निजी, सरकारी और संस्थागत प्रतिष्ठानों पर समान रूप से लागू हो रहे हैं या नहीं। लेकिन इस पूरी कहानी की शायद सबसे महत्वपूर्ण परत इसके बाद सामने आती है। क्योंकि उपभोक्ता की थाली में खराब पनीर मिलने पर केवल उस रेस्तरां को जिम्मेदार ठहराना पूरी समस्या का समाधान नहीं है। पनीर आखिर आया कहां से? जिस दूध से वह बना, वह कहां से आया? दूध किस डेयरी में पहुंचा? किस तापमान पर रखा गया? किस वाहन अथवा टैंकर में ले जाया गया? किसने पनीर बनाया? किस वितरक ने होटल और रेस्तरां तक पहुंचाया? और यदि किसी एक खेप में समस्या है तो उसी खेप का माल और किन-किन प्रतिष्ठानों तक गया?

यहीं से खाद्य सुरक्षा की जांच – थाली से निकलकर पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचती है।

पहले एक बड़ा संकेत: 103 होटल-रेस्तरां की जांच, 16 लाइसेंस निलंबित

16 से 21 जुलाई के बीच महाराष्ट्र FDA ने राज्यभर में विशेष अभियान चलाया। इस दौरान 103 होटल, रेस्तरां, ढाबे और इसी तरह के खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। इनमें से 34 प्रतिष्ठानों को सुधार नोटिस जारी किए गए और गंभीर खाद्य सुरक्षा तथा स्वच्छता संबंधी कमियों के आरोप में 16 खाद्य व्यवसायों के लाइसेंस निलंबित किए गए।

लेकिन इसी अभियान की एक और महत्वपूर्ण दिशा थी – दूध और डेयरी उत्पादों की जांच।

अभियान के दौरान करीब 1,731 लीटर दूध और 896 किलो दूध से बने उत्पाद कार्रवाई के दायरे में आए। इनका बताया गया मूल्य लगभग ₹1.44 लाख था। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब जांच केवल तैयार भोजन पर नहीं बल्कि उस कच्चे माल की तरफ बढ़ रही थी जिससे कई तरह के खाद्य पदार्थ तैयार होते हैं।

Govandi: एक ही डेयरी से 1,683 लीटर दूध

इस अभियान की सबसे उल्लेखनीय कार्रवाइयों में मुंबई के Govandi की एक डेयरी इकाई से करीब 1,683 लीटर दूध जब्त किया जाना शामिल था। कार्रवाई का कारण दूध के भंडारण की अनुचित परिस्थितियां बताई गईं। इसी दौरान Sinnar की दो दूध इकाइयों से भी दूध के नमूने मानक से कम होने के संदेह में लिए गए। यहां एक बार फिर वही महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है – मिलावट और खराब भंडारण एक ही चीज नहीं हैं।

दूध में जानबूझकर कोई बाहरी पदार्थ मिलाना एक अलग समस्या है। लेकिन दूध को गलत तापमान अथवा अस्वच्छ परिस्थितियों में रखना भी उसे उपभोक्ता के लिए जोखिमपूर्ण बना सकता है। इसीलिए खाद्य सुरक्षा केवल “क्या मिलाया गया?” का प्रश्न नहीं है।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है – खाद्य पदार्थ को कैसे संभाला गया?

दूध की शीत-श्रृंखला क्यों महत्वपूर्ण है?

दूध जल्दी खराब होने वाला खाद्य पदार्थ है। दूध निकालने से लेकर ग्राहक तक पहुंचने के बीच तापमान नियंत्रण की पूरी व्यवस्था को शीत-श्रृंखला (Cold Chain) कहा जाता है। इसमें कई चरण आते हैं – दूध संग्रह,ठंडा करना,डेयरी तक परिवहन,प्रसंस्करण,भंडारण,वितरण, और खुदरा बिक्री।

इस श्रृंखला की किसी एक कड़ी में तापमान नियंत्रण बिगड़ जाए तो दूध की गुणवत्ता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए दूध की जांच केवल पैकेट खोलकर नमूना लेने तक सीमित नहीं रह सकती।

असली जांच दूध संग्रह केंद्र से शुरू होनी चाहिए

कल्पना कीजिए – किसी शहर में पनीर का नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरता। सबसे आसान कार्रवाई क्या होगी? जिस दुकान अथवा रेस्तरां से नमूना लिया गया, उसके खिलाफ कार्रवाई। लेकिन क्या इससे समस्या की जड़ मिल जाएगी? जरूरी नहीं।

