Vasai Virar : शिक्षा को लेकर हमारे देश में शब्दों की कोई कमी नहीं है। भाषणों में शिक्षा राष्ट्र निर्माण की पहली सीढ़ी है, बेटियां देश का भविष्य हैं और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ सामाजिक बदलाव का मंत्र। सरकारी विज्ञापनों में मुस्कुराती हुई बेटियां किताबें लेकर आगे बढ़ती दिखाई देती हैं। मंचों से यह भरोसा दिलाया जाता है कि नए भारत में बेटी किसी से पीछे नहीं रहेगी।
लेकिन इन नारों और तस्वीरों के बीच एक सवाल चुपचाप खड़ा है – अगर सब कुछ इतना बेहतर हो रहा है तो फिर बेटियां स्कूल छोड़ क्यों रही हैं?
साल 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि देश में कक्षा 9 और 10 के स्तर पर लड़कियों का स्कूल छोड़ने का अनुपात 8 प्रतिशत रहा। पिछले वर्षों के मुकाबले यह आंकड़ा निश्चित रूप से कम हुआ है। लेकिन क्या इसे अंतिम उपलब्धि मान लिया जाए? क्या सरकार को यह कहकर संतोष कर लेना चाहिए कि पहले 12.6 प्रतिशत था, अब 8 प्रतिशत रह गया?
शायद नहीं।
क्योंकि प्रतिशत के पीछे इंसान होते हैं। आठ प्रतिशत का अर्थ केवल एक सांख्यिकीय संख्या नहीं है। इसका अर्थ है कि हर 100 लड़कियों में करीब 8 ऐसी हैं, जिनकी पढ़ाई माध्यमिक स्तर तक पहुंचकर रुक गई। किसी के घर में आर्थिक संकट रहा होगा, किसी के हिस्से में घरेलू जिम्मेदारियां आई होंगी, किसी के माता-पिता ने आगे पढ़ाना जरूरी नहीं समझा होगा और किसी के लिए स्कूल तक पहुंचना ही मुश्किल रहा होगा।
UDISE Data: सरकारी रिपोर्ट में ये कारण एक-एक पंक्ति हैं, लेकिन किसी लड़की की जिंदगी में यही कारण उसके भविष्य की दिशा तय कर देते हैं।
कागज पर योजनाएं बहुत हैं, फिर जमीन पर कमी कहां है?
भारत सरकार ने लड़कियों की शिक्षा के लिए योजनाओं की कमी नहीं छोड़ी है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, समग्र शिक्षा अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और छात्रवृत्ति जैसी अनेक व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बढ़ी हैं। लड़कियों के लिए अलग शौचालयों की उपलब्धता में सुधार हुआ है। स्कूलों में नामांकन बढ़ा है। माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट भी पहले की तुलना में कम हुआ है।
फिर भी सवाल वहीं खड़ा है। जब साधन हैं, योजनाएं हैं, बजट है और नीति है, तो समस्या आखिर बची कहां है?
शायद समस्या उस जगह है जहां सरकारी फाइल खत्म होती है और परिवार की वास्तविक जिंदगी शुरू होती है।
एक गरीब परिवार के लिए बेटी का स्कूल जाना सिर्फ शिक्षा का सवाल नहीं होता। वह घर के काम में हाथ बंटाती है, छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती है, कई बार परिवार की आय में भी योगदान देती है। ऐसे परिवार के सामने जब दो विकल्प खड़े होते हैं – बेटी पढ़े या घर संभाले – तो अक्सर शिक्षा हार जाती है।
और यही वह जगह है जहां ‘बेटी पढ़ाओ’ का नारा अपनी सबसे कठिन परीक्षा में पहुंचता है। लड़की स्कूल क्यों छोड़ती है, यह पूछने से ज्यादा जरूरी है कि उसे रोकता कौन है?
सरकारी आंकड़ों में स्कूल छोड़ने के कारण दर्ज हो जाते हैं—घरेलू काम, परिवार की आय में योगदान, शिक्षा को जरूरी न समझना, स्कूल की दूरी और अन्य कारण।
लेकिन क्या इन कारणों को सिर्फ सामाजिक समस्या मानकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है? अगर गरीबी लड़की को स्कूल छोड़ने पर मजबूर करती है, तो शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सिर्फ स्कूल में मुफ्त किताबें बांटने तक कैसे सीमित रह सकती है?
अगर घर का काम लड़की की पढ़ाई में बाधा है, तो क्या सरकार और समाज ने कभी यह गंभीरता से सोचा कि घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ बेटियों पर ही क्यों डाल दिया जाता है? अगर माता-पिता बेटी की पढ़ाई को जरूरी नहीं समझते, तो वर्षों से चल रहे जागरूकता अभियानों के बावजूद उनकी सोच क्यों नहीं बदली?
क्या केवल नारा बदलने से समाज की सोच बदल जाती है?
