लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी सेवाओं की सीधी भर्ती के लिए चरित्र और पिछले रिकॉर्ड की जांच के संशोधित नियम सामने आए हैं। हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने का उद्देश्य रखने वाले संगठनों से संबंध और गंभीर अपराधों में भूमिका को लेकर सख्ती का प्रावधान है। साथ ही, केवल राजनीतिक विचारधारा, FIR दर्ज होने या जांच लंबित रहने से उम्मीदवार को अपने आप अयोग्य नहीं माना जाएगा।

30 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश

नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने 28 अक्टूबर को दिशा-निर्देश जारी किए। जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई को अनुरोध मिलने के 30 दिन के भीतर सत्यापन रिपोर्ट देनी होगी। गृह विभाग समय-सीमा के पालन की निगरानी करेगा।

प्रतिकूल रिपोर्ट पर पक्ष रखने का अवसर

उपलब्ध दिशा-निर्देशों के विवरण के मुताबिक, प्रतिकूल रिपोर्ट पर अंतिम सिफारिश से पहले उम्मीदवार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। उसे पुलिस थाने में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाना है। सामान्य पदों पर सत्यापन बाकी होने की स्थिति में शर्तों के साथ अस्थायी नियुक्ति की व्यवस्था भी है; संवेदनशील पदों के लिए विस्तृत जांच जरूरी रहेगी।

सिर्फ विरोध प्रदर्शन और हिंसक गतिविधि अलग

नीति में केवल राजनीतिक सोच को नियुक्ति रोकने का आधार नहीं माना गया है। इसी तरह, केस दर्ज होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं। उम्मीदवार की वास्तविक भूमिका और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होगी। इसे हर शांतिपूर्ण विरोध में शामिल व्यक्ति पर एक जैसी रोक का नियम नहीं बताया जाना चाहिए।

विपक्ष ने उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी ने आदेश की आलोचना करते हुए युवाओं की आवाज और विरोध के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका जताई है। दूसरी ओर, प्रकाशित नीति विवरण में विचारधारा के आधार पर भेदभाव न करने और FIR को स्वतः अयोग्यता न मानने की बातें शामिल हैं।

किसी विशेष भर्ती में आवेदन या नियुक्ति पर असर संबंधित विज्ञापन, पद की प्रकृति और सत्यापन रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा। उम्मीदवार अपने मामले में विभाग की आधिकारिक सूचना देखें।