जांच को पीछे की तरफ जाना होगा – रेस्तरां ने पनीर किससे खरीदा? वितरक कौन था? निर्माता कौन था? पनीर किस दूध से बना? दूध किस संग्रह केंद्र से आया? और क्या उसी निर्माता की दूसरी खेप भी बाजार में मौजूद है? इसे स्रोत और आपूर्ति का पता लगाने की व्यवस्था (Traceability) कहा जाता है। यही व्यवस्था खाद्य सुरक्षा अभियान को केवल छापेमारी से वास्तविक जांच में बदलती है।

वसई-पालघर क्यों महत्वपूर्ण हो जाता है?

इस पूरी श्रृंखला में वसई और पालघर का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां पहले ही होटल, बेकरी और डेयरी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई सामने आ चुकी है। इसके बाद वसई क्षेत्र में दूध और पनीर से जुड़े मामलों ने स्थानीय खाद्य आपूर्ति व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए।

ऐसे मामलों में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कितने लीटर दूध अथवा कितने किलो पनीर कार्रवाई के दायरे में आया। स्थानीय उपभोक्ता के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है – यह दूध और पनीर किन-किन दुकानों, होटलों और रेस्तरां तक जाने वाला था? अगर किसी बड़ी खेप से नमूना लिया जाता है तो उसकी खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।

बिल ही बता सकता है कि माल कहां से आया और कहां गया

खाद्य व्यवसाय में खरीद का बिल केवल कर अथवा हिसाब-किताब का दस्तावेज नहीं है। खाद्य सुरक्षा की जांच में यह बेहद महत्वपूर्ण कड़ी है। एक सही आपूर्ति रिकॉर्ड से पता चल सकता है – उत्पाद किस निर्माता से आया? बैच नंबर क्या था? किस तारीख को आया? कितनी मात्रा आई? और किस-किस ग्राहक अथवा प्रतिष्ठान को भेजा गया? यदि कोई नमूना जांच में विफल होता है तो यही दस्तावेज उसी खेप को बाजार से वापस मंगाने में मदद कर सकते हैं।

एक खराब खेप कई शहरों तक पहुंच सकती है

यही कारण है कि दूध और पनीर की जांच सामान्य रेस्तरां निरीक्षण से अलग महत्व रखती है। मान लीजिए किसी निर्माता ने एक दिन में 500 किलो पनीर बनाया। उसमें से – 100 किलो वसई गया,100 किलो मुंबई,100 किलो ठाणे,100 किलो नवी मुंबई, और बाकी दूसरे इलाकों में। यदि वसई में लिया गया नमूना गंभीर रूप से विफल होता है तो केवल वसई के विक्रेता पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।

सवाल होगा – उसी खेप के बाकी 400 किलो का क्या हुआ? यही वह बिंदु है जहां स्थानीय खाद्य सुरक्षा मामला बड़े जनस्वास्थ्य प्रश्न में बदल सकता है।

पनीर क्यों बना FDA की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य श्रेणियों में से एक?

पनीर भारतीय भोजन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। घर से लेकर होटल तक। ढाबे से लेकर बड़े रेस्तरां तक। शादी और दूसरे समारोहों से लेकर खानपान सेवाओं तक। और इसकी मांग लगातार बनी रहती है। लेकिन ग्राहक सामान्यतः देखकर यह नहीं बता सकता कि – पनीर वास्तव में दूध से बना है या नहीं, उसमें दूध की वसा है अथवा किसी दूसरे प्रकार की वसा, उत्पाद कितने समय पुराना है, किस तापमान पर रखा गया, और उसका वास्तविक निर्माता कौन है।

यही वजह है कि पनीर में सही पहचान और सही जानकारी का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

असली पनीर और ‘पनीर जैसा उत्पाद’ – यहीं से शुरू हुआ बड़ा विवाद

खाद्य बाजार में एक महत्वपूर्ण शब्द है – एनालॉग उत्पाद (Analogue Product)।

सरल भाषा में समझें तो ऐसा उत्पाद जो किसी पारंपरिक खाद्य पदार्थ जैसा दिखाई दे अथवा उसी तरह इस्तेमाल हो, लेकिन उसकी संरचना अलग हो सकती है। पनीर अथवा चीज जैसे डेयरी उत्पादों के समान दिखने वाले कुछ एनालॉग उत्पादों में दूध के घटकों की जगह अथवा उनके साथ वनस्पति वसा/तेल और अन्य सामग्री इस्तेमाल की जा सकती है।