शायद नहीं।
सोच तब बदलती है जब परिवार को शिक्षा का वास्तविक लाभ दिखाई देता है, जब लड़की सुरक्षित तरीके से स्कूल जा सकती है, जब उसके आगे रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाई देता है और जब गरीबी उसके सपनों के बीच दीवार बनकर खड़ी नहीं होती।
लद्दाख से कर्नाटक तक एक सवाल
लद्दाख में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट 15.6 प्रतिशत है। असम और कर्नाटक में यह 13.9 प्रतिशत है। राष्ट्रीय औसत 8 प्रतिशत है, लेकिन ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में समस्या हर जगह एक जैसी नहीं है।
कहीं भौगोलिक दूरी चुनौती है, कहीं आर्थिक पिछड़ापन, कहीं सामाजिक परिस्थितियां और कहीं स्कूल तक पहुंच। इसलिए एक ही योजना पूरे देश की समस्या का समाधान नहीं कर सकती। दिल्ली में बैठकर तैयार की गई नीति तभी सफल होगी जब उसकी पहुंच उस गांव तक हो जहां एक लड़की सुबह स्कूल जाने के बजाय घर के काम में लग जाती है।
सरकार के लिए असली चुनौती यही है – उस लड़की तक पहुंचना जो सरकारी आंकड़ों में अभी सिर्फ ‘ड्रॉपआउट’ है। माध्यमिक शिक्षा ही वह मोड़ है जहां सपने और मजबूरियां आमने-सामने आती हैं
प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का स्कूल छोड़ना बहुत कम है। उच्च प्राथमिक स्तर पर भी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। लेकिन कक्षा 9 और 10 में पहुंचते-पहुंचते तस्वीर बदलने लगती है। यही वह उम्र है जब लड़की की दुनिया बदलने लगती है।
उससे घर के काम की उम्मीद बढ़ती है। परिवार उसकी सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित होता है। कई जगह स्कूल दूर हो जाता है। आर्थिक दबाव बढ़ता है। और कई परिवारों में बेटी की शादी का विचार भी शिक्षा से बड़ा बना दिया जाता है।
यानी जिस उम्र में लड़की को अपने भविष्य के बारे में सबसे ज्यादा सोचने की जरूरत होती है, उसी उम्र में उसके सामने भविष्य के बजाय जिम्मेदारियों की सूची रख दी जाती है।
यह सिर्फ शिक्षा का संकट नहीं है। यह उस सामाजिक सोच का संकट है जिसमें बेटी के सपनों की कीमत अक्सर परिवार की तत्काल जरूरतों से कम आंक ली जाती है।
सरकार की सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए?
किसी भी सरकार के लिए योजनाओं की संख्या उपलब्धि नहीं हो सकती। बजट में आवंटित राशि उपलब्धि नहीं हो सकती। स्कूलों की इमारतें उपलब्धि नहीं हो सकतीं। यहां तक कि नामांकन में वृद्धि भी पूरी उपलब्धि नहीं है।
असली सवाल है – कितने बच्चे अपनी शिक्षा पूरी कर पाए? और बेटियों के मामले में तो यह सवाल और भी महत्वपूर्ण है।
अगर एक लड़की स्कूल में दाखिला लेती है लेकिन कुछ वर्षों बाद घरेलू या आर्थिक मजबूरी के कारण पढ़ाई छोड़ देती है, तो सिर्फ उसका नामांकन आंकड़ा शिक्षा की सफलता का प्रमाण कैसे हो सकता है?
हमें अब ‘कितनी बेटियां स्कूल पहुंचीं’ से आगे बढ़कर पूछना होगा – ‘कितनी बेटियां स्कूल में बनी रहीं?’ और उससे भी आगे – ‘कितनी बेटियों ने अपनी शिक्षा पूरी की?’
आठ प्रतिशत का सवाल
शायद सरकार के लिए 8 प्रतिशत सिर्फ एक घटता हुआ आंकड़ा है। लेकिन एक मां के लिए यह उसकी बेटी का अधूरा सपना हो सकता है। एक लड़की के लिए यह उसका छूटा हुआ स्कूल/कॉलेज हो सकता है।
एक परिवार के लिए यह भविष्य में मिलने वाला वह अवसर हो सकता है जो कभी आया ही नहीं। और देश के लिए यह उस मानव क्षमता का नुकसान है जिसे शिक्षा के जरिए आगे बढ़ाया जा सकता था। इसलिए 8 प्रतिशत पर संतोष करना जल्दबाजी होगी।
लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि पिछले साल से कम बेटियों ने स्कूल छोड़ा। लक्ष्य यह होना चाहिए कि अगली पीढ़ी की कोई बेटी मजबूरी में स्कूल न छोड़े।
सरकारें बदलती रहेंगी। योजनाओं के नाम बदलते रहेंगे। नारों की भाषा बदल सकती है। लेकिन एक सवाल हमेशा बना रहेगा – क्या इस देश की बेटी को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए अपने परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक सोच और परिस्थितियों से लड़ना ही पड़ेगा?
अगर जवाब हां है, तो फिर ‘बेटी पढ़ाओ’ अभी अधूरा है। क्योंकि बेटी को स्कूल तक पहुंचा देना शिक्षा नहीं है। उसे वहां टिकाए रखना, उसकी शिक्षा पूरी कराना और उसके सपनों को उसके आर्थिक-सामाजिक हालात से बड़ा बनाना ही असली शिक्षा है।
और जब तक यह नहीं होता, तब तक सरकारी विज्ञापनों में किताब लेकर मुस्कुराती बेटी और वास्तविकता में पढ़ाई छोड़ती बेटी – इन दोनों के बीच की दूरी हमारे विकास के दावों पर सवाल उठाती रहेगी।
आखिर किसी देश की तरक्की का सबसे सच्चा आईना उसके आंकड़े नहीं, उसकी बेटियों के अधूरे सपने होते हैं।
स्रोत: शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के UDISE+ 2025-26 आंकड़े; लोकसभा में प्रस्तुत सरकारी जानकारी; PLFS 2023-24; आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26
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