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Youth Employment Crisis : युवा संकट और बेरोजगारी: मुफ्त कोचिंग से नहीं निकलेगा रास्ता

भारत में युवा रोजगार संकट और बेरोजगारी को दर्शाता चित्र
डिग्री और तैयारी के बावजूद रोजगार की तलाश में भारत का युवा।

Vasai-Virar : भारत में युवाओं के बीच बढ़ती बेचैनी को सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था, पेपर लीक या महंगी कोचिंग तक सीमित करके देखना आसान है, लेकिन समस्या इससे कहीं गहरी है। पिछले कुछ समय में युवाओं के आंदोलन ने परीक्षा व्यवस्था पर सरकार को दबाव में ला दिया। परीक्षा सुधार की मांगों को लेकर सरकार को कदम उठाने पड़े और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के जरिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने की घोषणा भी हुई। निस्संदेह, यह उन परिवारों के लिए राहत की बात हो सकती है जो अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए लगातार बढ़ते कोचिंग खर्च का बोझ उठा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या मुफ्त कोचिंग भारत के युवा संकट का समाधान है?

शायद नहीं।

क्योंकि भारत में समस्या केवल यह नहीं है कि युवा परीक्षा की तैयारी महंगी होने के कारण पीछे रह जाते हैं। उससे भी बड़ी समस्या यह है कि परीक्षा पास करने के बाद उनके लिए पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरियां मौजूद नहीं हैं। युवा को परीक्षा की तैयारी के लिए मुफ्त कोचिंग मिल सकती है, लेकिन नौकरी की कोई गारंटी नहीं।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय परिवारों के शिक्षा बजट पर निजी कोचिंग का बोझ लगातार बढ़ा है। एक बच्चे की शिक्षा पर परिवार द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च में निजी कोचिंग की हिस्सेदारी 2018 के 12.5 फीसदी से बढ़कर करीब 16 फीसदी हो गई है। उच्च माध्यमिक स्तर पर, जब छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटते हैं, यह खर्च लगभग एक-चौथाई तक पहुंच जाता है। इसका अर्थ साफ है कि सामान्य स्कूल और कॉलेज की शिक्षा के साथ अब परिवारों को नौकरी की दौड़ में बने रहने के लिए एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था का खर्च भी उठाना पड़ रहा है।

लेकिन इस अतिरिक्त खर्च के बावजूद सफलता सीमित है, क्योंकि अच्छी शिक्षा के अवसर ही सीमित हैं। मेडिकल प्रवेश परीक्षा में लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं, जबकि गुणवत्तापूर्ण संस्थानों में सीटें बहुत कम हैं। इस साल 22 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी, जबकि स्नातक स्तर पर सीटों की संख्या करीब 1.4 लाख रही। शीर्ष मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध सीटों की संख्या तो इससे भी बहुत कम है। इंजीनियरिंग में जेईई की प्रतियोगिता भी इसी तस्वीर को सामने रखती है। लाखों युवा एक सीमित संख्या में बेहतर संस्थानों और बेहतर अवसरों के लिए संघर्ष करते हैं।

ऐसे में मुफ्त कोचिंग निश्चित रूप से परिवारों की जेब पर बोझ कम कर सकती है, लेकिन वह सीटों की कमी दूर नहीं कर सकती। वह परीक्षा में सफल उम्मीदवारों की संख्या बढ़ा सकती है, लेकिन रोजगार के अवसरों की संख्या नहीं।

यही वजह है कि भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच का संबंध अब पहले जैसा सीधा नहीं रह गया है। उच्च शिक्षा में दाखिले का आंकड़ा भी इस बदलती स्थिति की ओर इशारा करता है। शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में स्नातक स्तर पर दाखिले में 93,322 की गिरावट दर्ज हुई। उत्तर प्रदेश में यह गिरावट करीब 1.53 लाख रही, जबकि डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में दाखिला 1.38 लाख बढ़ गया। यह बदलाव इस बात का संकेत हो सकता है कि युवाओं की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। वे अब सिर्फ डिग्री हासिल करने के बजाय ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो उन्हें अपेक्षाकृत जल्दी रोजगार के करीब ले जाए।

इस पूरी तस्वीर का सबसे चिंताजनक पहलू बेरोजगारी है।

सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी में मामूली बदलाव जरूर दिखता है, लेकिन जमीन की तस्वीर को इससे राहत की कहानी नहीं बनाया जा सकता। 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 2024 में 10.3 फीसदी थी, जो 2025 में 9.9 फीसदी रही। यानी करीब 10 फीसदी युवा अब भी बेरोजगार हैं आधे प्रतिशत अंक की यह मामूली गिरावट उस विशाल युवा आबादी के संदर्भ में कोई बड़ा बदलाव नहीं है। असली चिंता तब और बढ़ जाती है जब पढ़े-लिखे युवाओं को देखा जाए—ग्रेजुएट स्तर पर बेरोजगारी कहीं ज्यादा है और नियमित, सामाजिक सुरक्षा वाली नौकरियां बेहद सीमित हैं।

इसलिए केवल बेरोजगारी दर को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि स्थिति सुधर रही है, अधूरा होगा। असली सवाल रोजगार की गुणवत्ता का भी है। अगर किसी युवा को अस्थायी, कम वेतन वाली या बिना सामाजिक सुरक्षा वाली नौकरी मिलती है, तो क्या उसे उस रोजगार संकट का समाधान माना जा सकता है जिसके कारण उसने वर्षों तक पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की?