यहां एक बात बेहद महत्वपूर्ण है। किसी वैध रूप से परिभाषित वैकल्पिक खाद्य उत्पाद और किसी उत्पाद को गलत नाम से बेचने के बीच अंतर है। समस्या तब गंभीर होती है जब – ग्राहक को पनीर बताया जाए, लेकिन उसे कोई दूसरा उत्पाद दिया जाए।

FSSAI ने अप्रैल में ही जारी की थी चेतावनी

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI के पश्चिमी क्षेत्र ने 22 अप्रैल 2026 को इस विषय पर सार्वजनिक सूचना जारी की थी।

इसमें केंद्रीय लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं, खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों और दूसरे खाद्य व्यवसाय संचालकों को cheese analogue यानी चीज जैसे वैकल्पिक उत्पादों के बारे में सही और स्पष्ट जानकारी देने के नियमों का पालन करने को कहा गया।

FSSAI ने स्पष्ट किया कि – किसी cheese analogue को “paneer” बताकर बेचना कानून का गंभीर उल्लंघन है।

निर्माताओं को निर्देश दिया गया कि ऐसे उत्पाद दूसरे खाद्य व्यवसायों, विशेष रूप से होटल और रेस्तरां को देते समय उत्पाद का नाम स्पष्ट और बिना भ्रम पैदा किए लिखा जाए।

इसका मतलब सीधा है- यदि कोई रेस्तरां वास्तविक दूध से बने पनीर की जगह कोई दूसरा उत्पाद इस्तेमाल कर रहा है तो उपभोक्ता को भ्रमित नहीं किया जा सकता।

सवाल केवल स्वास्थ्य का नहीं – उपभोक्ता के साथ धोखे का भी

मान लीजिए किसी रेस्तरां के मेन्यू में लिखा है – “शाही पनीर”

ग्राहक स्वाभाविक रूप से यह मानकर भोजन मंगाता है कि उसे निर्धारित मानकों वाला दूध से बना पनीर मिलेगा। यदि उसके स्थान पर कोई दूसरा उत्पाद दिया जा रहा है और इसकी जानकारी ग्राहक को नहीं दी गई तो मुद्दा केवल पोषण अथवा खाद्य सुरक्षा का नहीं रह जाता। यह – उपभोक्ता को उत्पाद की वास्तविक पहचान बताने का सवाल भी बन जाता है।

ग्राहक को यह जानने का अधिकार है कि वह किस चीज के पैसे दे रहा है और वास्तव में उसे क्या परोसा जा रहा है।

महाराष्ट्र ने आखिरकार लिया बड़ा फैसला

लगातार सामने आ रही चिंताओं के बीच महाराष्ट्र सरकार ने मानकीकृत नहीं किए गए एनालॉग और गैर-डेयरी पनीर के खिलाफ बड़ा कदम उठाया।

राज्य में ऐसे उत्पादों के – निर्माण,भंडारण,परिवहन,वितरण और बिक्री पर एक वर्ष के लिए प्रतिबंध लगाया गया। यह फैसला केवल उत्पादन करने वाली इकाइयों तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ता है। यानी यदि प्रतिबंधित श्रेणी का उत्पाद बनाया नहीं जा सकता तो उसे – गोदाम में रखना, एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना, वितरित करना, और बेचना भी कार्रवाई के दायरे में आ सकता है।

उल्लंघन पर जेल और जुर्माने का प्रावधान

राज्य की कार्रवाई के तहत नियम तोड़ने वालों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कठोर कार्रवाई की जा सकती है। रिपोर्टों के अनुसार उल्लंघन पर छह महीने तक की सजा और ₹1 लाख तक जुर्माना हो सकता है।

इसका उद्देश्य केवल किसी उत्पाद को बाजार से हटाना नहीं है। बड़ा उद्देश्य है – उपभोक्ता को गलत जानकारी देकर पनीर जैसा दूसरा उत्पाद वास्तविक पनीर के नाम पर बेचने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना।

