मुंबई के पायधुनी इलाके में तरबूज खाने के बाद एक ही परिवार के चार लोगों की मौत के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। इस मामले में फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने खाद्य सुरक्षा जांच प्रक्रिया और FDA (Food and Drug Administration) की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
सूत्रों के अनुसार, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में मृतकों के शरीर और तरबूज के नमूनों में जिंक फॉस्फाइड के अंश पाए जाने की बात सामने आई है। जिंक फॉस्फाइड एक जहरीला पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर चूहे मारने की दवा में किया जाता है। हालांकि, बताया जा रहा है कि FDA की रिपोर्ट में इस तरह का कोई उल्लेख नहीं था, जिससे जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल यह कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता कि FDA के पास जहरीले पदार्थों की जांच की सुविधा नहीं है। फॉरेंसिक विशेषज्ञों के मुताबिक, खाद्य पदार्थों में जहर की जांच के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन नमूने समय पर लैब तक पहुंचना बेहद जरूरी होता है।
जानकारी के मुताबिक, इस मामले में कथित जहरीला पदार्थ खाने के लगभग पांच से साढ़े पांच घंटे बाद इलाज शुरू हुआ, जिससे “गोल्डन ऑवर” निकल गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जहर शरीर से निकालने वाली शुरुआती चिकित्सा प्रक्रिया में हुई देरी ने पीड़ितों की जान बचाने की संभावना को कम कर दिया।
इसके अलावा, FSL रिपोर्ट आने में करीब 12 दिन लगने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कई बार लैब में बुनियादी सुविधाओं की कमी और लंबित नमूनों के कारण जांच में देरी होती है।
जांच एजेंसियां अब इस संभावना की भी पड़ताल कर रही हैं कि तरबूज में किसी जहरीले चूहेमार पदार्थ का इस्तेमाल किया गया था। यह भी जांच का विषय है कि जहरीला पदार्थ सीधे तरबूज में मिलाया गया था, पानी वाले गूदे में घोला गया था या फिर उस नमक में मौजूद था जो कथित तौर पर तरबूज पर डाला गया था।
फिलहाल, इस पूरे मामले ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कामायनी एक्सप्रेस में टीसी पर हमला: टिकट मांगने पर यात्री ने जड़े घूंसे, आरोपी गिरफ्तार