FSSAI Report-2025-26
FSSAI Report-2025-26

Vasai-Virar: भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में इसकी भयावहता जिस तेजी से बढ़ी है, उसने हर घर की रसोई को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। जिस भोजन को हम जीवन का आधार मानते हैं, वही आज कई बार बीमारी का कारण बन रहा है। दूध से लेकर घी, मसालों से लेकर मिठाइयों और शहद से लेकर खाद्य तेल तक—शायद ही कोई ऐसा उत्पाद बचा हो, जिसमें मिलावट की खबरें सामने न आती हों। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह मिलावट अब किसी छोटे-मोटे स्थानीय कारोबार तक सीमित नहीं रही, बल्कि करोड़ों रुपये के संगठित अवैध कारोबार का रूप ले चुकी है।

हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के आंकड़ों ने इस चिंता को और गहरा कर दिया। वर्ष 2025-26 के दौरान देशभर में पाँच लाख से अधिक खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। दो लाख से ज्यादा खाद्य नमूनों की जांच हुई और उनमें से लगभग चालीस हजार नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। यानी हर पाँच में से लगभग एक नमूना या तो मिलावटी था या गुणवत्ता के निर्धारित मानकों से कमतर पाया गया। उत्तर प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर रहा, लेकिन वास्तविकता यह है कि शायद ही कोई राज्य इससे अछूता हो।

इन आंकड़ों को केवल सरकारी रिपोर्ट मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनके पीछे लाखों परिवारों का स्वास्थ्य जुड़ा है। मिलावट का असर तुरंत दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं। कई बार यही रसायन, सिंथेटिक रंग, नकली तेल और जहरीले तत्व धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर कैंसर, लीवर की बीमारी, किडनी फेलियर, हार्मोनल असंतुलन और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आम उपभोक्ता को यह पता भी नहीं चलता कि बीमारी की शुरुआत उसकी थाली से हुई थी।

पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए मामले इस खतरे की गंभीरता को साबित करते हैं। उत्तर प्रदेश के हापुड़ में हजारों किलो संदिग्ध नकली शहद पकड़ा गया। कानपुर में त्योहारों से पहले हजारों लीटर मिलावटी खाद्य तेल और नकली घी जब्त किया गया। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली समेत कई राज्यों में समय-समय पर नकली पनीर, सिंथेटिक दूध, मिलावटी मसाले और जहरीली मिठाइयों के कारखाने पकड़े जाते रहे हैं। हर बार प्रशासन बड़ी कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद फिर कोई नया मामला सामने आ जाता है। यही इस लड़ाई की सबसे बड़ी विफलता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कानून होने के बावजूद मिलावटखोरों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं?

भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम (Food Safety and Standards Act, 2006) लागू है। इसमें भारी जुर्माने से लेकर जेल तक का प्रावधान है। फिर भी मिलावट का कारोबार लगातार बढ़ रहा है। इसका कारण केवल कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की कमजोरी है। जांच होती है, नमूने लिए जाते हैं, मुकदमे दर्ज होते हैं, लेकिन सजा मिलने में वर्षों लग जाते हैं। कई मामलों में दोष सिद्ध ही नहीं हो पाता। जब अपराधी को यह भरोसा हो जाए कि पकड़े जाने के बाद भी बच निकलने की संभावना अधिक है, तो कानून का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।

इस पूरे मामले में सरकारी तंत्र की जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है। खाद्य सुरक्षा विभाग की जिम्मेदारी केवल त्योहारों के दौरान औपचारिक छापेमारी करना नहीं, बल्कि पूरे वर्ष नियमित निगरानी रखना है। यदि किसी क्षेत्र में बार-बार मिलावटी सामान पकड़ा जा रहा है, तो यह केवल दुकानदार की नहीं, निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि कई बार भ्रष्टाचार और मिलीभगत के आरोपों के कारण कार्रवाई कमजोर पड़ जाती है। जब तक ऐसे मामलों में अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सुधार की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।

मिलावट का दूसरा बड़ा नुकसान ईमानदार व्यापारियों को भी उठाना पड़ता है। जो व्यापारी शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बेचते हैं, वे मिलावट करने वालों की तुलना में अधिक लागत उठाते हैं। लेकिन बाजार में सस्ते नकली उत्पाद आने से ईमानदार व्यवसायी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने लगते हैं। यानी मिलावट केवल स्वास्थ्य पर हमला नहीं, बल्कि ईमानदार व्यापार पर भी प्रहार है।

आज आवश्यकता केवल अधिक छापेमारी की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जिसमें मिलावट करना सबसे महंगा और सबसे जोखिम भरा अपराध बन जाए। दोषियों के नाम सार्वजनिक किए जाएं, बार-बार पकड़े जाने वाले प्रतिष्ठानों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द हों, मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में हो और खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। साथ ही, हर जिले में जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि आम नागरिक भी जान सकें कि उनके शहर में कौन-से उत्पाद सबसे अधिक मिलावटी पाए जा रहे हैं।

लेकिन यह लड़ाई केवल सरकार नहीं जीत सकती। समाज की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। बिना बिल के सामान खरीदना, केवल सस्ता देखकर खाद्य पदार्थ लेना और संदिग्ध उत्पादों की शिकायत न करना भी कहीं न कहीं इस अवैध कारोबार को बढ़ावा देता है। जागरूक उपभोक्ता मिलावट के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार साबित हो सकता है।

आज जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का सपना देख रहा है, अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है, तब यह विडंबना ही है कि देश का नागरिक अपनी रोज़ की थाली में परोसे गए भोजन की शुद्धता को लेकर आश्वस्त नहीं है।

किसी भी राष्ट्र की असली ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था या बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का स्वास्थ्य होता है। यदि भोजन ही असुरक्षित हो जाए, तो विकास के सारे दावे खोखले प्रतीत होने लगते हैं।

अब समय आ गया है कि मिलावट को केवल खाद्य अपराध नहीं, बल्कि “जनस्वास्थ्य के खिलाफ संगठित अपराध” माना जाए। क्योंकि जब ज़हर हमारी थाली तक पहुँच जाए, तब चुप रहना भी एक अपराध बन जाता है।

———-समाप्त———-

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