लेकिन यहां भी एक जरूरी सावधानी

“एनालॉग पनीर” शब्द सुनते ही हर ऐसे उत्पाद को “जहरीला” अथवा “नकली” घोषित कर देना तकनीकी रूप से उचित नहीं होगा। असल नियामक प्रश्न हैं – उस उत्पाद की संरचना क्या है? वह किस खाद्य श्रेणी में आता है? क्या उसके लिए लागू मानकों का पालन हुआ? उसे किस नाम से बेचा गया? और क्या ग्राहक को उसकी वास्तविक प्रकृति की स्पष्ट जानकारी दी गई? इसलिए समस्या को समझने के लिए केवल “असली बनाम नकली” की सनसनीखेज भाषा पर्याप्त नहीं। सही पहचान और सही लेबल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यह फैसला केवल Paneer की कहानी नहीं, महाराष्ट्र में एनालॉग पनीर पर कार्रवाई को केवल एक खाद्य पदार्थ का मामला मानना भी अधूरा होगा। इससे एक बड़ा सिद्धांत निकलता है – ग्राहक को वही उत्पाद मिलना चाहिए जिसके नाम पर उससे पैसे लिए जा रहे हैं। यदि घी है तो वह निर्धारित मानकों वाला घी हो। यदि पनीर है तो निर्धारित मानकों वाला पनीर हो। यदि मसाला है तो पैकेट पर लिखी सामग्री वास्तविक सामग्री से मेल खाए। और यदि कोई वैकल्पिक अथवा एनालॉग उत्पाद है तो उसकी पहचान स्पष्ट हो। यही खाद्य सुरक्षा के साथ उपभोक्ता संरक्षण की बुनियाद है।

अब अगला कदम क्या होना चाहिए?

पनीर पर प्रतिबंध लगाने के बाद असली परीक्षा शुरू होती है। सवाल यह है – क्या बाजार में औचक नमूने लगातार लिए जाएंगे? क्या होटल और खानपान सेवाओं के पनीर आपूर्तिकर्ताओं की जांच होगी? क्या खरीद के बिल देखे जाएंगे? क्या पनीर बनाने वाली इकाइयों तक जांच पहुंचेगी? क्या वनस्पति तेल और दूसरे कच्चे माल की खरीद का रिकॉर्ड जांचा जाएगा? और यदि कोई नमूना विफल होता है तो क्या उसी खेप को प्राप्त करने वाले दूसरे प्रतिष्ठानों को भी तत्काल जांच के दायरे में लिया जाएगा?

क्योंकि प्रतिबंध तभी प्रभावी होगा जब उसका प्रवर्तन बाजार तक दिखाई दे।

महाराष्ट्र के लिए अब ‘थाली से स्रोत’ नहीं, ‘स्रोत से थाली’ मॉडल जरूरी

अभी तक कई खाद्य सुरक्षा कार्रवाइयों का सामान्य क्रम होता है – रेस्तरां की जांच हुई। नमूना लिया गया। कमी मिली। कार्रवाई हुई। लेकिन खाद्य सुरक्षा का अगला चरण उलटी दिशा में काम करना चाहिए।

स्रोत निर्माण परिवहन वितरण रेस्तरां/दुकान उपभोक्ता

यदि हर चरण का रिकॉर्ड जुड़ा हो तो खराब खेप को तेजी से खोजा और बाजार से हटाया जा सकता है। यही आधुनिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का आधार होना चाहिए।

वसई-विरार के लिए पांच जरूरी सवाल

इस राज्यव्यापी अभियान के बीच वसई-विरार और पालघर के स्थानीय उपभोक्ताओं के लिए पांच सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं –

पहला: वसई-विरार में दूध और पनीर की आपूर्ति करने वाले प्रमुख निर्माताओं तथा थोक विक्रेताओं की नियमित नमूना जांच कितनी बार होती है?

दूसरा: स्थानीय होटल और रेस्तरां से लिए गए दूध-पनीर के नमूनों की अंतिम प्रयोगशाला रिपोर्ट जनता कहां देख सकती है?

तीसरा: यदि कोई नमूना विफल होता है तो क्या उसके आपूर्तिकर्ता तक जांच अनिवार्य रूप से पहुंचती है?

चौथा: क्या उसी खेप को खरीदने वाले दूसरे प्रतिष्ठानों की पहचान कर उन्हें भी जांच के दायरे में लिया जाता है?

पांचवां: कार्रवाई के बाद दोबारा निरीक्षण कब और कैसे होता है?

इन सवालों के जवाब स्थानीय खाद्य सुरक्षा की वास्तविक स्थिति समझने में किसी एक छापे की खबर से ज्यादा उपयोगी होंगे।

सबसे बड़ी कमी – जब्ती की खबर मिलती है, अंतिम परिणाम कहां है?

