बायो-मायनिंग, RDF परिवहन, पत्थर उत्खनन और SLF प्रकल्प को लेकर गंभीर सवाल; भाजपा ने FIR और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की
वसई-विरार | 26 अगस्त 2026: वसई-विरार शहर महानगरपालिका में पुराने कचरे के बायो-मायनिंग और कचरा व्यवस्थापन से जुड़े कामों में 64 करोड़ रुपये से अधिक के कथित आर्थिक नुकसान का मामला सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस संबंध में दस्तावेज और आरोप सामने रखते हुए संबंधित ठेकेदारों, तकनीकी सलाहकारों और मनपा अधिकारियों की भूमिका की जांच तथा दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई है। प्रस्तुत सामग्री में बायो-मायनिंग, RDF परिवहन, MRF से जुड़े पत्थर उत्खनन और Scientific Landfill (SLF) प्रकल्प को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
बायो-मायनिंग के बिलों पर सवाल
प्रस्तुति के अनुसार, पुराने कचरे के बायो-मायनिंग के काम में घनत्व और मात्रा के आधार पर तैयार किए गए बिलों पर सवाल उठाए गए हैं। दस्तावेज में अप्रैल 2024 में कचरे की घनता 340 किलोग्राम प्रति घनमीटर और 16 जनवरी 2026 की रिपोर्ट में 840 किलोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज होने का उल्लेख है। प्रस्तुति का आरोप है कि प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया, बारिश और धूप के कारण कचरा नीचे बैठने के बावजूद उसके घटे हुए आकारमान को सही तरीके से नहीं दर्शाया गया और इसके आधार पर करीब 39 करोड़ रुपये के कथित गलत भुगतान का आरोप लगाया गया।
RDF परिवहन में वाहनों को लेकर गंभीर सवाल
कचरे से तैयार होने वाले ईंधन यानी RDF की परिवहन व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। दस्तावेज में Tata Indica जैसे वाहन की क्षमता लगभग 500 किलो होने के बावजूद उसके जरिए 26 टन RDF परिवहन का दावा किए जाने का उल्लेख है। प्रस्तुति के अनुसार यह वाहन की कथित क्षमता से करीब 52 गुना अधिक है। इसी तरह बाइक, पावर टिलर और छोटे मालवाहक वाहनों से भी बड़ी मात्रा में RDF ले जाने के प्रमाणपत्रों पर सवाल उठाए गए हैं।
17 हजार घनमीटर पत्थर के उत्खनन का आरोप
MRF प्रकल्प से जुड़े दस्तावेजों में करीब 10,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में खुदाई और लगभग 17,000 घनमीटर पत्थर के उत्खनन का उल्लेख है। प्रस्तुति में आरोप लगाया गया है कि इसके लिए 835 रुपये प्रति घनमीटर की दर से करीब 4.09 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ और इसी पत्थर को लेकर दोहरे आर्थिक नुकसान की आशंका जताई गई है।
24.62 करोड़ के SLF प्रकल्प पर भी सवाल
Scientific Landfill यानी SLF प्रकल्प को लेकर भी दस्तावेज में गंभीर आपत्तियां दर्ज हैं। प्रस्तुति के अनुसार इस प्रकल्प पर करीब 24.62 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन प्रकल्प की सफलता और उपयोगिता पर सवाल उठाए गए हैं। दस्तावेज में 2016 में उपलब्ध खाली जगह और 2025 में वहां कचरे का ढेर होने की तुलना भी प्रस्तुत की गई है। साथ ही CAG audit में 24.62 करोड़ रुपये के खर्च का उल्लेख और प्रकल्प के असफल रहने का दावा किया गया है।
नियमों के उल्लंघन का भी आरोप
प्रस्तुति में CPHEEO Manual, अनुबंध की शर्तों और IIT मुंबई की रिपोर्ट की सिफारिशों के पालन पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) की कार्रवाई और दिसंबर 2020 से करीब 12 करोड़ रुपये के दंड का उल्लेख किया गया है।
ठेकेदार, सलाहकार और अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में
भाजपा की ओर से इस पूरे मामले में केवल ठेकेदार ही नहीं, बल्कि तकनीकी सलाहकार, संबंधित मनपा अधिकारी और कथित प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है। दस्तावेज में भुगतान मंजूर करने, खनन की अनुमति और स्वतंत्र जांच के बिना बिलों को मंजूरी देने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।
FIR और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग
भाजपा ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की मांग की है। साथ ही अब तक हुए खर्च का फॉरेंसिक ऑडिट, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और कथित गलत भुगतान की रकम की वसूली की मांग भी की गई है।
दस्तावेजों में कुल आर्थिक नुकसान का अनुमान 64 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है, जबकि अलग-अलग मदों—SLF, कथित बायो-मायनिंग बिल और पत्थर उत्खनन—को मिलाकर प्रस्तुति में 79 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित नुकसान का भी उल्लेख है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग दावों और मदों को किस आधार पर जोड़ा गया है, इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।
अब पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने कई सवाल
मामले में अब यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि बायो-मायनिंग में वास्तव में कितना कचरा संसाधित किया गया, बिलों में दर्ज मात्रा और घनत्व सही था या नहीं, RDF वास्तव में संबंधित कंपनियों तक पहुंचा या नहीं, जिन वाहनों के नाम दस्तावेजों में दर्ज हैं उन्होंने वास्तव में परिवहन किया था या नहीं और MRF/SLF प्रकल्प में हुए खर्च का वास्तविक उपयोग कितना हुआ।
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