वसई-विरार: 41 कथित अवैध इमारतों, जमीन हड़पने और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े बहुचर्चित मामले में पूर्व वसई-विरार महानगरपालिका आयुक्त अनिल कुमार पवार को बड़ी कानूनी राहत मिली है। मुंबई की विशेष PMLA अदालत ने पवार, उनकी पत्नी भारती पवार और दो चार्टर्ड अकाउंटेंट को मामले से डिस्चार्ज कर दिया। अदालत का निष्कर्ष है कि प्रवर्तन निदेशालय यानी ED द्वारा पेश सामग्री से इन लोगों तक अपराध की कथित कमाई पहुंचने की स्पष्ट मनी ट्रेल स्थापित नहीं होती।

हालांकि, इस आदेश का अर्थ पूरे मामले का समाप्त होना नहीं है। विशेष अदालत ने पूर्व नगरसेवक सीताराम गुप्ता, उनके भतीजे अरुण गुप्ता और नगर नियोजन विभाग के पूर्व उपनिदेशक वाई. एस. रेड्डी समेत 14 आरोपियों के खिलाफ ED की शिकायत पर संज्ञान लिया है। इन आरोपियों को 30 नवंबर को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। यानी कथित जमीन हड़पने, जाली दस्तावेजों और अवैध इमारतों से जुड़ी मूल जांच आगे जारी रहेगी।

अदालत ने पवार के मामले में क्या देखा?

विशेष PMLA न्यायाधीश शरयू विवेक सहारे के आदेश के अनुसार, अनिल कुमार पवार और उनकी पत्नी का नाम उन मूल अपराधों की एफआईआर में नहीं था, जिनके आधार पर ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि कथित जमीन कब्जाने का सिलसिला वर्ष 2008 से शुरू होने का आरोप है, जबकि पवार ने वसई-विरार महानगरपालिका आयुक्त का पद 2022 में संभाला था।

ED का आरोप था कि पूरे नेटवर्क से लगभग ₹300.92 करोड़ की अपराध आय बनी और इसमें से ₹169 करोड़ की रकम पवार से जुड़ी थी। लेकिन अदालत के सामने रखी गई सामग्री से रेड्डी, पवार और फिर भारती पवार के बीच धन के प्रवाह की कड़ी साबित नहीं हुई। इसी आधार पर अदालत ने चार लोगों को मुकदमे से मुक्त करने का आदेश दिया। यह फैसला आरोपों पर उपलब्ध सामग्री की पर्याप्तता से जुड़ा है; बाकी आरोपियों की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्णय आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होगा।

41 इमारतें, 2,500 परिवार और सार्वजनिक जमीन का विवाद

यह मामला अचोले क्षेत्र में निजी और सरकारी जमीन पर कथित कब्जे तथा अनधिकृत निर्माण से जुड़ा है। आरोप है कि शहर के विकास आराखड़े में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और डंपिंग ग्राउंड जैसी सार्वजनिक सुविधाओं के लिए आरक्षित भूखंडों पर जाली दस्तावेजों और अनधिकृत विकास समझौतों के सहारे निर्माण कराया गया। बाद में 41 इमारतों में फ्लैट बेचे गए।

बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद इन इमारतों को गिराया गया और करीब 2,500 परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े। इस कार्रवाई का सबसे बड़ा असर कामगार और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों पर पड़ा। खरीदारों का कहना रहा कि उन्होंने जीवनभर की बचत लगाकर घर लिए, जबकि जांच एजेंसियों का दावा है कि निर्माण से जुड़े लोगों को इमारतों की कानूनी स्थिति की जानकारी थी।

14 आरोपियों के खिलाफ मामला जारी

अदालत ने सीताराम गुप्ता और अरुण गुप्ता के खिलाफ कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार माना है। दोनों पर निजी और सरकारी जमीन को कथित रूप से जाली दस्तावेजों के जरिए कब्जाने और खरीदारों को अनधिकृत इमारतों में फ्लैट बेचने का आरोप है। वाई. एस. रेड्डी भी उन आरोपियों में शामिल हैं जिनके खिलाफ PMLA की कार्यवाही जारी रहेगी।

इससे पहले MCS ने पूर्व आयुक्त अनिल कुमार पवार से जुड़ी ED कार्रवाई और 41 इमारतों के मामले में सीताराम गुप्ता को मिली जमानत पर विस्तार से रिपोर्ट किया था। नया अदालत आदेश उसी बड़े प्रकरण में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ है।

डिस्चार्ज और बरी होने में क्या अंतर है?

डिस्चार्ज का मतलब है कि अदालत को उपलब्ध आरोपपत्र और दस्तावेजों के आधार पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक पर्याप्त सामग्री नहीं मिली। यह अंतिम सुनवाई के बाद दी गई बरी होने की घोषणा से अलग प्रक्रिया है। ED के पास कानून के मुताबिक आदेश को चुनौती देने का विकल्प हो सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि पवार और तीन अन्य व्यक्तियों के खिलाफ विशेष अदालत में PMLA मुकदमा आगे नहीं बढ़ेगा, जबकि 14 अन्य आरोपियों की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।