भारत का युवा आज इसी विरोधाभास के बीच खड़ा है। एक तरफ उससे कहा जा रहा है कि वह ज्यादा पढ़े, बेहतर डिग्री हासिल करे, प्रतियोगी परीक्षा पास करे और अपने कौशल को बढ़ाए। दूसरी तरफ रोजगार बाजार में उसके लिए पर्याप्त स्थिर और सम्मानजनक अवसर दिखाई नहीं देते। परिणाम यह है कि युवा पहले नौकरी पाने की तैयारी में वर्षों लगाता है और फिर नौकरी मिलने के बाद भी उसकी स्थिरता को लेकर अनिश्चित रहता है।

यही भारत के युवा संकट का असली चेहरा है।

यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि अभी तक उतनी बड़ी संख्या में रोजगार पैदा नहीं कर पा रही है, जितनी जरूरत है। 6 से 6.5 फीसदी आर्थिक वृद्धि निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन GDP बढ़ने और युवाओं की आय बढ़ने के बीच सीधा संबंध अपने आप नहीं बनता। अर्थव्यवस्था को ऐसे क्षेत्रों की जरूरत है जो बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार दे सकें।

मैन्युफैक्चरिंग इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है। भारत लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी को अर्थव्यवस्था में करीब 25 फीसदी तक ले जाने का लक्ष्य बताता रहा है, लेकिन यह क्षेत्र अभी भी उस स्तर से काफी दूर है। दूसरी तरफ कॉरपोरेट टैक्स में 2019 में कटौती के बावजूद निजी निवेश उस गति से नहीं बढ़ा जिसकी उम्मीद की गई थी। कॉरपोरेट निवेश का GDP में हिस्सा वित्त वर्ष 2007-08 के 17.3 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 10.3 फीसदी रह गया।

यहां सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं है। सवाल यह है कि जब निजी निवेश पर्याप्त गति से नहीं बढ़ता, तो बड़े पैमाने पर नई उत्पादन क्षमता और नई नौकरियां कहां से आएंगी?

भारत जैसे देश में हर युवा को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। हर स्नातक IT कंपनी में नहीं जा सकता और हर युवा स्टार्टअप शुरू नहीं कर सकता। करोड़ों युवाओं को रोजगार देने के लिए बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और दूसरे श्रम-प्रधान उद्योगों का विस्तार जरूरी है। छोटे और मझोले उद्योगों का विस्तार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही क्षेत्र स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर सकते हैं।

वियतनाम जैसे देशों का अनुभव बताता है कि वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़कर मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात को बढ़ावा दिया जा सकता है। भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, बड़ी युवा आबादी और मजबूत औद्योगिक क्षमता विकसित करने की पर्याप्त संभावना है। जरूरत इस बात की है कि नीति का फोकस केवल निवेश आकर्षित करने पर नहीं, बल्कि निवेश को उत्पादन और उत्पादन को रोजगार में बदलने पर हो।

इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ परीक्षा सुधार की नहीं है। पेपर लीक रोकना, परीक्षाओं को पारदर्शी बनाना और कोचिंग का खर्च कम करना जरूरी कदम हैं, लेकिन इन्हें युवा रोजगार नीति का अंतिम लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता।

अगर एक युवा पांच साल तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है और अंत में नौकरी नहीं पाता, तो मुफ्त कोचिंग उसकी समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा हल करती है। अगर उसे नौकरी मिल भी जाती है, लेकिन वह नौकरी अस्थायी है, वेतन कम है और सामाजिक सुरक्षा नहीं है, तो संकट पूरी तरह खत्म नहीं होता।

भारत के सामने असली चुनौती परीक्षा पास कराने की नहीं, युवाओं को उत्पादक और सम्मानजनक रोजगार देने की है।

युवा संकट को केवल शिक्षा मंत्रालय की समस्या मानना भी इसलिए गलत होगा। यह अर्थव्यवस्था, उद्योग, निवेश और श्रम बाजार—सभी से जुड़ा हुआ सवाल है। सरकार को औद्योगिक क्षमता में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने, निर्यात-उन्मुख उद्योगों को प्रदर्शन के आधार पर समर्थन देने और मझोली कंपनियों के विस्तार में आने वाली नियामकीय बाधाओं को कम करने पर जोर देना होगा।

क्योंकि भारत के सामने विकल्प साफ है। या तो वह अपने युवाओं को लगातार नई-नई परीक्षाओं के लिए तैयार करता रहे और सीमित सीटों के लिए उन्हें एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कराता रहे, या फिर ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करे जिसमें परीक्षा पास करना ही सफलता का एकमात्र रास्ता न रह जाए।

मुफ्त कोचिंग परिवारों का खर्च कम कर सकती है, लेकिन बेरोजगारी का बोझ नहीं।

उस बोझ को कम करने के लिए भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी जहां युवाओं के पास सिर्फ परीक्षा देने का विकल्प नहीं, बल्कि परीक्षा के बाहर भी पर्याप्त, स्थिर और सम्मानजनक रोजगार के अवसर हों।

आखिरकार युवा संकट का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि युवा कितनी अच्छी तैयारी कर रहा है।

सवाल यह है कि उसके भविष्य के लिए देश कितनी अच्छी नौकरियां तैयार कर रहा है।

—–समाप्त—–

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