खाद्य सुरक्षा से जुड़ी खबरों में एक समस्या बार-बार दिखाई देती है। पहले दिन बड़ी सुर्खी आती है – “इतने लीटर दूध जब्त।” “इतने किलो पनीर पकड़ा।” “इतने लाख का माल सीज।” लेकिन उसके बाद? नमूने की प्रयोगशाला रिपोर्ट क्या रही? उत्पाद मानक से कम निकला? असुरक्षित निकला? गलत लेबल वाला निकला? या जांच में मानकों के अनुरूप पाया गया? यह जानकारी अक्सर उतनी आसानी से जनता तक नहीं पहुंचती जितनी पहली कार्रवाई की खबर। और यही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता का बड़ा सवाल है।

हर बड़ी जब्ती को मिले सार्वजनिक ट्रैकिंग नंबर

एक व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें हर महत्वपूर्ण नमूने अथवा जब्ती को एक सार्वजनिक जांच संख्या मिले।

नागरिक ऑनलाइन देख सके –

नमूना कब लिया गया प्रयोगशाला कब पहुंचा परिणाम क्या आया क्या कार्रवाई हुई दोबारा निरीक्षण हुआ या नहीं वर्तमान स्थिति क्या है।

इससे दो फायदे होंगे। यदि उत्पाद वास्तव में मानकों पर खरा नहीं उतरता तो उपभोक्ता को समय पर चेतावनी मिलेगी। और यदि नमूना सही निकलता है तो संबंधित व्यवसाय की प्रतिष्ठा भी अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं होगी।

कार्रवाई का पैमाना ‘कितना माल पकड़ा’ नहीं होना चाहिए

खाद्य सुरक्षा अभियान की सफलता केवल जब्ती की मात्रा से नहीं मापी जा सकती। असल पैमाना होना चाहिए –

कितने नमूने विफल हुए? कितने मामलों में स्रोत तक जांच पहुंची? कितनी खराब खेप बाजार से वापस मंगाई गई? कितने प्रतिष्ठानों ने कमियां स्थायी रूप से सुधारीं? कितने बार-बार नियम तोड़ते पाए गए? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या उपभोक्ता की थाली पहले से अधिक सुरक्षित हुई?

महाराष्ट्र ने सवाल उठाया, लेकिन समस्या महाराष्ट्र की सीमा पर खत्म नहीं होती

महाराष्ट्र में FDA की सक्रियता ने दूध, पनीर, रेस्तरां, डेयरी और खाद्य आपूर्ति व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल सार्वजनिक चर्चा में ला दिए हैं। लेकिन यहां इस श्रृंखला का अगला और सबसे बड़ा प्रश्न सामने आता है। क्या दूध केवल महाराष्ट्र में बिकता है? क्या पनीर केवल महाराष्ट्र में बनता है? क्या मसाले केवल महाराष्ट्र से आते हैं? क्या खाद्य तेल की आपूर्ति राज्य की सीमा पर रुक जाती है?

नहीं।

भारत की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला एक राज्य से दूसरे राज्य तक जुड़ी हुई है। और यही कारण है कि –

केवल एक राज्य में सख्त खाद्य सुरक्षा अभियान पर्याप्त नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश में मसालों पर कार्रवाई हो रही है। गुजरात भी एनालॉग डेयरी उत्पादों के खिलाफ कदम उठा चुका है। देश के दूसरे हिस्सों से भी खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट से जुड़ी कार्रवाइयां सामने आती रही हैं। यहां तक कि खाद्य सुरक्षा नियमन की कार्रवाई चुनिंदा मादक पेय उत्पादों तक पहुंच चुकी है। इसलिए अगला सवाल महाराष्ट्र से कहीं बड़ा है – क्या भारत को एक समन्वित अखिल भारतीय खाद्य सुरक्षा अभियान की जरूरत है?

अगले भाग में पढ़ें:

खबरों की खबर | भाग–4

महाराष्ट्र के बाहर क्या है तस्वीर? उत्तर प्रदेश से गुजरात और दूसरे राज्यों तक खाद्य पदार्थों पर कार्रवाई—और Old Monk समेत चुनिंदा मादक पेय उत्पादों पर FSSAI के कदम की असली कहानी

क्या देश में अलग-अलग राज्यों की छापेमारी पर्याप्त है, या दूध, पनीर, मसाले, तेल और दूसरे खाद्य उत्पादों की एक साथ राष्ट्रव्यापी जांच का समय आ गया है?

—–समाप्त—–

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